कौन थे वो महान् ऋषिवर जिन्होंने किया था समुद्र का जलपान?

भारतीय वैदिक काल में कई ऐसे ऋषि मुनि हुए। जिन्होंने कठोर तप करके अनेकों सिद्धियां प्राप्त की। साथ ही जो हमेशा से ही भारतीय समाज में ज्ञान और अद्भुत शक्तियों का भंडार माने जाते रहे हैं। इतना ही नहीं, सनातन धर्म के पवित्र ग्रंथों की रचना में भी विभिन्न ऋषि मुनियों का योगदान दृष्टिगोचर होता है।

ऐसे में प्राचीन युग से ही भारत में ऋषि मुनि मनुष्यों को आत्मज्ञान का बोध कराते आए हैं। इस प्रकार, हमारे देश में अत्रि, अंगिरा, दधीचि, दुर्वासा, आत्रेय, भारद्वाज, परशुराम आदि अनेकों महान् ऋषि मुनियों ने जन्म लिया हैं। जिनमें से आज हम एक महान् ऋषि अगस्त्य के जीवन से जुड़ी एक रोचक कहानी के बारे में पढ़ेंगे। जिन्होंने दैत्यों के प्रकोप से धरती को बचाने के लिए समुन्द्र का सारा जल पी लिया था।

जानकारी के लिए बता दें, कि ऋषि अगस्त्य द्वारा समुन्द्र का पान करके दानवों का नाश करने वाली कथा का वर्णन महाभारत वनपर्व के105वें अध्याय के अंतर्गत किया गया है।


उपरोक्त कथा को जानने से पहले हम यह जान लेते हैं कि ऋषि अगस्त्य कौन थे?

ऋषि अगस्त्य को सप्तऋषियों में से एक माना जाता है। जिनका जन्म श्रावण शुक्ल पंचमी को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके पिता का नाम पुलस्त्य ऋषि था। और इनकी पत्नी विदर्भ देश की राजकुमारी लोपामुद्रा थी। जिनसे इनको दृढ़च्युत और इध्मवाह नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

यह एक भारतीय वैदिक ऋषि के रूप में विश्व विख्यात है। जिनको बिजली का आविष्कार करने और विभिन्न मार्गों की खोज करने का भी श्रेय दिया जाता है। साथ ही यह राजा दशरथ के राजगुरु के रूप में भी प्रसिद्ध हैं।

इन्होंने सनातन धर्म के प्रसिद्ध ऋग्वेद के प्रथम मंडल में लगभग 165 से 191 मत्रों को सुक्त किया था। इतना ही नहीं, ऋषि अगस्त्य केरल राज्य में कलरीपायट्टु जोकि एक प्रकार का मार्शल आर्ट्स है, उसके आदि गुरु भी कहलाए जाते हैं।

ऐसे में ऋषि अगस्त्य के वैदिक संस्कृति में अतुलनीय योगदान देने पर उनकी स्मृति के तौर पर भारत समेत विश्व के कई देशों में उनके आश्रमों को स्थापित किया गया है। जहां अगस्त्य से जुड़े साहित्य और पद्धितियां आज भी प्रचलित है।

इसके साथ ही इन्होंने कई सारे पवित्र ग्रंथों अगस्त्य संहिता, सिद्ध वैद्यम् आदि रचनाएं लिखी हैं। उम्मीद करते हैं कि आपको ऋषि अगस्त्य का आरंभिक परिचय प्राप्त हो गया है। तो चलिए अब हम ऋषि अगस्त्य की समुन्द्र पान की कथा के बारे में जानते हैं।


ऋषि अगस्त्य और समुद्र पान की कथा

एक बार देवलोक में दैत्यों ने समस्त देवताओं को अपने आतंक से परेशान कर दिया था। वह सभी दैत्य वृत्तासुर नाम के एक दानव की शक्ति के कारण काफी बलशाली हो चले थे। ऐसे में समस्त देवताओं ने मिलकर वृत्तासुर राक्षस को मारने की योजना बनाई।

जिसके लिए देवलोक के समस्त देवता अपनी समस्या का उपाय जानने के लिए भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे। जहां भगवान ब्रह्मा ने देवताओं से कहा कि आप सभी लोग धरती लोक पर जाएं। जहां महर्षि दधीचि को प्रसन्न करके उनसे वरदान मांगिए।

उनसे वरदान में आप उनकी समस्त हड्डियां मांगना। क्योंकि जब महर्षि दधीचि अपने प्राण त्यागकर अपनी समस्त हड्डियों को आपको वरदान स्वरूप सौंप देंगे। तब उनकी हड्डियों से बने बज्र के द्वारा ही वृत्तासुर जैसे राक्षस को मारा जा सकता है। भगवान ब्रह्मा की आज्ञा मानकर समस्त देवतागणों ने ठीक वैसा ही किया। और जब वह धरती लोक पर पहुंचे।

तब महर्षि दधीचि ने प्रसन्न होकर देवताओं की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग कर दिया। जिसके बाद महर्षि दधीचि की हड्डियों से भगवान इंद्र ने एक बज्र का निर्माण किया। तत्पश्चात् दैत्यों और देवताओं के मध्य एक भयंकर युद्ध छिड़ गया।

लेकिन इंद्र द्वारा बनाए गए बज्र से वृत्तासुर नामक राक्षस की मृत्यु हो गई। जिसके बाद अन्य कालकेय गण के दानव अपनी जान बचाकर समुन्द्र में छिप गए। जहां रहकर उन्होंने तीनों लोकों के सर्वनाश की योजना बनानी प्रारंभ कर दी। उन्हें यह समझ आ गया कि यदि तीनों लोकों का सर्वनाश करना है। तो तप जैसी महान् शक्ति को समाप्त करना होगा।

जिसके लिए सभी ऋषि मुनियों का वध करना आवश्यक होगा। जिसके बाद दैत्यों ने एक एक करके धरती लोक पर मौजूद ऋषियों का वध करना शुरू कर दिया। अब तो धरती पर ऋषि मुनियों के अस्थि कंकाल नजर आने लगे थे। जिसपर चिंतित देवलोक के देवताओं ने भगवान विष्णु के समक्ष इस समस्या को रखा।

जिसपर भगवान विष्णु ने देवताओं से कहा कि वह धरतीलोक की इस समस्या से वाकिफ है। किन्तु कालकेय नामक दानवों का गण काफी शक्तिशाली है। जोकि ऋषि मुनियों का वध करके समुन्द्र में छिप जाता है। ऐसे में इन राक्षसों का वध केवल ऋषि अगस्त्य ही कर सकते हैं।

क्योंकि समुन्द्र के समस्त जल को सोखने की क्षमता केवल ऋषि अगस्त्य में है। जिसके उपरांत ही आप लोग समस्त कालकेय गण के दानवों का अंत कर सकते हैं। इसलिए आपको धरती लोक पर जाकर ऋषि अगस्त्य को समुन्द्र पान के लिए तैयार करना होगा।

भगवान विष्णु की बात मानकर समस्त देवता धरती लोक गए। जहां वह ऋषि अगस्त्य से मिले और उन्हें सम्पूर्ण बात बताई। जिसपर ऋषि अगस्त्य ने कहा कि वह तीनों लोकों की सुरक्षा के लिए यह कार्य करने को तैयार हैं। जिसके बाद ऋषि अगस्त्य समस्त देवताओं के साथ मिलकर समुन्द्र की तरफ चले गए। जहां ऋषि अगस्त्य ने अपनी चमत्कारी शक्तियों के बल पर समुन्द्र का सारा पानी सोख लिया।

जिसके बाद उसमें छिपे बैठे दानवों का युद्ध देवताओं से हुआ। और देवताओं ने कालकेय गण के राक्षसों को युद्ध में परास्त करके उनका वध कर दिया। इस प्रकार, ऋषि अगस्त्य के समुन्द्र पान से तीनों लोकों की रक्षा हुई। हालांकि बाद में ऋषि अगस्त्य समुन्द्र के जल को वापिस करने में असमर्थ हो गए थे। जिस कारण आगे चलकर राजा भगीरथ ने समुन्द्र को जल से भरने का कार्य संपन्न किया।

शिक्षा – उपरोक्त धार्मिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जब भी देश और समाज पर कोई विपदा आएं। तब हमें अपना सौ प्रतिशत देने का प्रयत्न करना चाहिए। तभी हम सच्चे देशभक्त कहलाते हैं।

अगर आपको ऋषि अगस्त्य की यह कहानी अच्छी लगी। तो इसी प्रकार की सनातन धर्म से जुड़ी अन्य धार्मिक कहानियों को पढ़ने के लिए Guruku99 पर दुबारा आना ना भूलें।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

Leave a Comment

You cannot copy content of this page.