Martial Arts-भारत से ही विकसित हुआ था मार्शल आर्ट, बोधिधर्मन के प्रयासों से अन्य देशों तक फैला

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भारत विविध संस्कृतियों, जातियों, धर्मों तथा कलाओं का देश है। भारत में ऐसी अनेक प्राचीन कलाएं मौजूद हैं, जिसने पूरी दुनिया को उन अद्भुत कलाओं से रूबरू कराया है। लेकिन आज के समय में हम अपने प्राचीन भारत की परम्पराओं तथा संस्कृति आदि को भूलते जा रहे हैं।

युद्ध कलाओं, शस्त्र विद्या इत्यादि भारत की ही देन है। इतना ही आज जिस चीनी मार्शलाट को सीखने के लिए हर कोई लालायित रहता है। असल में यह मार्शलाट आर्ट को भी भारत से अन्य देशों तक पहुंची है।
दरअसल, दुनिया के विभिन्न देशों में मार्शलाट आर्ट को प्रसिद्ध तथा चर्चित करने के लिए मुख्य रूप से स्वर्गीय ब्रूस ली को जाना जाता है।

मार्शलाट आर्ट के बेहतरीन कलाकार तथा हॉलीवुड अभिनेता ब्रूस ली से प्रभावित होकर मीडिया की दिलचस्पी भी 1960 और 1970 के दशक में मार्शलाट आर्ट के प्रति अधिक देखी गई। लेकिन इन सब के साथ बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि मार्शलाट आर्ट का जन्म भारत से ही हुआ है।

मार्शलाट आर्ट का जनक कौन है?

मार्शलाट आर्ट एक युद्ध कला है। भारतीय प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार युद्ध की यह मार्शलाट कला को सर्वप्रथम भगवान श्री कृष्ण ने शुरू किया गया था। जी हां, चीन देश की मानी जाने वाली मार्शलाट के संबंध में कई पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक यह सूचना प्राप्त होती है कि मार्शलार्ट कला की शुरुआत भगवान परशुराम द्वारा कलरीपायट्टु के नाम से की गई थी।

दरअसल, कलरीपायट्टु एक विद्या है जिसे वर्तमान समय में मार्शलार्ट के नाम से जाना जाता है। यह दुनिया का सबसे पुराना मार्शलार्ट है, जिसे सभी मार्शलार्ट का जनक माना जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने 16 वर्ष की उम्र में इसी कलरीपायट्टु द्वारा चाणूर और मुष्टिक जैसे दैत्यों का वध किया था।

श्री कृष्ण द्वारा मार्शल आर्ट विद्या का विकास ब्रज वन के क्षेत्रों में ही किया गया था। कलरीपायट्टु का ही एक नृत्य रूप डांडिया रास है। महाभारत काल में भी जब दुर्योधन और अर्जुन के बीच सेना चुनी जाने का क्षण सामने आया था। तब श्री कृष्ण ने सर्वप्रथम दुर्योधन को सेना चुनने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने नारायणी सेना यानि श्री कृष्ण की सेना और स्वयं श्रीकृष्ण को चुनने का विकल्प प्रदान किया। जिसमें से दुर्योधन ने श्री कृष्ण की नारायणी सेना को चुना, क्योंकि यह नारायणी सेना 

कलरीपायट्टु विद्या में निपुण थी। नारायणी सेना को चतुरंगिनी सेना भी कहा जाता था। उस समय यह सबसे प्रहारक सेना मानी जाती थी।

बहुत पुराना है इतिहास

मार्शल आर्ट का सिद्धांत अत्यंत पुराना है, हिन्दू पुराणों को अगर खंगाल कर देखा जाए तो मार्शल आर्ट के असल संस्थापक भगवान परशुराम ही थे। 

अब हम आपको बता दें, भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं। शस्त्र ज्ञान के कारण पुराणों में तथा पूरे जगत में भगवान परशुराम  सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। मूल रूप से भगवान परशुराम ब्राह्मण थे, लेकिन उनमें शस्त्र विद्या का भी विशेष ज्ञान था।

मार्शल आर्ट का विकास

मार्शल आर्ट या लड़ाई की कलाएं विधिबद्ध अभ्यास की प्रणाली और बचाव के लिए प्रशिक्षण की प्राचीन परंपराएं हैं। सभी मार्शल आर्ट्स का एक समान उद्देश्य है, ख़ुद की या दूसरों की किसी शारीरिक ख़तरे से रक्षा करना. इसके अलावा कुछ मार्शल आर्ट को आस्था जैसे हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, दाओवाद, कन्फ्यूशीवाद या शिन्टो से जोड़ा जाता है, वहीं दूसरी ओर यह सम्मान के एक विशेष नियम का पालन करती हैं।

मार्शल आर्ट को विज्ञान और कला दोनों माना जाता है। इनमें से कई कलाओं का प्रतिस्पर्धात्मक अभ्यास भी किया जाता है, ज़्यादातर लड़ाई के खेल में इसका प्रयोग किया जाता है वहीं कहीं कहीं ये नृत्य का रूप भी ले सकते हैं।

मार्शलाट आर्ट की सबसे विशेष विद्या है कुंगफू। हालांकि इस विद्या को सीखने के लिए चीन में सबसे अच्छा विद्यालय स्थापित है। चीन में मार्शलाट आर्ट की विद्या के लिए स्थापित इस विद्यालय का नाम सओलिन मंदिर है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस विद्यालय की स्थापना करने वाले और मार्शलाट आर्ट की इस विद्या को चीन को देने वाले एक भारतीय ही थे। 

बौद्ध धर्म के आधार व्यक्ति बोधिवर्मन ने इस शस्त्र विद्या मार्शलाट कला की शिक्षा प्राप्त की। जिसके बाद अपनी चीनी यात्रा में बौद्ध धर्म के विस्तार हेतु यह विद्या चीन को प्रदान की।

मार्शलाट आर्ट की कुंगफू विद्या का जनक असल में भारत के बोधिवर्मन को माना जाता है। बोधिवर्मन दक्षिण भारत के पल्लव वंश के राजकुमार थे। जिन्होंने आत्मरक्षा की कलाओं के साथ ही महान चिकित्सक के रूप में भी प्रसिद्धि प्राप्त की।

बोधिवर्मन को माना जाता है भगवान

बोधिवर्मन ने इस मार्शलाट की विद्या को चीन तक पहुंचाया। यही कारण है कि चीन, जापान तथा अन्य बौद्ध धार्मिक देशों में बोधिवर्मन को भगवान स्वरूप पूजा जाता है।

बोधिवर्मन के बाद मार्शलाट को जिसने सर्वाधिक इस विद्या का विकास किया वो है मशहूर ब्रूस ली। मार्शल आर्ट के खास तरीके को चरम सीमा तक पहुंचाने का कारण ब्रूस ली ने किया। जिन्हें आज हर कोई जानता है।

जानिए, भारतीय मार्शल आर्ट के प्रकार

मार्शल आर्ट भारत से उत्पन्न विद्या है, इसके साथ ही मार्शल आर्ट के विभिन्न प्रकारों की उत्पत्ति भारत से हुई है। आइए जानते हैं भारतीय मार्शल आर्ट कौन-कौन से हैं-

इंबुआन रेसलिंग

यह मिजोरम का एक पारंपरिक खेल है। इस मार्शल आर्ट की उत्पत्ति 1750 ईसवी में हुई मानी जाती है। मार्शल आर्ट की इस प्रकार में खिलाड़ियों के बीच मुकाबला 3 राउंड तक चलता है। प्रत्येक राउंड 30 से 60 सेकंड तक का होता है। इस खेल में विजेता वह बनता है जो कि हाथ व पैरों के दम पर विरोधी को जमीन से उठाने में सफलता प्राप्त कर लेता है।

मुष्टी युद्ध

मुष्टि युद्ध की शुरुआत भारत के सबसे पुराने शहर वाराणसी में हुई थी। संस्कृत भाषा में मुष्टी शब्द का अभिप्राय मुट्ठी से होता है। मार्शल आर्ट के इस प्रकार में  एकल प्रतियोगी के साथ साथ ही समूह के मुकाबले भी होते हैं।

वरमा कलाई

देश के दक्षिण भारत के तमिलनाडु में प्रसिद्ध वरमा कलाई मार्शल आर्ट के हिस्सा होने के साथ ही योग व मसाज के भी प्रकार में से एक है। इस मार्शल आर्ट युद्ध में बॉडी के प्रेशर पॉइंट्स को दबा कर सामने वाले विरोधी को परास्त किया जाता है।

नियुद्ध

यह एक प्राचीन भारतीय मिक्स मार्शल आर्ट है। इसमें सर्वाधिक हाथों और पैरों का इस्तेमाल किया जाता है। नियुद्ध मार्शल आर्ट में सभी मांसपेशियों का इस्तेमाल किया जाता है। यही कारण है कि यह शरीर के विकास के लिए भी काफी फायदेमंद साबित होता है। आत्मरक्षा के लिए यह मार्शल आर्ट विद्या काफी महत्वपूर्ण है।

मल्लयुद्ध

भारत में उत्पन्न मल्लयुद्ध एक कॉम्बैट कुश्ती है।जिसका इतिहास सैकड़ों, हजारों साल पुराना है। पुराणों में भी इस मल्लयुद्ध, मार्शल आर्ट प्रकार का जिक्र पाया जाता है। मल्लयुद्ध को चार भागों में विभाजित किया गया है – हनुमंती, जंबुवंती, जरासंधी, भीमसेनी।

कुट्टु वारासाई

मार्शल आर्ट का यह प्रकार दक्षिण भारत के तमिलनाडु तथा श्रीलंका क्षेत्रों में सर्वाधिक प्रचलित है। इस मार्शल आर्ट के विषय में सर्वप्रथम तमिल संगम साहित्य में पढ़ा गया था। इसमें शरीर के समस्त अंगों का इस्तेमाल किया जाता है। यह उचित रूप से हैंड टू हैंड कॉम्बैट मार्शल आर्ट है।जिसमें क्रमानुसार पंच मारना होता है।

आशा करते है आपको यह ज्ञानवर्धक जानकारी अवश्य पसंद आई होगी। ऐसी ही अन्य धार्मिक और सनातन संस्कृति से जुड़ी पौराणिक कथाएं पढ़ने के लिए हमें फॉलो करना ना भूलें।

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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