जानिए, 10 भारतीय विद्वानों के बारे में जिनके कारण ही कश्मीर कहलाया ज्ञान-विज्ञान की केंद्र स्थली

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कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, जिसे धरती पर स्वर्ग की संज्ञा दी जाती है। कश्मीर को प्राचीन समय से ही ज्ञान विज्ञान की केंद्र स्थली माना गया है, यानि कश्मीर से ही ज्ञान का प्रकाश प्रज्ज्वलित होकर सम्पूर्ण विश्व को रोशनी प्रदान करता है।

प्राचीन समय में तो भारतीय गुरुकुलों और आश्रमों में शिक्षा लेने वाले विद्यार्थियों को कश्मीर दिशा की ओर मुख करके बैठा दिया जाता था, ताकि उन्हें असीम ज्ञान की प्राप्ति हो।

ऐसे में कश्मीर को लेकर एक श्लोक भी काफी प्रचलित है

नमस्ते शारदे देवि काश्मीर पुरवासिनी।

त्वमाहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे।।

हे कश्मीर में विराजने वाले मां शारदा! आप अपने बालकों को विद्या का दान देकर सम्मानित करें।।

कश्मीर के विषय में हमारे धार्मिक ग्रंथों जैसे रामायण और महाभारत में भी उल्लेख मिलता है। लेकिन हमारे आज के इस लेख में हम आपको कश्मीर के राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक इतिहास से परे, उस दौर के लोगों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने कश्मीर को जन्नत बनाने में सहयोग किया। ये वहीं लोग थे,

तो चलिए जानते हैं कौन थे वे लोग जिनकी वजह से ही कश्मीर सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान के परम भंडार के तौर पर जाना जाता है।

  • ऋषि कश्यप:-

ऋषि कश्यप भारतीय समाज के उन महान ऋषियों में से एक थे, जिन्होंने समाज में संस्कृति और सभ्यता का विकास किया था। कहा जाता है कि ऋषि कश्यप के नाम पर ही कश्मीर का नाम रखा गया था।

इतना ही नहीं, इन्हीं के नाम पर कैस्पियन सागर (कश्यप सागर) का भी नाम रखा गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ऋषि कश्यप ने आरंभ में कश्मीर घाटी जोकि झील हुआ करती थी, उसका पानी समाप्त करके उसे खूबसूरत घाटी में परिवर्तित कर दिया था।

साथ ही ऋषि कश्यप को हिंदू धर्म के सप्तऋषियों में प्रमुख दर्जा दिया गया है। जिनका विवाह ब्रह्मा जी की 13 पुत्रियों से हुआ था, आगे चलकर ऋषि कश्यप देवताओं और दैत्यों के पिता कहलाए।

इतना ही नहीं, ऋषि कश्यप के 8 नाग पुत्रों के नाम पर ही कश्मीर के अनेक स्थानों का नाम रखा गया है, जैसे कि अनंतनाग।

इसके अलावा, ऋषि कश्यप ने कश्मीर की पवित्र भूमि पर रहकर कई सारे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना भी की थी, इसलिए जब भी कश्मीर को जन्नत या ज्ञान विज्ञान का केंद्र बनाने का श्रेय किसी को दिया जाता है, तो उसमें ऋषि कश्यप का नाम सबसे पहले लिया जाता है।

प्रमुख रचनाएं:- कश्यप संहिता, स्मृति ग्रंथ।

  • शंकराचार्य:-

भारत के महान दार्शनिक के तौर पर प्रसिद्ध आदि शंकराचार्य जब आध्यात्मिक भ्रमण पर कश्मीर गए। कहते हैं तब उन्हें वहां परम शक्ति के दर्शन हुए थे।

उनका मानना था कि मूर्ति देवताओं का प्रतीक नहीं होती, ऐसे में जब उन्होंने इसे सिद्ध करने के लिए किसी देवता की मूर्ति पर हाथ मारा, तब उसमें से रक्त बहने लगा और कहा जाता है उन्हें एक कन्या में दिव्य शक्ति के दर्शन हुए थे।

तभी से वह दिव्य शक्ति का गुणगान करने लगे। इतना ही नहीं, शंकराचार्य ने कश्मीरी पंडितों के साथ शास्त्रार्थ भी किया था, इस दौरान जब वह विजयी हुए, तब साक्षात् देवी शारदा ने उन्हें दर्शन दिए और आज उसी स्थान पर शारदापीठ स्थापित है।

आदि शंकराचार्य के कश्मीर यात्रा पर अनेकों वृतांत लिखे गए हैं, जिनमें ऐसा वर्णित है कि शंकराचार्य कश्मीर आए थे और उन्होंने यहीं आकर दिव्य शक्ति के दर्शन किए थे और अनेकों

महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना भी की। इनकी कश्मीर में लोकप्रियता के चलते आदि शंकराचार्य का वहां एक मंदिर भी मौजूद हैं।

प्रमुख रचनाएं:- साधनपंचकम, विवेकचूडामनि, ऐतरोपनिषद आदि।

  • कालिदास:-

एक कश्मीरी पंडित के अनुसार, कालिदास का जन्म कश्मीर में हुआ था। जिसको सत्य मानते हुए लक्ष्मी धर नामक एक संस्कृत कवि ने भी कालिदास जी का कश्मीरी संबंध बताते हुए द बर्थ प्लेस ऑफ कालिदास नामक किताब को रचित किया था।

जबकि कश्मीर के जाने माने विद्वान कल्ला के अनुसार,  कालिदास के द्वारा रचित नाटक शकुंतला प्रत्याभिज्ञ कश्मीर के शैव संस्कृति की एक शाखा है, जिससे स्पष्ट होता है कि कालिदास का कश्मीर से जुड़ाव रहा है।

कहा जाता है कि कालिदास को जब उनकी पत्नी ने धुत्कार दिया था, तब उन्होंने हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक भ्रमण किया था और मां काली की घोर तपस्या से स्वयं को एक श्रेष्ठ कवि के तौर पर स्थापित किया।

कालिदास ने संस्कृत भाषा में कई सारे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की थी।

प्रमुख रचनाएं:-  अभिज्ञान शाकुंतलम, कुमार संभवम्, मेघ दूतम, रघुवंशम।

  • पिंगल:-

आचार्य पाणिनि के छोटे भाई महर्षि पिंगल एक महान लेखक थे। इन्हें भारतीय गणितज्ञ के तौर पर भी जाना जाता है। इनका जन्म 400 ईसा पूर्व से लेकर 200 ईसा पूर्व हुआ था।

जिन्हें छंदशास्त्र की रचना का श्रेय दिया जाता है। इसके अन्तर्गत इन्होंने बाइनरी संख्याओं, पास्कल त्रिभुज की खोज की थी। साथ ही इन्होंने लघु और दीर्घ मात्राओं का सूत्रपात किया था।

कहा जाता हैं पिंगल ने कश्मीर में रहकर भी अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की थी। इनके द्वारा रचित ग्रंथों की गणना प्रमुख वेदों में की जाती है।

प्रमुख रचनाएं:- छंद:शास्त्र या चंडशास्त्र।

  • अभिनव गुप्त और उत्पल देव:-

कश्मीर में बौद्ध धर्म के बाद शैव मत ने पांव पसारे। जिसके प्रचार-प्रसार के लिए महान भारतीय गणितज्ञ अभिनव गुप्ता ने कश्मीर में तंत्रालोक और प्रत्यभिज्ञ की रचना की थी।

साथ ही उत्पलदेव ने भी शंकराचार्य के द्वारा रचित अद्वैतवाद दर्शन को कश्मीर में संशोधित किया था। जिसके अनुसार, ब्रह्म सत्य है तो जगत भी सत्य है।

इन दोनों ही महान विद्वानों को कश्मीर में शैव धर्म के प्रचार प्रसार और तंत्र के ज्ञाता के तौर पर जाना जाता है। जबकि अभिनव गुप्त का जन्म भी कश्मीर में करीब दसवीं शताब्दी में हुआ था, जिन्हें शेषावतार माना गया है।

प्रमुख रचनाएं:- तंत्र शास्त्र, गणितज्ञ साहित्य।

  • लगध मुनि :-

लगध मुनि ने ज्योतिष शास्त्र विद्या की दिशा में भारतीयों को महत्वपूर्ण जानकारियां सुलभ कराई हैं। इन्होंने वेदांग ज्योतिष नामक ग्रंथ की रचना की है, जोकि आधुनिक समय में भी ज्योतिष की आत्मा कहलाता है।

इन्हें हिंदू वेदों में भी मौजूद ज्योतिष भाग को रचित करने का श्रेय दिया जाता है। धार्मिक स्रोतों के अनुसार, लगध मुनि ने कश्मीर की घाटियों में रहकर ही वेदांग ज्योतिष की रचना की थी, जिसे भारतीय खगोलशास्त्र के आधार के तौर पर प्रयोग किया जाता है।

प्रमुख रचनाएं:- वेदांग ज्योतिष।

  • चरक और वाग्भट:-

भारतीयों ने सम्पूर्ण विश्व को आयुर्वेद से परिचित कराया है। जिसका सूत्रपात चरक और वाग्भट जैसे महान विद्वानों ने किया है। चरक ने अपने ग्रंथ चरक संहिता में अनेक रोगों का समाधान बताया है। जिस कारण आज चरक संहिता वैद्य साहित्य में अहम स्थान रखती है।

इसी कड़ी में एक और महत्वपूर्ण नाम दृष्टिगोचर होता है, वाग्भट। जिन्होंने भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांग संग्रह और अष्टांग हृदय की रचना की थी। इसमें आयुर्वेद के आठों अंगों की जानकारी दी गई है।

कहा जाता है इन दोनों महान विद्वानों ने भी कश्मीर की घाटी में रहकर ही अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की है।

प्रमुख रचनाएं:- चरक संहिता, अष्टांग संग्रह, अष्टांग हृदय।

  • विष्णु शर्मा:-

कहा जाता है कि कश्मीर में रहकर ही विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र की कहानियां लिखी थीं। विष्णु शर्मा एक महान् लेखक थे, जिनकी संस्कृत भाषा पर अच्छी पकड़ थी। उन्होंने भी कश्मीर की घाटियों में रहकर नीति कथाओं और पंच तंत्र की कहानियों को रचा था।

पंचतंत्र में पांच कहानियों का संग्रह है, जिसकी रचना का काल तीसरी सदी के आसपास बताया जाता है। इस ग्रंथ की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज दुनिया में मौजूद हर भाषा में इसका अनुवाद हो चुका है।

अपनी इस रचना के माध्यम से विष्णु शर्मा ने लोक व्यवहार को काफी रोचक ढंग से दिखाया है।

प्रमुख रचनाएं:- पंचतंत्र की कहानियां।

  • पाणिनी:-

पाणिनी और कश्मीर का संबंध बताते हुए इतिहासकारों का कहना है कि इनका जन्म कश्मीर के दक्षिण प्रांत में मौजूद गोद्रा गांव में हुआ था। जिन्होंने संस्कृत भाषा के प्राचीन ग्रंथ अष्टाध्यायी की रचना की थी।

कहा जाता है कि पाणिनी की अष्टाध्यायी पर सबसे अधिक शोध कश्मीर में हुए हैं, जिसके कारण ही पाणिनी को कश्मीर के प्रमुख विद्वानों में शीर्ष स्थान दिया जाता है।

प्रमुख रचनाएं:- अष्टाध्यायी।

  • शारंगदेव:-

शारंगदेव जाने माने भारतीय संगीतज्ञ थे। कहा जाता है इनके पूर्वज कश्मीर से थे। इन्होंने संगीत रत्नाकर नामक एक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी।

जिसमें संगीत और नृत्य कलाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। शारंगदेव के इस ग्रंथ ने करीब 600 वर्षों तक संगीत प्रेमियों का पथ प्रदर्शन किया। इन्होंने मुख्यता दक्षिण भारतीय संगीत को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग दिया था।

प्रमुख रचनाएं:- संगीत रत्नाकर।

इस प्रकार, कश्मीर जोकि विभिन्न राजनैतिक परिस्थितियों के चलते हमेशा विवादों से ही घिरा रहा, उसके विषय में केवल ये कहकर सम्पूर्ण प्रश्नों का उत्तर हासिल किया जा सकता है कि कल्हण के प्रसिद्ध ग्रंथ राजतरंगिणी में वर्णित है कि…

कश्मीर पर विजय केवल और केवल आध्यात्मिक तरह से पाई जा सकती है, किसी भी सैन्य शक्ति के बल पर नहीं!

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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