भारत का प्राचीन इतिहास नहीं है केवल पौराणिक, छिपाया गया सच, प्राचीन शिक्षा व्यवस्था ही है काफी गौरवशाली

Indian History became Mythology

सम्पूर्ण विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, समस्त देवी देवताओं ने जन्म लिया है। यही कारण है कि आधुनिक इतिहासकारों ने भारत के प्राचीन इतिहास को पौराणिक बताकर वर्तमान और आने वाली पीढ़ी को गुमराह करने का काम किया है।

उनके मुताबिक, भारत के इतिहास के बारे में केवल यहां के धार्मिक ग्रथों में जो लिख दिया गया है, वहीं सत्य है और पूर्णतया पौराणिक है। लेकिन भारत का प्राचीन इतिहास काफी विशाल और गौरवशाली रहा है। भारत वहीं देश है जहां अनेक युगों में अलग-अलग महान व्यक्तियों ने जन्म लिया है।

भगवान श्री राम से लेकर श्री कृष्ण की जन्मस्थली यही देश रहा है। यहां शांतनु पुत्र भरत ने जन्म लिया, यहां गुरु द्रोण और भीष्म पितामह जैसे योद्धा जन्मे। आधुनिक भारत के इतिहास पर नजर डालें तो यहां वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, चन्द्रगुप्त जैसे शूरवीर पैदा हुए हैं।

इन युग पुरुषों के अलावा, भारतीय समाज की प्राचीन सभ्यताएं भी विश्व की किसी सभ्यता से कम नहीं है। भारत की सिंधु, हड़प्पा और दक्षिण भारतीय सभ्यताएं विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताएं हैं।

लेकिन इस पवित्र भूमि पर बाहरी आक्रांताओं के आक्रमण ने इसकी प्राचीन विरासत को पूर्णतया नष्ट कर दिया। यही कारण है कि आधुनिक युवा पीढ़ी जिन वैज्ञानिक और सामाजिक बदलावों के लिए विदेशी वैज्ञानिकों और लोगों का एहसान मानती है, असल में उसका सूत्रपात भारत की भूमि से ही हुआ।

भारत ही योग, आयुर्वेद, मार्शल आर्ट, गणितीय सूत्रों, शून्य, खगोलीय खोज, चिकित्सा, ज्योतिष, वेद और शास्त्रों का जनक रहा है, लेकिन दुनिया भर में भारत की छवि पुन: विश्व गुरु में ना बदलने पाए, इसके लिए आधुनिक इतिहासकारों ने आज तक दुनिया से भारत और उसके महान लोगों का सच छुपाया।

दुनिया के लोगों को अब तक यही बताया जा रहा है कि भारत में प्राचीन काल में ऋषि मुनि हुआ करते थे, जोकि दिन रात पेड़ों के नीचे बैठकर तपस्या करते थे। लेकिन असल में, भारत ही सम्पूर्ण विश्व में ऐसा देश है जहां सबसे अधिक प्राकृतिक और मानवीय परिवर्तन हुए हैं।

इतना ही नहीं, भारत ही उन महान लोगों की कर्मभूमि है, जिनके द्वारा दिखाए गए पदचिन्हों पर चलकर सम्पूर्ण विश्व आज प्रगति कर रहा है।

ऐसे में हमारी वर्तमान पीढ़ी भारत के प्राचीन और महत्वपूर्ण इतिहास से रूबरू हो सके, उसके लिए आवश्यक है कि वह प्राचीन भारतीय इतिहास को समझने और उससे सीखने का प्रयास करे,

ताकि आने वाली पीढ़ी और समस्त दुनिया के सामने भारत के प्राचीन इतिहास को उजागर किया जा सके और सबको ये बताया जा सके कि भारत ही

एक ऐसा देश है जिसने सदैव विश्व का मार्गदर्शन ही किया है। आगे अब हम जानेंगे कि कैसे विदेशी और मुगल आक्रांताओं ने भारत के प्राचीन और ऐतिहासिक दस्तावेजों को पूर्णतया नष्ट कर दिया, ताकि भारतीय समाज का सच और उसका प्रभुत्व पूर्णतया दुनिया से समाप्त हो जाए।

यही कारण है वर्तमान समय में भारतीय छात्र मैकाले द्वारा संचालित शिक्षा पद्वति का अनुसरण कर रहे हैं और प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली, जोकि एक समय पर सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करती थी और दूर दूर से लोग भारतीय शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत शिक्षा ग्रहण करने आते थे।

कैसे विदेशी आक्रांताओं ने नष्ट कर दी प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली?

भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्रणाली रही है। प्राचीन समय में आश्रमों, मंदिरों और गुरुकुलों के माध्यम से उच्च कोटि की शिक्षा प्रदान की जाती थी।

परंतु भारत पर जैसे-जैसे मुगलों का आक्रमण हुआ और भारत पर कब्जा करने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी, वैसे वैसे भारत की प्रत्येक प्राचीन सभ्यता ध्वस्त होने लगी।

सर्वविदित है कि अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाया। इसके साथ ही उन विदेशी आक्रांताओं का उद्देश्य भारत की पौराणिक सभ्यताओं को नष्ट करके अपना वर्चस्व स्थापित करना रहा था। लेकिन क्या आप यह बात जानते हैं कि हमारे भारतीय शिक्षा प्रणाली को भी इन्हीं विदेशियों ने ध्वस्त कर दिया ?

जी हां, अंग्रेजों के आने से पहले भारत में जो शिक्षा प्रणाली थी उसका मुकाबला संसार में कोई भी देश नहीं कर सकता था। भारतीय शिक्षा पद्धति इस प्रकार व्यवस्थित की गई थी कि यहां प्रत्येक क्षेत्र का ज्ञान और कलाओं में निपुण किया जाता था।

वर्तमान समय में भारत के विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए विदेशों में पढ़ने जाते हैं। परंतु प्राचीन समय में उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्ति के लिए विदेशी भारत में पढ़ने के लिए आते थे।

आज हम आपको बताने वाले हैं कि हमारी प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति अंग्रेजों के आने से पूर्व कितनी समृद्धि थी और अंग्रेजों ने किस प्रकार हमारी शिक्षा पद्धति को नष्ट किया?

प्राचीन भारतीय शिक्षा का गहना है, “तक्षशिला विश्वविद्यालय”

Takshashila Bharat Main Tha Duniya Ka Pehla Vishvavidhyalya

विश्व का पहला विश्वविद्यालय तक्षशिला विश्वविद्यालय को कहा जाता है। यह विश्वविद्यालय  भारत में प्रारंभ हुआ था। इस विश्वविद्यालय में प्रत्येक क्षेत्र की अध्ययन प्रणाली मौजूद थी, हर क्षेत्र में विद्यार्थियों को निपुण किया जाता था।

यहां की कुछ शिक्षण प्रणाली को देखते हुए विदेशों से कई विद्यार्थी इस महा विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आते रहे।

आठ वर्ष तक घर की शिक्षा तत्पश्चात् गुरुकुल शिक्षा

Gurukul Shiksha

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के तहत बालक बालिकाओं को 8 वर्ष तक घर पर शिक्षा दी जाती थी, जिसमें घर के माता-पिता बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान किया करते थे। 8 वर्ष की आयु पूर्ण होने के पश्चात बालक बालिकाओं का उपनयन संस्कार करके उन्हें गुरु के पास भेज दिया जाता था।

गुरुकुल में जाकर गुरु से धनुर्विद्या, मल्लविद्या भवन निर्माण, लोहारी इत्यादि भिन्न भिन्न प्रकार की कलाओं को सीखने के 8-10 वर्ष बाद उनमें से कुछ विद्यार्थी विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण हेतु चले जाया करते थे।

उस समय के उच्च कोटि के विश्वविद्यालयों में विभिन्न शास्त्रों और विभिन्न कलाओं को सिखाया जाता था। स्त्रियों की शिक्षा की भी उचित प्रणाली मौजूद थी।

मुस्लिम आक्रांताओं ने किया विश्वविद्यालयों को ध्वस्त

प्राचीन शिक्षा प्रणाली जिसका मुकाबला संसार में कहीं नहीं है, उसको समाप्त करने की रणनीति  तैयार होने लगी। लगभग 900 वर्ष पहले जब मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत पर आक्रमण करना शुरू किया, तब भारत की परिस्थितियां परिवर्तित होने लगी।

बख्तियार खिलजी नामक अनपढ़ सरदार ने भारत के नालंदा विश्वविद्यालय को ध्वस्त करवा दिया।इसके साथ ही अनेक मुस्लिम आक्रांताओं ने हमारे छोटे बड़े विश्वविद्यालयों को नष्ट करना शुरू कर दिया।

आज जो भी हम मुगल आर्ट और मुगल स्थापत्य के विषय में जानते हैं दरअसल वास्तव में यह भारतीय स्थापत्य ही हैं। जो इस्लामी राजाओं के लिए गुलामी वश बनाए गए।

यदि वास्तव में यह वास्तुकला का ज्ञान इनके पास होता है तो इन कलाओं का रूप हमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान इत्यादि मुस्लिम देशों में देखने को भी मिलता।

अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा कर भारतीय शिक्षा प्रणाली को किया आहत

अंग्रेजों ने भारत पर अपना वर्चस्व स्थापित करने से पूर्व यहां की शिक्षा प्रणाली के विषय में सर्वेक्षण करना शुरू कर दिया था। सन 1757 में प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों ने बंगाल पर कब्जा कर लिया।

अपनी शासन व्यवस्था को अमल में लाते समय उन्हें यह ज्ञात हुआ कि पूरे बंगाल में कर वसूली लायक भूभाग में से 34% भाग में किसी प्रकार की वसूली नहीं की जा सकती थी, जिसका कारण यह था कि यह भाग पाठशालाओं के लिए रखा गया था।

ऐसी स्थिति में अंग्रेजों का जहां कहीं भी शासन लागू हुआ उन्होंने वहां शिक्षा सर्वेक्षण शुरू कर दिया था।

मद्रास पर कब्जा करने के पश्चात मद्रास प्रेसीडेंसी में गवर्नर जनरल के पद पर मेजर जनरल सर थॉमस मुनरो आसीन हुए थे, जिन्होंने पाठशालाओं का सर्वेक्षण करने की घोषणा की।

विभिन्न कलेक्टरों द्वारा मद्रास सर्वेक्षण जारी किया गया जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था, इंग्लैंड की शिक्षा व्यवस्था से अच्छी है।

जब अंग्रेजों का पूरे पंजाब पर स्वामित्व हो गया, तब लगभग 50 वर्षों के बाद, पंजाब में भारतीय शिक्षा प्रणाली पर सर्वेक्षण हुआ। जी.डब्लू. लेटनर नाम के ब्रिटिश आईसीएस अधिकारी ने इस सर्वेक्षण का काम किया था।

उनमें से कुछ सर्वेक्षणों की रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने पुस्तक भी लिखी – History of Indigenous Education in Punjab : Since Annexation and in 1882. इसमें लेटनर कहते हैं, ‘भारत में काफी अच्छी विकेंद्रित शिक्षा व्यवस्था है।’

जी डब्लयू लेटनर ने लेटनर व्यक्तित्व समृद्धि व्यक्ति थे, 1882 में उन्हीं ने पंजाब यूनिवर्सिटी की स्थापना की और भारतीय शिक्षा प्रणाली का गहन अध्ययन किया। जिसके 1870-1875 के बीच में उन्होंने उत्तर पंजाब के होशियारपुर जिले का वृहद सर्वेक्षण किया,

जिसके मुताबिक उन्होंने यह खुलासा किया कि इस जिले में साक्षरता दर 84% है। लेकिन अंग्रेजों के भारत से जाते समय सन 1948 में किए गए सर्वेक्षण में यह दर मात्र 9% बची थी। उस समय अंग्रेजों ने, गांव की पाठशालाओं को आवंटित जमीन को अपने कब्जे में कर लिया था।

भारत की विकेंद्रित शिक्षा व्यवस्था बंद करके उसे केंद्रीकृत किया गया और अंग्रेजों के अनुसार पाठ्यक्रम निर्धारित होने लगा। जिसके चलते भारतीय शिक्षा प्रणाली को गहरा प्रभाव पड़ा।

इन सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट है कि हमारी प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली बेहद समृद्ध और विकेंद्रित रही। लेकिन अंग्रेजों ने भारत पर अपना शासन स्थापित करने हेतु भारतीय शिक्षा प्रणाली को भी ध्वस्त कर दिया।

आज हमें इतिहास में यदि अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली के विषय में कुछ भी पढ़ाया जाता है, तो वह एक मिथ्य साबित होता है।

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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