जानें कैसे बिना आधुनिक मशीनों और तकनीक के तैयार किए गए भारत के प्राचीन मंदिर

ancient temples

भारतीय भूमि आरंभ से ही देवताओं का गढ़ रही है। यही कारण है कि यहां सबसे अधिक मंदिर और धार्मिक स्थल पाए जाते हैं। हमारे देश में मौजूद समस्त मंदिर काफी प्राचीन है।

जिस कारण हमारे मन मस्तिष्क में सदैव ये ही प्रश्न उठता है, कि प्राचीन समय में जब विज्ञान और आधुनिक तकनीक बिल्कुल ना के बराबर थी, तो कैसे इतने विशाल और अद्भुत मंदिरों का निर्माण संभव हो सका?

यानि प्राचीन लोगों ने कैसे इन ऐतिहासिक धरोहर प्राप्त मंदिरों को बनाया होगा? हमारे आज के इस लेख में हम आपको इसी की जानकारी देने वाले हैं। जिससे आप नीचे बताए गए निम्न मंदिर और उनकी भव्य निर्माण शैली के बारे में जान सकेंगे। तो चलिए शुरू करते हैं।

होयसलेश्वर मंदिर (Hoysaleswara Temple)

Hoysaleswara Temple

भारत के कर्नाटक राज्य के हसन जिले में स्थित होयसलेश्वर मंदिर प्राचीन भारत की ऐतिहासिक धरोहर के तौर पर जाना जाता है, जोकि हलेबिड नामक स्थान पर बना हुआ है। इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1121 में हुआ था। जिसको होयसल राजा विष्णुवर्धन ने बनवाया था। 

होयसलेश्वर एक अत्यंत प्राचीन शिव मंदिर है, जिसका अनेकों बार पुननिर्माण या कहें जीर्णोद्धार हो चुका है, क्योंकि भारतवर्ष के अन्य मंदिरों की तरह मुगल अक्रांताओं ने इस मंदिर को भी काफी नुकसान पहुंचाया था। 

बात करें इस मंदिर की निर्माण शैली के बारे में, तो होयसलेश्वर मंदिर सम्पूर्ण भारतवर्ष में 

मौजूद एक ऐसा मंदिर है, जिसके निर्माण में 

चूना पत्थर जैसे किसी भी पदार्थ का प्रयोग नहीं हुआ है। 

हालांकि मंदिर की संरचना को देखकर ये कहना अतिशयोक्ति है कि इसका निर्माण बिना किसी मशीन के हुआ होगा, लेकिन इसके पुख्ता प्रमाण मौजूद नहीं है। जिस कारण इस मंदिर के निर्माण और नक्काशियों को मानव निर्मित कहा जाता है।  

इस मंदिर में अद्भुत नक्काशियां मौजूद हैं, जोकि इंटरलॉकिंग के माध्यम से एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। होयसलेश्वर मंदिर में स्थापित मूर्तियां सॉफ्ट स्टोन से बनाई गई है,

कहा जाता है ये पत्थर समय के साथ कठोर हो जाता है। यहां मंदिर के परिसर में भगवान शिव की मूर्तियों को बहुत ही बारीकी और सूक्ष्मता के साथ तैयार किया गया है। 

मंदिर की दीवारों तक पर भगवान जी की मूर्तियों को खूबसूरती के साथ उकेरा गया है, जोकि इस मंदिर को अत्यधिक रहस्यमयी और भव्य बनाती हैं।

साथ ही इस मंदिर की वास्तुकला यहां आने वाले शिव भक्तों को आरंभ से ही अपनी ओर आकर्षित करती है, तो ये कहा जा सकता है कि उस दौर में जब तकनीक इतनी विकसित नहीं हुई थी, ये मंदिर उस दौर में बनाया गया था, जोकि भारतीयों के लिए आस्था का विषय है।

तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर (Brihadeeswarar & Thanjavur Temple)

Brihadeeswarar & Thanjavur Temple

वर्ष 1987 में यूनेस्को द्वारा इस मंदिर को विश्व धरोहर घोषित कर दिया गया था। ये भगवान शिव का एक अनोखा मंदिर है। जिसका निर्माण 1004 से लेकर 1009 ईसवी के दौरान राजा राज चोल ने कराया था।

जिसका प्राचीन नाम राजराजेश्वर था, लेकिन मराठा शासकों ने इसका नाम बदलकर बृहदेश्वर रख दिया।

भारतवर्ष के अन्य मंदिरों की भांति ये मंदिर भी कई बार विदेशी और मुगल आक्रमण का शिकार हुआ। लेकिन इस मंदिर ने अपनी भव्यता और पहचान नहीं खोई। ये मंदिर दक्षिण भारत के तमिलनाडु में तंजौर में स्थित है।

कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पूर्णतया ग्रेनाइट से हुआ है, जिसमें करीब 1,30,000 टन पत्थरों का इस्तेमाल हुआ था। अब यहां एक अचंभित करने वाली बात ये भी है, कि तंजौर के आसपास कोई पहाड़ या चट्टानें मौजूद नहीं है,

तो इतने विशाल मंदिर का निर्माण उस दौर में कैसे हुआ होगा? इतना ही नहीं, इस मंदिर की अद्भुत वास्तुकला और चित्रकारी प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करती है।

जबकि इस मंदिर की ऊंचाई करीब 66 मीटर है, जिस कारण ये विश्व के सबसे ऊंचे मंदिरों की श्रेणी में आता है, और यहां लगभग 13 मंजिलें बनाई गई हैं। तंजौर स्थित इस मंदिर के निर्माण में सीमेंट, सरिया, प्लास्टर इत्यादि किसी भी निर्माण सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

इस मंदिर का निर्माण पजल तकनीक के आधार पर हुआ है, यानि पत्थरों को आपस में मिलाकर मंदिर को बनाया गया है। जिन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है।

सबसे आश्चर्यजनक उस दौर में, जब भारी पत्थर आदि उठाने के लिए क्रेन आदि नहीं हुआ करती थी, तो कैसे इस मंदिर के करीब 80 टन वजन के गुंबद को तैयार किया गया होगा?

जिसके ऊपर एक स्वर्ण कलश रखा है। मंदिर के गुंबद को लेकर प्रसिद्ध है कि गुंबद की छाया कभी भी धरती पर नहीं दिखाई पड़ती है। 

इस मंदिर के परिसर में एक विशाल आकार का नंदी बैल भी मौजूद है, जिसको एक ही पत्थर का प्रयोग करके निर्मित किया गया है। साथ ही तंजौर के इस मंदिर में अद्भुत तरीके की चित्रकारी, शिलालेखों और वास्तुकला के नमूने मंदिर की दीवारों पर दिखाई पड़ते हैं।

इस मंदिर के बारे में प्रचलित है कि ये मंदिर बिना नींव के अपने स्थान पर आज तक खड़ा, जोकि इस मंदिर को भारतवर्ष के समस्त मंदिरों से रहस्यमयी और विशाल मंदिर बनाता है।

महाबलीपुरम मंदिर (Mahabalipuram Temple)

Mahabalipuram Temple

भारत के दक्षिण में स्थित महाबलीपुरम एक प्रमुख धार्मिक तीर्थ स्थल है। जिसको साल 1984 में विश्व धरोहर के तौर पर शामिल किया जा चुका है।

इस मंदिर की प्राचीन नक्काशी को देखने के लिए दूर- दूर से पर्यटक यहां आते हैं। महाबलीपुरम में स्थित मंदिरों को अनेक प्रकार के पत्थरों को काटकर बनाया गया है। 

महाबलीपुरम में मौजूद समस्त मंदिरों को 7वीं सदी के दौरान पल्लव राजाओं के द्वारा बनवाया गया था।

जिनमें से कुछ निम्न हैं…शोर मंदिर, पंच रथ मंदिर, मुकुंद नयनार मंदिर, श्री करुकाथम्मन मंदिर, ओलक्केनेश्वर मंदिर, स्थलसायन पेरुमल मंदिर, वराह गुफा, गणेश रथ मंदिर, गंगा अवतरण स्मारक, श्री कृष्ण की मक्खन गेंद, टाइगर गुफाएं, 9 गुफा मंदिर आदि। 

मान्यता है कि महाबलीपुरम में मौजूद अनेक मंदिरों में हिंदू धर्म के सभी देवी देवताओं का वास है, जिस कारण यहां के मंदिरों की विशेष धार्मिक मान्यता हैं।

इन मंदिरों का निर्माण अत्यधिक प्राचीन सभ्यताओं और शैली के आधार पर हुआ है, और उस दौर में हुआ है, जब भवन निर्माण की तकनीक में आधुनिक विज्ञान का इस्तेमाल नहीं हुआ करता था, ऐसे में इन मंदिरों की भव्यता आज सालों वर्षों बाद भी देखने लायक है।

कैलास मंदिर (Kailash Temple)

Kailash Temple

भारत के महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद जिले में स्थित कैलास मंदिर प्राचीन वास्तुकला की एक अनूठी मिसाल है। जिसके निर्माण में करीब 100 वर्षों का समय लगा होगा। पुरातवविदों के अनुसार, कैलास मंदिर का निर्माण पत्थर की एक चट्टान को काटकर किया गया है।

उस पत्थर की चट्टान का वजन करीब 40000 टन था, जिसकी चट्टानों को पहले U आकार में काटा गया था। इस मंदिर के आरंभ द्वारा और परिसर में कई सारे हाथियों की मूर्ति स्थापित है, माना जाता है, इन्हीं हाथियों पर मंदिर टिका हुआ है। 

कैलास मंदिर का निर्माण 756 ईसवी से लेकर 773 ईसवी के मध्य हुआ था। इस अद्भुत मंदिर को बनाने का श्रेय राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम को दिया जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर के जल्द निर्माण के लिए भगवान शिव ने भूमि अस्त्र प्रदान किया था।

जिसके बाद ही ये 90 फुट ऊंचा मंदिर बनकर तैयार हो पाया। इस मंदिर की दीवारों पर एक अनोखी लिपि का प्रयोग किया गया है, जिसे आजतक कोई पढ़ नहीं सका है।

कैलास मंदिर का निर्माण चट्टान से निकले एक एक पत्थर को तराश कर किया गया है। जिसके द्वारों और खंभों पर विशेष प्रकार की नक्काशी की गई है। जिसको बनाने में किस तकनीक का इस्तेमाल हुआ है, इसका अंदाजा भी आजतक कोई नहीं लगा पाया है।

कैलास मंदिर में बारिश के पानी को संचय करने की भी बेहतरीन तकनीक और एलोरा की गुफाओं के भीतरी रास्तों को भी अद्भुत शैली का प्रयोग करके बनाया गया है।

ऐसे में प्रश्न ये है कि उस दौर में पत्थर को काटने के लिए किस तकनीक का प्रयोग किया गया होगा? जिससे इतना अद्भुत मंदिर तैयार किया गया।  

वैघैश्वर मंदिर (Wagheshwar Temple)

Wagheshwar Temple

देवों की स्थली उत्तराखंड की भूमि पर यूं तो भगवान शिव के कई प्राचीन तथा पौराणिक मंदिर मौजूद हैं। लेकिन इसके साथ ही यहां एक ऐसा मंदिर भी स्थापित है जहां भगवान शिव बाघ रूप में विराजमान हैं।

प्राचीनतम समय से प्रसिद्ध इस मंदिर को पूर्व में वैघैश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। अब वर्तमान समय में यह मंदिर बागनाथ के नाम से बागेश्वर के धार्मिक स्थलों में से एक बन चुका है।

सरयू तथा गोमती नदी के संगम पर स्थित शिव जी का यह पौराणिक मंदिर समुद्र तल से लगभग 1004 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। बागनाथ मंदिर की नक्काशी भी अत्यंत प्रभावशाली है। शिवरात्रि के अवसर पर इस मंदिर में भारी संख्या में भीड़ एकत्रित हो जाती है।

इसका विशेष कारण यह भी है कि बागनाथ के इस मंदिर में भगवान शिव पूरे परिवार के साथ निवास करते हैं। बागनाथ की महिमा देश ही नहीं, बल्कि विदेशी भक्तों को भी अपनी ओर खींच ले आती है।

बागनाथ नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर का इतिहास आठवीं शताब्दी के गर्भ से शुरू होता है। व्याघ्रेश्वर का प्रथम पौराणिक परिचय हमें स्कंद पुराण के मानस खंड तथा प्रथम एतिहासिक परिचय कत्यूरी सम्राट भूदेव के शिलालेख से स्पष्ट रूप में प्राप्त होता है।

पुरातत्व विभाग द्वारा इस मंदिर 70 देव मूर्तियां को संरक्षित किया गया है। जिनमें से कई मूर्तियां ऐसी हैं जो आठवीं तथा दशवी शताब्दी की हैं।

मुंडेश्वरी मंदिर (Mundeshwari Temple)

Mundeshwari Temple

बिहार राज्य की राजधानी पटना में स्थित मुंडेश्वरी मंदिर भारतवर्ष के प्राचीन मंदिरों में से एक है। यह मंदिर पटना स्थित कैमूर जिले के भगवानपुर अंचल में पवरा पहाड़ी पर मौजूद है।

जोकि मुख्य रूप से 108 एकड़ में फैला है। ये मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मुंडेश्वरी मंदिर की आकृति अष्ट भुजाओं की भांति दिखाई पड़ती है। 

कहा जाता है इस मंदिर में जो शिवलिंग मौजूद है, उसका रंग सूर्य के प्रकाश के साथ बदलता रहता है। इस मंदिर में आरंभ से ही सात्विक बलि दी जाती रही है, यानि बकरे की जान नहीं ली जाती है। केवल मनोकामना पूर्ति के लिए बकरे पर झाड़ फूंक आदि किया जाता है।

मान्यता है कि इस मंदिर में माता की जो मूर्ति है उसे कोई सामान्य व्यक्ति टकटकी लगाए नहीं देख सकता। ये मंदिर करीब 389 ईसवी पुराना है, जिसके प्रमाण मौजूद हैं। इस मंदिर में शिलालेख, वास्तुकला और चित्रकारी के अद्भुत नमूने मौजूद हैं, जोकि देखने योग्य हैं। 

मुंडेश्वरी माता के मंदिर की धार्मिक महत्ता है, जिस कारण यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भारतवर्ष में मौजूद समस्त मंदिरों में सबसे पूर्व हुआ था।

यही कारण है कि इसके निर्माण और वास्तुकला को लेकर आश्चर्य प्रकट किया जाता है कि इतने प्राचीन काल में इतनी ऊंची पहाड़ी पर बिना मशीनों और आधुनिक तकनीक के कैसे इतने अद्भुत मंदिर का निर्माण किया गया होगा? इस मंदिर के विषय में ये बात इसे सबसे अधिक प्राचीन बनाती हैं।

श्रीपुरम मंदिर (ShriPuram Temple)

ShriPuram Temple

तमिलनाडु के वेल्लोर के थिरुमलाई कोडी में मौजूद श्रीपुरम मंदिर भगवान विष्णु और विशेषकर लक्ष्मी माता को समर्पित है। जिसे दक्षिण भारत के गोल्डन टेंपल के नाम से भी जाना जाता है।

इस मंदिर के निर्माण में इतना स्वर्ण लगा है कि सम्पूर्ण विश्व में किसी मंदिर में इतने सोने का प्रयोग नहीं हुआ है। मंदिर की आकृति वृत्ताकार है, जोकि रात को रोशनी पड़ने पर अत्यधिक सुंदर लगता है। 

श्रीपुरम मंदिर करीब 100 एकड़ में बना हैं, जहां भारतवर्ष की समस्त नदियों का पानी लाकर एक सरोवर का निर्माण किया गया है।

मंदिर को चारों ओर से एक तारानुमा पथ घेरे हुए है, जिस पर चलकर आप मंदिर के परिसर में जा सकते हैं। इस सम्पूर्ण मंदिर को वैदिक नियमों के आधार पर बनाया गया है, जहां मंदिर के परिसर में सनातन धर्म और उसके वेदों, धर्म शास्त्रों से जुड़ा ज्ञान देखने और पढ़ने को मिलता है।

इस मंदिर का निर्माण नारायणी अम्मा (संन्यासी) ने कराया था, जिसे बनने में कुल 7 वर्षों का समय लगा था। इस मंदिर के बाहरी हिस्से को 1500 किलो सोने से रंगा गया है।

जबकि मंदिर के ऊपर सोने की पन्नी चढ़ाई गई है। जोकि मंदिर को अत्यधिक सुंदर बना देती हैं। इस मंदिर में बेहद ही खूबसूरत नक्काशी और शिल्पकला को उकेरा गया है। 

कहा जाता है इस मंदिर के निर्माण में शिलालेख की कला वेदों से प्रभावित है। इतना ही नहीं, मंदिर की वास्तुकला देखने लायक है, जिससे मंदिर को अंदर और बाहर दोनों तरफ से बेहतरीन तरीके से सुसज्जित किया गया है।

मंदिर के अंदर और बाहर सोने की कोटिंग की गई है, जिस कारण इस मंदिर को स्वर्ग की संज्ञा दी जाती है।

वरदराज पेरुमल मंदिर (Varadaraja Perumal Temple)

Varadaraja Perumal Temple

हिंदू धर्म के सात प्रमुख तीर्थों में कांचीपुरम भी काफी प्रसिद्ध है। कांचीपुरम का सामान्य अर्थ होता है ब्रह्मा का निवास स्थान। यानि भारत के तमिलनाडु राज्य में वेगवती नदी के किनारे अनेकों मंदिर मौजूद हैं,

जिनकी पावन भूमि को कांचीपुरम कहा जाता है। इसी स्थान पर वरदराजा पेरुमल मंदिर भी मौजूद है। ये मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। 

इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु वरदराजा स्वामी के अवतार में 40 साल में एक बार प्रकट होते हैं। हालांकि कालांतर में इस मंदिर में भी मुगल अक्रांताओ ने बहुत लूट पाट मचाई थी, लेकिन धार्मिक दृष्टि से ये मंदिर आज भी काफी प्रसिद्ध है। 

कहा जाता है जब मुगल अक्रांताओं ने इस मंदिर पर आक्रमण किया था, तब वरदराजा की मूर्ति को सरोवर में डाल दिया गया था, जिसके बाद मंदिर में नई मूर्ति स्थापित की गई। लेकिन वर्ष 1709 में जब सरोवर में पानी कम हुआ, तब मूर्ति स्वयं बाहर आ गई।

लेकिन जब उस पुरानी मूर्ति को स्थापित किया गया, तो वह खुद लगभग 48 दिन बाद सरोवर में चली गई। मान्यता है कि जहां से हर 40 साल बाद मूर्ति खुद ऊपर आ जाती है।

इस मंदिर की स्थापना को लेकर कहावत है कि जब सरस्वती माता ब्रह्मा जी से नाराज हो गई थीं। तब वह वेगवती नदी के रूप में धरती पर बहने लगी। जिन्हें शांत और समझाने के लिए ही भगवान विष्णु ने वरदराजा स्वामी का अवतार लिया था।

इस मंदिर में वरदराजा की जो मूर्ति स्थापित है, वह अंजीर के पेड़ों की लकड़ी से निर्मित है, कहा जाता है कि इस मूर्ति का निर्माण किसी साधारण शिल्पकार ने नहीं बल्कि स्वयं विश्वकर्मा जी ने किया था,

जोकि लगभग 12 फुट लंबी है। फिर 11 सदी के उत्तरार्ध में चोल शासकों द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया।

ऐसे में इस मंदिर में स्थापित मूर्ति का निर्माण किसी मशीन या तकनीक के आधार पर नहीं, बल्कि शिल्पकार के हाथों हुआ था।

इस प्रकार, वरदराजा पेरुमल मंदिर के सरोवर में मौजूद मूर्ति के दर्शन कोई भी व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवनकाल में केवल एक या दो बार कर सकता है। इस मंदिर में अनेक प्रकार की सुंदर और आकर्षक शिलालेख, वास्तुकला, चित्रकारी और नक्काशियां देखने को मिलती हैं।

इतना ही नहीं, इस मंदिर में एक 100 स्तंभों वाला हॉल भी मौजूद है, जोकि एक तरह से विवाह स्थल जैसा प्रतीत होता है। जिसे अग्नि शाला भी कहा गया है। जिसकी दीवारों पर अश्वों और सैनिकों की सुंदर नक्काशी की गई है।

इतना ही नहीं, इस हॉल के बाहरी छोर पर शिलाओं को काटकर कलाकृति का निर्माण किया गया है, जोकि देखने में काफी अद्भुत है। 

इस मंदिर में नक्काशी और शिल्पकला के अनोखे नमूने स्तंभों और मंदिर की दीवारों पर देखने को मिलते हैं, यहां एक विशाल जल कुंड भी मौजूद है, मान्यता है इसमें साक्षात देवताओं ने स्नान किया था।

साथ ही लगभग 96 फिट लंबा प्रवेश द्वार भी मंदिर के देखने लायक खूबसूरती में से एक है, इस मंदिर में वरदराजा की खड़ी हुई मूर्ति है, जोकि 40 साल में एक बार दर्शन कराई जाती है। इस दौरान मंदिर में अनेक तरह के धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

इस प्रकार, ये थे भारतवर्ष के प्राचीन मंदिर। जिनकी तकनीक और निर्माण शैली के बारे में बड़े- बड़े इंजीनियर और वैज्ञानिक तक पता नहीं लगा सके हैं, ऐसे में ये कहा जा सकता है कि भारतवर्ष का प्राचीन इतिहास काफी गौरवशाली और रहस्यमयी रहा है।

और कहा जा सकता है कि उस दौर में जब मानव को विज्ञान की आधुनिक तकनीक का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था, तब भारतीय अभियंताओं ने अद्भुत और भव्य तीर्थ स्थलों का निर्माण कर दिया था, जिसको देखकर आज भी दुनिया भर के वैज्ञानिक आश्चर्य प्रकट करते हैं।

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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