वर्षों पहले हुआ करते थे भारत के नागरिक, अब हैं यूरोपीय जानिए क्या है रोमानी लोगों का इतिहास

romani people

जैसा कि विदित है कि प्राचीन मानव घुमंतु था। यानि वह कभी भोजन की तलाश में, तो कभी जलवायु परिवर्तन की वजह से इधर-उधर स्थान परिवर्तन करता रहता था। 

इसी प्रकार से, समय-समय पर भारत भूमि में कई जनजातीय उत्पन्न हुईं, जो किन्हीं कारणों की वजह से आज विदेशी जमीं पर जाकर बस गई हैं, लेकिन भारत ही उनके पूर्वजों की धरोहर रहा है, यानि वे लोग आज विदेशी हैं, लेकिन पूर्व में उनके वंशज कहीं ना कहीं भारत से ही जुड़े रहे हैं। 

हमारे आज के इस लेख में हम आपको वर्तमान में यूरोप की धरती पर बसे रोमानी लोगों के इतिहास के बारे में बताने वाले हैं। जिनके बारे में जानना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि वह लोग यूरोप जाने से पहले भारत के ही वंशज थे। लेकिन ऐसे क्या कारण रहे, जिनकी वजह से उन्हें भारतीय भूमि छोड़कर जाना पड़ा। इस बारे में हम आपको आगे बताएंगे। इससे पहले जान लेते हैं। 

कौन हैं रोमानी लोग? ( Who are Romani People )

Romani People

जिस तरह से हमारा भारत देश एशिया महाद्वीप के अंतर्गत आता हैं। ठीक उसी प्रकार से, रोमानी लोग यूरोप महाद्वीप के अंतर्गत आते हैं, या कहें कि यूरोप के निवासी हैं। जिन्हें रोमा जनजाति और जिप्सी (घुमक्कड़) के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि सामाजिक भेदभाव के चलते यूरोप में इनको गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करना पड़ रहा है। लेकिन एक समय ऐसा था, जब ये भारतीय भूमि का हिस्सा हुआ करते थे।

ऐतिहासिक स्रोतों के मुताबिक, जब भारत में आर्य जाति के लोगों का समूह विभाजन हो रहा था, तब एक समूह ने यूरोप की ओर रुख कर लिया था। जबकि कई लोगों का मानना है कि जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण कर दिया था, तब रोमानी लोगों ने भारत छोड़ दिया था और यूरोप के आसपास जाकर बस गए थे।

अधिकांश लोग इस बात को सत्य मानते हैं कि रोमा समुदाय के लोगों ने भारत के राजस्थान राज्य से करीब 250 ईसा पूर्व पलायन कर लिया था। कहीं पर ऐसा भी माना जाता है कि भारत पर हूणों के आक्रमण के बाद ही रोमानी वंशज यूरोप चले गए थे।

हालांकि कई वर्षों तक ये बात किसी को पता नहीं लगी, लेकिन एक शोध के बात मालूम चला कि जिप्सी या रोमानी लोगों की भाषा और संस्कृति एक हद तक भारतीयों से मिलती जुलती है। तभी से रोमानी लोगों को भारतीय वंशज कहा जाने लगा। जिनमें पाया जाने वाला रक्त समूह भारतीय लोगों से काफी मिलता जुलता है। 

भारतीय भूमि से कैसे अलग हुए रोमानी लोग?

रोमानी लोगों के भारत से पलायन को लेकर कहा जाता है कि 10वीं सदी के उत्तरार्ध में रोमानी लोग भारत छोड़कर चले गए थे। जिनकी वर्तमान में जनसंख्या करीब 2 से 5 करोड़ के आसपास है। रोमानी लोग अधिकांश मध्य और पूर्वी यूरोप में अल्पसंख्यक जनजातियों की भांति निवास करते हैं और रोमानियों की अधिकतर जनसंख्या गरीबी से जूझ रही है।

इतना ही नहीं, अधिकतर देश रोमानी लोगों को अपने यहां से खदेड़ने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके पीछे कई राजनैतिक कारण हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस की तत्कालीन सरकार ने अनेक रोमा समुदाय के लोगों को जर्मनी भेज दिया था, जहां नाजियों ने इनपर काफी जुल्म ढहाए थे और करीब 2 लाख से ज्यादा रोमा लोगों को मार दिया था।

कई देशों ने तो रोमा समुदाय के लोगों को आतंकवादी और वेश्यावृत्ति बढ़ाने के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया था। इतना ही नहीं, साल 2011 में बुल्गारिया की राजधानी सोफिया में रोमा समुदाय के खिलाफ एक प्रदर्शन भी हुआ था, जिसमें गैस द जिप्सी, यानि रोमा समुदाय के लोगों को गैस चैंबरों में डालकर मार डालने की बात कही गई थी।

रोमा समुदाय के लोगों का हाल कुछ ऐसा है कि कई देशों ने तो उन्हें अभी तक नागरिकता ही नहीं दी है। इस प्रकार, रोमा समुदाय सदैव से ही पीड़ितों की भांति जीते आए हैं। जिसके चलते भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने रोमा समुदाय के इतिहास को विपदा और विपत्तियों का इतिहास बताया है। 

रोमानी लोग वैसे तो दुनिया भर के अलग-अलग देशों में निवास कर रहे हैं, लेकिन अधिकतर यूरोप के निवासी हैं। कहा जाता है कि भारत से पलायन के बाद ये घुमंतु या बंजारे रोमा लोग बाइजेंटाइन साम्राज्य से जुड़ गए थे, जोकि स्वयं को रोमानी साम्राज्य का ही अभिन्न अंग मानता था, यही कारण है कि ये भारतीय वंशज आगे चलकर रोमानी कहलाए।

इतिहासकारों की मानें, तो रोमा समुदाय के लोग भारत से स्वयं नहीं गए थे, बल्कि मुगल आक्रांता महमूद गजनवी जबरदस्ती उन्हें अपने साथ दास बनाकर अफगानिस्तान ले गया था। जहां से ही 15वीं सदी के आसपास मुक्त होकर रोमानी लोग यूरोप चले गए। कहा जाता है रोमानी लोगों के पूर्वज 1500 वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में रहा करते थे।

रोमानी लोगों की बोलियों में मिलता है भारतीय भाषाओं का समावेश….

रोमा जनजाति के लोगों की भाषा रोमानी है, लेकिन उनकी बोलियों में आज भी राजस्थानी, पंजाबी और गुजराती भाषाओं की झलक मिलती है।

साथ ही एक शोध में ये सामने आया है कि रोमानी भाषा के अधिकांश शब्द संस्कृत और हिंदी भाषा से ही लिए गए है, जैसे रोमानी लोग गिनतियों में एक के लिए येक, दो के लिए दुई और तीन के लिए त्रिन का प्रयोग करते थे। कई व्याकरण विशेषज्ञ रोमानी भाषा को डोमरी के परिवार की बहन भाषा मानते हैं और मानते हैं कि रोमानी भाषा के अधिकांश शब्द हिंदी और अंग्रेजी भाषा से मिलते हैं।

इतना ही नहीं, रोमानियों की देवी सेंट सारा को भी भारतीय समाज में पूजी जाने वाली मां दुर्गा का ही रूप कहा गया है। जिन्हें रोमानी लोग दुर्गा माता की तरह ही एक मेले के आयोजन के दौरान नदी में विसर्जित कर देते हैं।

हालांकि रोमा समुदाय के लोग खुद को हिंदू नहीं मानते, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वे पूर्व में भारतवंशी नहीं रहे हैं। ऐसे में रोमा समुदाय के लोग आज विदेशों की धरती पर जीवन बसर कर रहे हैं, लेकिन अधिकतर गरीबी और लाचारी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। 

भारत सरकार देगी रोमानी लोगों को संरक्षण?

जब से ये बात सामने आई है कि रोमानी भारतीय वंशज है। तभी से उनके मानवाधिकारों और नागरिकता को लेकर विश्व स्तर पर बातचीत होने लगी है। यही कारण है कि जब साल 2003 में डॉ. श्याम सिंह शशि को पदम भूषण मिला था, तब उन्होंने प्रवासी दिवस के अवसर पर रोमा समुदाय को भुखमरी से बचाने के लिए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जी को चिट्ठी लिखी थी।

साल 2001 में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की ओर से अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें रोमा समुदाय के 33 प्रतिनिधियों को आमंत्रित कर रोमा समुदाय की नागरिकता और उन्हें अन्य सहायता देने की बात प्रमुखता से कार्यक्रम में उठाई गई थी।

इसके बाद वर्ष 2015-16 में जब अंतरराष्ट्रीय रोमा कांफ्रेंस एंड कल्चर फेस्टिवल की शुरुआत हुई, तब रोमा समुदाय के लोगों को भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भारतीय कहकर संबोधित किया था। साथ ही उन्हें 20 हजार भारतीयों का वंशज भी कहा था।

रोमानियों के लिए हुआ था विश्व कांग्रेस का आयोजन…

1971: रोमा जाति ने किया स्वयं को संगठित, विश्व रोमानी कांग्रेस का आयोजन।

1978: रोमानियों ने बताया खुद को भारतवंशी, दूसरी रोमानी कांग्रेस का आयोजन, जेनेवा में।

1981: तीसरी विश्व रोमानी कांग्रेस का आयोजन, गोंटिगेन में।

1990: चौथी विश्व रोमानी कांग्रेस का आयोजन, पोलैंड में।

24 दिसंबर 1973: पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह द्वारा भारतीय रोमानी अध्ययन संस्थान का आयोजन, चंडीगढ़ में।


रोमा समुदाय के लोग है अद्भुत प्रतिभा के धनी 

आपको बता दें कि मशहूर कॉमेडियन चार्ली चैपलिन समेत जाने माने संगीतकार एल्विस प्रेसली और चित्रकार पाब्लो पिकासो आदि रोमा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। कहा जा सकता है कि रोमा समुदाय के लोग काफी प्रतिभाशाली हुआ करते हैं। जिन्होंने विषम परिस्थितियों के बावजूद अपनी संस्कृति, सभ्यता, परंपरा और पहचान को खोने नहीं दिया।

यही कारण है कि रोमा समुदाय या रोमानी लोग अधिकतर कारीगर, शिल्पकार, कलाकार और संगीतज्ञ थे। इतना ही नहीं, रोमानी लोगों को फ्रांस में मानुष, जर्मनी में सिंती, मध्य एशिया में जोट्स, स्पेन में काले, बुल्गारिया में त्सिगानी आदि कहकर पुकारा जाता है। साथ ही इनके अस्तित्व को बनाए रखने के लिए हर वर्ष 8 अप्रैल को जिप्सी दिवस मनाया जाता है।

रोमानी लोगों की अद्भुत प्रथाएं और रीति रिवाज

  • जिप्सी लोग भारतीय फिल्में देखना अधिक पसंद करते हैं
  • रोमानी लोगों में तेज से बोलने की प्रथा नहीं है।
  • रोमानी समुदाय के लोग बालों को अत्यधिक छोटा रखना गलत मानते हैं।
  • जिप्सी लोगों के यहां परिवार का इकलौता बेटा कानों में बाली पहनकर रहता है।
  • रोमा समुदाय के लोग ध्रूमपान और शराब का सेवन करना सही मानते हैं।
  • जिप्सियों में महिलाओं को तब तक महिला का दर्जा नहीं दिया जाया है, जब तक वह शिशु को जन्म नहीं दे देती हैं।
  • इनका राष्ट्रीय पेय पदार्थ चाय है। जबकि जिप्सी लोग काली चाय पीना भी काफी पसंद करते हैं।
  • रोमानी लोग पारंपरिक नृत्य, संगीत आदि में अधिक रुचि रखते हैं।
  • रोमा समुदाय के लोग टैरो कार्ड, क्रिस्टल बॉल और जादू टोना में अत्यधिक विश्वास रखते हैं।
  • इनके यहां भूत प्रेत और बुरी आत्माओं को दूर भागने के लिए अलग-अलग तरह के प्रयत्न किए जाते हैं।

    इस प्रकार, रोमानियों का इतिहास आरंभ से ही भारतवर्ष से जुड़ा रहा है, जोकि वर्तमान में अपने पूर्वजों की भांति ही काफी समस्याओं से जूझ रहे हैं। जिनके अस्तित्व को लेकर विश्व स्तर पर बहस छिड़ी हुई है, जिसमें भारत की सरकारें रोमा समुदाय के लिए क्या कदम उठाती है, ये देखने योग्य है।

आशा करते है आपको यह ज्ञानवर्धक जानकारी अवश्य पसंद आई होगी। ऐसी ही अन्य कथाएं पढ़ने के लिए हमें फॉलो करना ना भूलें।

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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