जाने आज भी श्रीरंगम मंदिर में मौजूद है प्राचीन विमानों के अनेकों साक्ष्य, जानिए इस मंदिर से जुड़े अन्य तथ्य

श्रीरंगम मंदिर

सम्पूर्ण भारतवर्ष में भगवान विष्णु के अनेक मंदिर स्थापित हैं, जोकि हिंदू धर्म की ऐतिहासिक धरोहर के तौर पर जाने जाते है।

एक ऐसा ही प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडु राज्य के तिरुचिरापल्ली में कावेरी और कोलीदम नदियों के बीच स्थित है, जो भगवान विष्णु के प्रमुख 108 मंदिरों में से एक है। जिसका नाम है श्री श्रीरंगम मंदिर। 

श्रीरंगम मंदिर दक्षिण भारत के सभी अद्भुत वैष्णव मंदिरों और भारतवर्ष के विशाल मंदिरों में से  एक है। जिसे भूल वैकुंडम यानी धरती का स्वर्ग भी कहा जाता है।

इस मंदिर में भगवान विष्णु के रंगनाथन रूप की पूजा की जाती है। ये मंदिर भी श्री पद्मनाथ मंदिर की तरह काफी रहस्यमयी है। जिससे जुड़े आश्चर्यों के बारे में आज हम आपको आगे लेख में बताने वाले हैं।

क्या श्रीरंगम मंदिर में मौजूद हैं प्राचीन विमान (उड़नतश्तरी)?

श्रीरंगम मंदिर जिसका निर्माण आज से लगभग 2000 साल पहले हो चुका है, लेकिन आज भी मंदिर के कई रहस्यों के बारे में आम जनमानस को जानकारी नहीं है। जिसके बारे में हम बात करने वाले हैं….

साल 2015 में श्रीरंगम मंदिर के भीतर एक भूमिगत कमरे की खोज की गई थी। हालांकि इससे पहले इस भूमिगत कमरे में जाने वाले मुख्य दरवाजे को खोलने की युक्ति किसी के पास नहीं थी, लेकिन माना जाता है कि अधिकारियों ने दरवाजे को तोड़कर ही भूमिगत कमरे की खोज की होगी।

जिसे एक सप्ताह बाद ही अधिकारियों ने धातु के दरवाजों और ग्रेनाइट पत्थरों के माध्यम से बंद कर दिया। इतना ही नहीं, इस भूमिगत कक्ष के भीतर जमीन पर एक खुदाई भी देखने को मिलती है, जोकि आपको अन्य भूमिगत कक्ष की ओर ले जाती है।

जिसे भी अधिकारियों द्वारा पत्थर और पोल रखकर सील कर दिया गया।

ऐसे में प्रश्न ये है कि यदि इन भूमिगत कक्षों में कुछ खास नहीं है, तो अधिकारियों ने इसे खोलने के तुरंत बाद ही बंद क्यों कर दिया? क्या केवल इन भूमिगत कक्षों में भगवान विष्णु की मूर्तियां है या खजाना ही मिला है?

लेकिन अगर हम आपसे कहें कि इन भूमिगत कक्षों में प्राचीन विमान मौजूद हैं, तो क्या आप हमारी बात पर विश्वास करेंगे? अगर नहीं! तो मंदिर में बनी प्राचीन नक्काशी मंदिर में प्राचीन विमानों जैसे उड़नतश्तरी आदि के होने का वर्णन करती है। 

स्थानीय लोगों का भी मानना है कि मंदिर के भीतर इस कक्ष में करीब 10 फुट लंबा धातु का विमान मौजूद है, जिसे हिलाने पर काफी तेज आवाज होती है।

हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है कि हमें प्राचीन विमान जैसे उड़नतश्तरी आदि के बारे में कहीं से सुनने को मिल रहा है। 

भारत समेत दुनिया भर के कई देशों में खुदाई के बाद हमें प्राचीन विमानों के साक्ष्य मिले हैं। जोकि इस ओर इशारा करते हैं कि किसी दुर्घटना के बाद प्राचीन निर्माणकर्ताओं ने प्राचीन विमानों को सुरक्षित स्थानों या भूमिगत कक्षों में छिपा दिया होगा।

इसी तरह से श्रीरंगम मंदिर में भी हमें प्राचीन विमानों के साक्ष्य मिलते हैं, जिससे जुड़ी नक्काशी भी मंदिर में अनेक जगह देखने को मिलती है।

सबसे पहले नजर डालें तो श्रीरंगम मंदिर के जिस भूमिगत कक्ष में हमें प्राचीन विमान के साक्ष्य मिले हैं, जिसे आम जनता के लिए रहस्यमयी बना दिया गया है।

उस भूमिगत कक्ष के द्वार के ऊपर दो बंद दरवाजे और शंकु आकार का एक चिन्ह्न बना हुआ है, जोकि ऐसा लगता है कि मानो  जमीन के नीचे किसी चीज की ओर इशारा कर रहा हो।

ये सर्वविदित है कि प्राचीन निर्माणकर्ता नक्काशियों के माध्यम से सदैव प्राचीन रहस्यों और सभ्यताओं को उजागर करने का काम किया करते थे।

ऐसे में जब श्रीरंगम मंदिर के परिसर में हुई अद्भुत नक्काशी पर नजर डाली जाए, तो पाएंगे कि इस मंदिर में कई सारे उड़ने वाले प्राचीन विमानों की नक्काशी की गई है।

इतना ही नहीं, श्रीरंगम मंदिर के विशाल परिसर में धातु से निर्मित एक प्राचीन स्वर्ण विमान पहले से ही स्थापित है, जिसे भगवान विष्णु का विमान कहा जाता है। इस विमान का उल्लेख एक प्राचीन ग्रंथ श्रीरंग महात्मीयम में किया गया है।

जिसमें इस विमान के निर्माण नहीं बल्कि प्रकट होने वाली बात का वर्णन किया गया है।

इतना ही नहीं, इस विमान के ऊपर भगवान विष्णु की खूबसूरत नक्काशी की गई है, जिसके गर्भ गृह में भी कई भूमिगत कमरे मौजूद है, जिन्हें भी सुरक्षा दृष्टि के लिहाज से बंद कर दिया गया है।

पास ही में स्थित 1000 खंभों वाला हॉल भी भूमिगत कमरे के गुप्त रास्तों के होने की वजह से आम जनता के लिए बंद कर दिया गया है। जिससे ये साफ जाहिर होता है कि श्रीरंगम मंदिर में मौजूद भूमिगत कमरे प्राचीन विमानों का इतिहास समेटे हुए है, जोकि काफी अद्भुत और आश्चर्यजनक है।

श्रीरंगम मंदिर से जुड़े आश्चर्यों के बारे में जानने के बाद अब हम इसके सम्पूर्ण इतिहास के बारे में जानेंगे।

श्रीरंगम मंदिर का इतिहास

श्रीरंगम मंदिर के बारे में प्राचीन इतिहास में 10वीं सदी से लेकर 16वीं शताब्दी तक उल्लेख मिलता है। इस दौरान तिरुचिरापल्ली क्षेत्र पर चोल, पांड्य, होयसला, विजयनगर आदि साम्राज्य का शासन हुआ करता था।

जिनके तत्कालीन शासकों द्वारा ही श्रीरंगम मंदिर का पुननिर्माण कराया गया था। कहा जाता है कि चोल वंश के राजा जब एक तोते का पीछा करते हुए एक घने जंगल में पहुंचे, तब उन्हें भगवान विष्णु की रंगनाथ रूप में प्रतिमा मिली थी, तभी उन्होंने इसकी स्थापना कराई। हालंकि 14वीं सदी के आसपास श्रीरंगम मंदिर इस्लामिक कट्टरपंथियों की भेंट चढ़ गया था।

लेकिन आगे चलकर इस मंदिर के जीर्णोधार को लेकर कई सारे हिन्दू राजा महाराजा आगे आए। जिसमें प्राचीन इतिहास में प्रसिद्ध महान शासक टीपू सुल्तान का नाम भी आता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार जब गंगा, यमुना, कावेरी और सरस्वती नदी में श्रेष्ठता की होड़ छिड़ गई। तब चारों देवियां भगवान विष्णु के पास अपनी समस्या लेकर आई।

जहां भगवान विष्णु ने चारों देवियों से कहा कि आप चारों ही पूजनीय है, लेकिन महादेव की जटाओं से निकलने के कारण गंगा सर्वश्रेष्ठ हैं।

जिसके बाद कावेरी माता ने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की और उनसे वरदान पाया। भगवान विष्णु ने कावेरी नदी को वरदान दिया कि आने वाले समय में पृथ्वी पर कावेरी नदी श्री हरि के गले के हार की भांति बहेगी।

ऐसे में, एक बार जब ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के विराट रूप को देखने की इच्छा व्यक्त की। तब भगवान विष्णु ने रंगविमान में बैठकर अपने विराट रूप के दर्शन दिए थे।

जिनके इसी रंगनाथ रूप की प्रतिमा को ब्रह्मा जी ने विराज नदी के किनारे स्थापित कर दिया। कहा जाता है भगवान विष्णु के इसी रूप को आगे चलकर रंगनाथ स्वामी कहा गया, जिनके  दर्शन करने देवलोक तक से देवतागण आया करते थे। 

फिर त्रेतायुग में, जब भगवान श्री राम लंकापति रावण का वध करके अयोध्या लौट रहे थे, तब उन्होंने रंगनाथ स्वामी की प्रतिमा को लंका में स्थापित करने के लिए अपने भाई विभीषण से कहा।

जिसके बाद विभीषण जब रंगनाथ स्वामी की प्रतिमा को लंका की ओर ले जा रहे थे, तब वह कावेरी नदी के समीप रूक गए थे, जहां उन्होंने रंगनाथ स्वामी की पूजा अर्चना भी की।

उसके बाद जब वह प्रतिमा को लेकर लंका की ओर बढ़े, तब भगवान विष्णु ने कहा कि उन्होंने कावेरी माता को वरदान दिया था। जिसके कारण अब विभीषण उनकी प्रतिमा को यहीं स्थापित कर दे। कहते हैं तभी से रंगनाथ स्वामी कावेरी नदी के पास मौजूद हैं।

धार्मिक स्रोतों के मुताबिक, इस मन्दिर में हर दिन या 12 वर्ष में एक बार विभीषण इस मंदिर में रंगनाथ स्वामी के दर्शन के लिए आज भी आते हैं।

अन्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गौतम ऋषि ने भगवान विष्णु की काफी तपस्या की थी। तब इसी जगह पर आकर भगवान विष्णु ने उन्हें रंगनाथ स्वामी के रूप में दर्शन दिए थे, तभी से यहां स्वामी रंगनाथ की प्रतिमा मौजूद है।

श्रीरंगम मंदिर से जुड़े रोचक तथ्य

श्रीरंगम मंदिर के गर्भ गृह में भगवान विष्णु की स्थापित है। जिन्हें रंगनाथ स्वामी या रंगनाथर भी कहा जाता है। जबकि गर्भ गृह में स्थापित देवी लक्ष्मी की मूर्ति को रंगनायकी थायर कहकर संबोधित किया जाता है।

श्रीरंगम मंदिर के परिसर में 50 से भी अधिक मंदिर हैं। साथ ही 39 मंडप, 1 मुख्य मंडप, 9 सरोवर, 21 विशाल गोपुरम और 1000 खंभों वाला एक हॉल मौजूद है।

यह सम्पूर्ण मंदिर चारों ओर से 7 परतों वाली दीवारों से घिरा हुआ है, जिसकी एक-एक दीवार की लंबाई करीब 10 किमी है। साथ ही यह मंदिर करीब 156 एकड़ में बना भारत का विशाल मंदिर है।

इस मंदिर को थिरुवंगा, तिरुपति, पेरियाकोइल, भूलोगा वैकुंडम, भोगमंडलम आदि नामों से भी जाना जाता है। 

श्रीरंगम मंदिर में वैष्णव धर्म के रामानुजाचार्य के मूल शरीर को भी रखा गया है, कहा जाता है उन्होंने रंगनाथ स्वामी से ही प्राण त्यागने की अनुमति ली थी।

इस प्रकार, इस मंदिर में किसी व्यक्ति के मृत शरीर को रखा गया है, जिसको पूजा भी जाता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे ममी कहा जाता है, जिस पर करीब दो साल में एक बार चंदन और केसर का लेप लगाया जाता है।

आश्चर्य की बात है कि आज तक इस ममी को संरक्षित करने के लिए इस पर किसी तरीके का कोई रासायनिक मिश्रण का प्रयोग नहीं किया गया है।

श्रीरंगम मंदिर में हर महीने शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रंग जयंती करीब 8 दिनों तक मनाई जाती है। मान्यता है कि यहां कृष्ण दशमी पर तीर्थ स्नान करने से भी व्यक्ति को मोक्ष के समान फल प्राप्त होता है। 

ये मंदिर भगवान विष्णु का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान श्री हरि निद्रा की अवस्था में विद्यमान है।
 
इस मंदिर में प्रतिदिन 200 गरीब व्यक्तियों को आनंदम योजना के अन्तर्गत भोजन कराने की प्रथा है। साथ ही इस मंदिर में पूजा आदि के लिए ठेंकलाई प्रथा का चलन है।

श्रीरंगम मंदिर में वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने देखने को मिलते हैं। यहां के मंदिर और स्थापित मूर्तियों में ग्रेनाइट पत्थर, स्टुको आदि का इस्तेमाल किया गया है। इस मंदिर की वास्तुकला और इतिहास के बारे में तमिल शास्त्रों में वर्णन मिलता है। 

श्रीरंगम मंदिर को साल 2017 में यूनेस्को एशिया प्रशांत पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। 

श्रीरंगम मंदिर में गरुड़ की मूर्ति सबसे विशाल है। जबकि भगवान विष्णु के शेषनाग पर विराजित मूर्ति भी इस मंदिर की शोभा बढ़ा रही है।

यहां हर वर्ष दिसंबर से लेकर जनवरी के महीने में महोत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें दूर-दूर से भक्तगण सम्मिलित होने आते हैं। ये उत्सव करीब 20 दिनों तक चलता है।

जिसमें आरंभिक 10 दिनों को पागल पथु और अंतिम 10 दिन तक रा पथु उत्सव मनाया जाता है।

इसके अलावा मंदिर परिसर में वैकुंठ एकादशी, अंकुरपुराण, ध्रजरोहन, भेरीराथान, यागसला, ज्येष्ठाभिषेक, रथोत्सव, वसंतोत्सव, पवित्रोत्सव, श्री जयंती, थाईपुसम आदि भी हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं।

इस दौरान होने वाले ज्येस्थाभिषेक में श्री हरि की प्रतिमाओं को सोने चांदी में भिगोकर नहलाया जाता है।

इस प्रकार, भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास की धरोहर के तौर पर प्रसिद्ध श्रीरंगम मंदिर काफी प्राचीन और रहस्ययी है। जिसका धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है।

{आशा करते है आपको यह ज्ञानवर्धक जानकारी अवश्य पसंद आई होगी। ऐसी ही अन्य धार्मिक और सनातन संस्कृति से जुड़ी पौराणिक कथाएं पढ़ने के लिए हमें फॉलो करना ना भूलें।}

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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