ध्रुव तारा – एक बालक जिसे भगवान विष्णु ने दिया ब्रह्मांड में सर्वोच्च स्थान

एक बालक जिसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने दिया ब्रह्मांड में सबसे सर्वोच्च स्थान।

हिंदू धर्म में अनेक ऐसी पौराणिक कथाएं हैं। जिनमें भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान द्वारा उन्हें वरदान और दर्शन देने की कहानियां प्रचलित हैं। ऐसे में आज हम आपको एक ऐसे बच्चे की कहानी सुनाने जा रहे हैं। जिसने आगे चलकर एक तारा बनकर सम्पूर्ण संसार को दिशा दिखाई।

यानि वह आसमान का सबसे चमकीला तारा बन गया।  जी हां! हम बात कर रहे हैं ध्रुव तारे की। जोकि आसमान में उत्तर दिशा की ओर दिखाई देता है। इसे अंग्रेजी में pole star कहते हैं। अक्सर रेगिस्तानी इलाकों में राहगीर ध्रुव तारे के माध्यम से दिशाओं का पता लगाते हैं।

यह आकार में सूर्य से भी बड़ा होता है और इसका वजन सूर्य से करीब 7.50 गुना अधिक होता है। ध्रुव तारे का मुख्य रूप से धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। तो चलिए जानते हैं कि, कैसे एक सामान्य सा बालक बना आसमान का सबसे चमकदार तारा…..

ध्रुव तारे की कथा

धार्मिक मान्यताओं के आधार पर, यह कहानी सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के पुत्र स्वंभू मनु के बेटे राजा उत्तानपाद से आरंभ होती है। जिनकी पत्नी का सुनीति होता है। राजा उत्तानपाद और रानी सुनीति के विवाह के काफी वर्षों बाद भी उनकी कोई संतान नहीं होती है।

जिसके चलते रानी सुनीति राजा को दूसरी शादी करने के लिए कहती है। लेकिन राजा उत्तानपाद उन्हें समझाते हैं कि वह दूसरा विवाह करके उनका प्रेम नही बांट सकते हैं। जिसपर रानी उनकी एक ना सुनती है और रानी की हठ के आगे राजा की एक नही चलती है।

वह रानी के कहेनुसार सुरुचि नामक स्त्री से विवाह कर लेते हैं। लेकिन रानी सुरुचि शादी से पहले यह शर्त रख देती हैं कि राजा की पहली रानी महल से बाहर चली जाएंगी। तभी वह महल में वधु बनकर आएंगी। जिसपर राजा उत्तानपाद की पहली पत्नी रानी सुनीति महल छोड़कर वन की ओर प्रस्थान कर जाती हैं।

एक बार की बात है जब राजा उत्तानपाद जंगल में शिकार करने जाते हैं। तब वह शिकार करने के दौरान घायल हो जाते हैं। तभी वहां रानी सुनीति उन्हें मिल जाती है। जो राजा उत्तानपाद को अपनी कुटिया में ले जाती हैं और वहां उनकी सेवासुर्षा आदि करती हैं।

जिसके बाद राजा कुछ समय रानी सुनीति के साथ उनकी कुटिया में ही रहते हैं। जहां कुछ दिनों पश्चात् रानी सुनीति गर्भवती हो जाती हैं लेकिन राजा उत्तानपाद को यह बात पता लगती, तब तक वह महल की ओर प्रस्थान कर जाते हैं।

उधर, महल में रानी सुरुचि भी एक बेटे को जन्म देती हैं। जहां रानी सुनीति के बेटे का नाम ध्रुव होता है, तो वहीं रानी सुरुचि के बेटे का नाम उत्तम होता है।

कुछ समय बाद जब राजा को रानी सुनीति के पुत्र ध्रुव के बारे में मालूम पड़ता है, तो वह रानी सुनीति ने महल में वापस लौटने के लिए कहते हैं। लेकिन रानी सुनीति स्वयं तो महल में आने से मना कर देती हैं, लेकिन वह ध्रुव को अक्सर अपने पिता के पास महल में भेज दिया करती थी।

जहां रानी सुरुचि ध्रुव से काफी जलन रखती थी। वह सदैव उस नन्हें से बालक के उपहास का अवसर ढूंढा करती थी। एक बार की बात है जब ध्रुव अपने पिता यानि राजा उत्तानपाद की गोद में बैठा हुआ था। तब रानी सुरुचि ने क्रोध में आकर उसे भागी हुई रानी का पुत्र कहकर उसका अपमान कर दिया।

जिसको सुनकर नन्हा ध्रुव रोते हुए अपनी मां के पास पहुंचा। और रानी सुनीति को सब कुछ बता दिया। उसने कहा कि दूसरी मां मुझे पिताजी की गोद में बैठने को मना करती हैं। जबकि मुझे अपने पिता की गोद में बैठना है। नन्हें ध्रुव की बात सुनकर रानी सुनीति उससे कहती हैं कि बेटा….

यदि कोई तुम्हारा अपमान करे, तो कभी तुम उसका बुरा मत सोचना या करना। क्योंकि जो व्यक्ति दूसरों को दुःख देता है उसे तीनों लोकों में माफी नहीं मिलती है।

रानी सुनीति आगे ध्रुव से कहती हैं कि यदि तुम अपने पिता की गोद का आनंद लेना चाहते हो। तो तुम इस सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु को सच्चे मन से स्मरण करो। यदि तुम्हारी भक्ति से वह खुश हो गए तो तुम्हें इस सम्पूर्ण संसार के दुखों से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा और तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी।

अपनी माता के मुख से यह सब सुनकर नन्हा ध्रुव अकेले ही वन की ओर चल दिया। जहां नारद ऋषि ने उसे भगवान विष्णु की आराधना विधि बताई।

जिसके बाद छोटा बालक ध्रुव यमुना नदी में स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की तपस्या में एकाग्रचित होकर बैठ गया। इस दौरान उसने पैर के एक अंगूठे पर खड़े होकर भगवान विष्णु की स्तुति की। कहते हैं तब ध्रुव के तेज और अंगूठे के भार से पृथ्वी नीचे दबने लगी।

जिससे प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिए। और उससे पूछा कि हे! नन्हे बालक मैं तुम्हारी भक्ति से काफी प्रसन्न हुआ हूं। बताओ तुम क्या वर मांगना चाहते हो? जिस पर ध्रुव ने भगवान विष्णु से कहा कि मेरी माता ने कहा था कि आप जगत के पालनहार हो।

Bhagwan Vishnu

ऐसे में यदि आप मुझे अपनी गोद में स्थान देते हैं तो मुझे अति प्रसन्नता होगी। मैं चाहता हूं आपकी गोद से कभी कोई मुझे नीचे ना उतार सके।

कहते हैं तभी भगवान विष्णु ने उस छोटे से बालक की भक्ति से प्रभावित होकर उसे यह वरदान दिया कि ये सम्पूर्ण ब्रह्मांड मेरी गोद के समान है। इसलिए अब तुम मेरी इस गोद यानि ब्रह्मांड में ध्रुव नामक एक तारे के रूप में स्थित रहकर सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करोगे।

तुम्हारा स्थान सप्त ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ होगा यानि वह सदा ही तुम्हारी परिक्रमा करेंगे। साथ ही तुम धरती पर करीब छत्तीस हजार वर्षों तक जीवनयापन करके मेरे पास आ जाओगे। और ब्रह्मांड की जिस दिशा में तुम्हारा स्थान होगा, वहां से तुम्हें कभी कोई हटा नहीं सकेगा। ऐसा कहते ही भगवान विष्णु वहां से अंतर्धान हो गए।

कहते हैं तभी से धरती पर ध्रुव नामक एक सामान्य बालक ध्रुव तारे के नाम से जाना जाने लगा और हमेशा के लिए अमर हो गया।

शिक्षा – उपरोक्त कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि हम तन, मन में शुद्धता का भाव रखकर नित्य ईश्वर की आराधना करते हैं तो ईश्वर हमारे समस्त दुखों को दूर करके हमारी जीवन नैया को पार लगा देते हैं।

आशा करते है आपको यह ज्ञानवर्धक जानकारी अवश्य पसंद आई होगी। ऐसी ही अन्य धार्मिक और सनातन संस्कृति से जुड़ी पौराणिक कथाएं पढ़ने के लिए हमें फॉलो करना ना भूलें।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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