क्या विशालकाय लोगों ने बनाया था लेपाक्षी मंदिर को? खोये इतिहास के सबूत

Leepakshi temple


सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सम्पूर्ण विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां देवलोक के समस्त देवी-देवताओं ने अवतार लिए हैं।

यही कारण है कि यहां अनगिनत धार्मिक स्थल या कहें मंदिर मौजूद हैं, जोकि अपनी विशेष मान्यताओं और परम सिद्धियों के चलते जाने जाते हैं।


एक ऐसा ही मंदिर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के एक छोटे से गांव में स्थित है, जो काफी रहस्यमयी है।

हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि अगर हम आपसे कहें कि इस मंदिर का एक स्तंभ बिना किसी आधार के खड़े हुआ है और इस मंदिर में विशाल आकार के पदचिन्ह मौजूद हैं।

इतना ही नहीं, माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण किसी साधारण पुरुष ने नहीं बल्कि विशाल आकार वाले विचित्र प्राणियों या दैत्यों ने किया है,

तो क्या आप हमारी बात पर विश्वास करेंगे?

अगर नहीं! तो आज हम आपको विश्व प्रसिद्ध लेपाक्षी मंदिर के बारे में बताने वाले हैं, जोकि हैंगिंग पिलर टेंपल (Hanging pillar temple) के नाम से विख्यात है।

हमारे इस लेख के माध्यम से आपको इस मंदिर के अनेक आश्चर्यचकित करने वाले रहस्यों के बारे में पता चलेगा, जोकि वाकई आपको हैरान कर देंगे।

लेपाक्षी मंदिर का निर्माण किसने किया?

Image source: amarujala

लेख में आगे बढ़ने से पहले हम आपको यह बताना ज़रूरी समझते हैं, कि इस मंदिर का निर्माण किसने किया?

तभी आप इसके अनोखे रहस्य को समझ सकेंगे।

इतिहासकारों की मानें तो आज से करीब 500 साल पहले वर्ष 1583 में विजयनगर राजा के यहां काम करने वाले दो व्यापारी भाइयों विरुपन्ना और वीरन्ना ने इस मंदिर का निर्माण किया था।

हिन्दू धार्मिक स्त्रोतों के मुताबिक, त्रेतायुग में जब रावण सीता माता का हरण करके ले जा रहा था, तब जटायु नामक पक्षी रावण को रोकने की कोशिश में घायल हो गया था।

उधर, जब भगवान राम और लक्ष्मण जी सीता माता को खोजते हुए जटायु के समीप पहुंचे, तब उन्होंने जटायु को पानी पिलाते हुए कहा था…उठो पक्षी!

जिसके बाद जटायु ने भगवान के हाथों में ही प्राण त्याग दिए थे।

कहते हैं उसी स्थान पर वर्तमान में लेपाक्षी मंदिर स्थित है।

जिसका नाम श्री राम के कहे ‘उठो पक्षी’ वाक्य पर ही रखा गया है।

हालांकि ले पाक्षी तेलगु भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है उठो पक्षी।

इसी को आधार मानते हुए मंदिर का नाम लेपाक्षी रखा गया।

जबकि अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, एक बार जब भगवान विष्णु और शंकर जी के भक्तों के मध्य उन दोनों में से एक के श्रेष्ठ होने का विवाद छिड़ गया।

तब ऋषि अगस्त्य ने अपने तपोबल के माध्यम से लोगों को बताया कि भगवान शिव और विष्णु जी एक दूसरे के पूरक हैं।

तभी से लेपाक्षी मंदिर में भगवान शिव के साथ श्री हरि की भी प्रतिमा रघुनाथ के तौर पर मौजूद है और मंदिर की शोभा बढ़ा रहे हैं।

लेकिन पुरातत्व विभाग को इस मंदिर से विशाल आकार के पदचिन्ह आदि मिले हैं,

जोकि इस बात को सत्य सिद्ध करते हैं कि इस मंदिर का निर्माण किसी 25 से 35 फीट के विशालकाय व्यक्ति ने किया है।

इतिहासकारों से मिली जानकारी के अनुसार, यह पदचिन्ह किसी व्यक्ति के नहीं है।

इसलिए ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर के निर्माण का श्रेय किसी साधारण व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता है, बल्कि दैत्यों ने इसको बनाया है।

जिसके बारे में आगे हम विस्तार से जानेंगे।

लेपाक्षी मंदिर से जुड़े अनेक रहस्य


लेपाक्षी मंदिर के रहस्यों में सबसे पहले हम बात करेंगे, इसके प्रांगण में मिले विशाल पदचिन्हों की, जोकि ऐसा माना जाता है कि किसी 30 फीट ऊंचाई वाले व्यक्ति के रहे होंगे।

लेपाक्षी मंदिर के आसपास रहने वाले लोग इस विशालकाय पदचिह्न को माता सीता का पद बताते हैं, जिनको सीतम्मा पडलू कहा जाता है।

उनके अनुसार, जब सीता माता का हरण करके रावण उन्हें लंका ले जा रहा था, उसी दौरान सीता माता ने यहां कुछ देर विराम किया होगा।

जिनके पैरों के निशान ही धरती पर अंकित हो गए होंगे।

दूसरी मान्यता के अनुसार, कुछ लोग इसे दुर्गा माता के पदचिह्न मानते हैं।

ऐसे में अगर हम धार्मिक युगों के आधार पर बात करें, तो इस मंदिर का निर्माण आज से करीब 500 वर्ष पूर्व बताया जाता है।

जबकि 15 से 35 फीट ऊंचे केवल त्रेतायुग में हुआ करते थे और द्वापरयुग में आते आते लोगों की ऊंचाई केवल 15 फीट रह गई।

जिसके आधार कहा जा सकता है कि इस मंदिर का निर्माण किसी 30 फीट वाले व्यक्ति या समूह ने कराया है।

तो ये मंदिर काफी प्राचीन है और इसका निर्माण किसी साधारण व्यक्ति ने नहीं बल्कि विशालकाय आकार वाले प्राणियों ने कराया है।

लेपाक्षी मंदिर के अनेक रहस्यों में से एक है, नंदी बैल की प्रतिमा और कुछ दूरी पर स्थित नाग देवों द्वारा संरक्षित लिंगम।

जोकि भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में नंदी बैल की सबसे विशाल प्रतिमा और प्रसिद्ध लिंगम है।

जिसके बारे में एक विचित्र बात यह भी है कि भगवान शिव के अधिकतर मंदिरों में नंदी अकेले नहीं दिखाई पड़ते हैं, बल्कि नंदी बैल सदा लिंगम के सामने मौजूद होते है।

जिनके दोनों सींगों के मध्य से ही लिंगम के दर्शन करने की प्रथा हिंदू धर्म में प्रचलित है। 

लेकिन लेपाक्षी मंदिर में नंदी बैल के पास कोई लिंगम मौजूद नहीं हैं।

जिसके बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि इस मंदिर या प्रतिमा का निर्माण किसी साधारण पुरुष ने नहीं किया है।

अन्यथा हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, नंदी बैल और लिंगम को अलग स्थापित नहीं किया जाता है।

तो ऐसा तो नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति जिसने इस मंदिर का निर्माण किया हो, वह लिंगम को नंदी बैल के सामने बनाना या रखना भूल गया हो?

जबकि नंदी बैल की प्रतिमा से 500 मीटर की दूरी पर ही हमें एक विशालकाय लिंगम मिलता है, जोकि 12 फीट लंबा है।

इसे नागलिंगम कहा गया है।

इसके अलावा, इन दोनों को लेकर एक रहस्य ये भी बरकरार है कि जब करीब नंदी बैल की ऊंचाई 15 फीट, लंबाई 27 फीट और लिंगम 12 फीट ऊंचा है।

तो उसको बनाने वाले व्यक्ति की ऊंचाई भी करीब 30 फीट रही होगी।

तो ऐसा मानना या कहना असंभव सा प्रतीत होता है कि लेपाक्षी मंदिर का निर्माण सामान्य व्यक्तियों ने किया है।

इसलिए ऐसा माना जाता है कि लेपाक्षी मंदिर का निर्माण दैत्यों के द्वारा किया गया है।

बात की जाएं इस मंदिर के अन्य आश्चर्यजनक तथ्यों की।

तब जानेंगे कि इस मंदिर की दीवारें पत्थरों के ब्लॉक को एक दूसरे से जोड़कर बनाई गई हैं,

जोकि अपने आपमें एक असाधारण तकनीक है।

यानि मंदिर की दीवारों को एकल पत्थरों की वास्तुकला का इस्तेमाल करके तैयार किया गया है।

तो वहीं मंदिर का क्षेत्रफल इतनी दूर तक फैला हुआ है कि अगर सही से गणना की जाए, तो लेपाक्षी मंदिर भारतवर्ष का सबसे बड़ा मंदिर कहलाएगा।

लेकिन सालों पहले आई बाढ़ से इस मंदिर के कई ढांचे ध्वस्त हो गए, जिसके चलते यहां आश्चर्य के तौर पर केवल विशाल नंदी बैल और लिंगम, 

बिना आधार के खड़ा स्तंभ और विशालकाय पदचिह्न मौजूद हैं, जोकि अभी तक काफी रहस्यमयी हैं।

लेपाक्षी मंदिर में विरुपन्ना की रोती हुई आंखों का होना भी किसी रहस्य से कम नहीं है।

जी हां! लेपाक्षी मंदिर के निर्माण में जिन भाइयों का जिक्र किया जाता है, उनमें से एक पर राज्य कोष के धन के दुरुपयोग का दोष लगा दिया गया था।

उसने उसी धन से लेपाक्षी मंदिर में कल्याण मंडप बनाया था, जिसका निर्माण अधूरा रह गया।

कहते हैं अगर इसका निर्माण पूरा हो गया होता, तो भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह इसी कल्याण मंडप में होता।

जिसके बाद धन का दुरुपयोग करने के लिए विरुपन्ना को दोषी ठहराते हुए तत्कालीन राजा ने उसकी आंखें फोड़ने की सजा सुना दी।

तब विरुपन्ना ने स्वयं ही अपने आंखें निकलकर मंदिर की दीवारों की ओर फेंक दिया।

कहते हैं यही आंखें आज भी प्रमुख धार्मिक अवसरों पर अत्यधिक लाल दिखाई पड़ती है।

लोगों का मानना है कि विरुपन्ना की आंखों में आज भी उसकी आत्मा विद्यमान है जोकि लेपाक्षी मंदिर के प्रांगण में आज भी मौजूद है।

लेपाक्षी मंदिर के अन्य आकर्षण

इस मंदिर में नंदी बैल और नागलिंगम के अलावा गणेश जी, माता लक्ष्मी, शिव जी की नृत्य करती प्रतिमा, अर्धनारीश्वर, गंगा, यमुना की मूर्तियां, कंकाल मूर्ति, त्रिपुरतकेश्वर,  भगवान विष्णु और भद्रकाली की मूर्तियां स्थापित हैं।

जोकि इस मंदिर की शोभा में चार चांद लगा रही हैं।

इसके अलावा प्राचीन शिलालेख, अनोखी वास्तुकला, अद्भुत नक्काशी (ब्रह्मा, नारद जी समेत अनेक हिंदू देवी देवताओं, नर्तकियों, नटराज, अप्सराओं) और जटायु की बड़ी सी मूर्ति, कल्याण मंडप, नृत्य मंडप आदि भी लेपाक्षी मंदिर में देखने योग्य है।

विभद्र मंदिर भी लेपाक्षी मंदिर के प्रमुख आकर्षणों में से एक है।

जिसका निर्माण भी उन्हीं दो व्यापारी भाइयों विरुपन्ना और वीरन्ना ने कराया था, जिनको लेपाक्षी मंदिर के निर्माण का श्रेय दिया जाता है।

हालांकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लेपाक्षी मंदिर के भीतर स्थापित विभद्र मंदिर का निर्माण ऋषि अगस्त्य ने कराया था।

बता दें कि विभद्र भगवान शिव जी के क्रोधी स्वरूप का अवतार है, जिनकी मूर्ति लेपाक्षी मंदिर के प्रांगण में  सुशोभित होती है।

बता दें कि भगवान शिव के इस क्रोधित अवतार की कहानी माता सती के आत्मदाह वाले धार्मिक किस्से से जुड़ी हुई है।

इसी मंदिर में भगवान शिव का एक अन्य मंदिर विनाशेश्वर बना हुआ है, जबकि एक मंदिर पूर्वी मुख पर बना हुआ है जोकि भगवान श्री हरि को समर्पित है।

इसके अलावा एक मंदिर और है, जिसे पार्वती तीर्थ के नाम से जाना जाता है।

साथ ही एक महामण्डप भी मौजूद है, जोकि अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।

जहां नटराज, नारद, पद्मिनी, रंभा, दत्तात्रेय आदि की मूर्तियां  स्थापित हैं और दीवारों पर साड़ियों की डिजाइन भी देखने को मिलती हैं।

लेपाक्षी मंदिर में ही भगवान शिव के प्रमुख शिवलिंग रामलिंगेश्वर और हनुमानलिंगेश्वर आदि स्थापित है।

लेपाक्षी मंदिर मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा है, जिसका पहला भाग मुख्य मंडप, दूसरा अर्ध मंडप और तीसरा गर्भ गृह कहलाता है।

जहां मुख्य मंडप पर भगवान विष्णु का मंदिर और अर्ध मंडप की ओर भगवान शिव का मंदिर पाप विनाशेश्वर और पार्वती तीर्थ बना है।

तो वहीं गर्भ गृह में विभद्र देवता का मंदिर विद्यमान है।

इसके मुख्य मंडप पर भगवान शिव के 14 अवतारों को भी चित्रकारी और वास्तुकला को दर्शाया गया है।

लेपाक्षी मंदिर के हवा में झूलते खंभे का रहस्य

Image source: flickr/nagesh kamath

जैसा कि लेख के आरंभ में ही हमने आपको बताया था कि लेपाक्षी मंदिर का एक स्तंभ जमीन से ना जुड़े होकर हवा में झूलता है।

यानि मंदिर के एक खंभा जमीन से ना लगकर हवा में लटक रहा है।

जोकि लेपाक्षी मंदिर को अधिक आश्चर्यजनक बनाता है।

मंदिर के इस झूलते स्तंभ के चलते इसे अंतरिक्ष या मूल स्तंभ भी कहा जाता है।

एक बार जब एक ब्रिटिश इंजीनियर हैमिल्टन ने साल 1903 में इस हवा में झूलते हुए स्तंभ का रहस्य जानने की कोशिश की।

इतना ही नहीं, जब ब्रिटिश इंजीनियर द्वारा इस स्तंभ को हिलाने या ढहाने का प्रयत्न किया गया, तब मंदिर का पूरा परिसर ही हिलने लगा।

जिस कारण आजतक कोई इस हवा में झूलते खंभे का रहस्य जान नहीं पाया है।

जबकि उस ब्रिटिश इंजीनियर की मानें तो लेपाक्षी मंदिर 70 खंभों में से केवल 69 खंभों पर ही खड़ा है।

जबकि 1 स्तंभ के हवा में झूलने पर मंदिर के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन ये बात पूर्णतया सत्य नहीं मानी जाती है।

मंदिर के इस झूलते हुए खंभे को लेकर मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इसके नीचे से कोई कपड़ा निकलता है।

तो उसके जीवन में सुख शांति बनी रहती है।


इस प्रकार, अद्भुत रहस्यों से घिरा भोलेनाथ का यह विशाल मंदिर भारतीय इतिहास के प्राचीन और गौरवशाली इतिहास की धरोहर है।

जिसके संरक्षण और इतिहास के बारे में जानना हर भारतीय के लिए आवश्यक है।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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