भगवान शिव और विष्णु का महाप्रलयंकारी युद्ध

क्या होता अगर भगवान शिव और विष्णु के बीच हुए युद्ध का नहीं हुआ होता अंत?

हिन्दू धर्म में जहां एक ओर भगवान शंकर को सृष्टि का संहारकर्ता कहा गया है। तो वहीं भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार माना जाता है। ऐसे में  विश्व कल्याण के लिए इन दोनों देवों की उपस्थिति अनिवार्य है।

परन्तु सोचिए यदि कोई युद्ध स्वयं भगवान शिव और विष्णु के बीच हो, तब सृष्टि का विनाश होना तय है। ऐसे में आज हम आपसे एक ऐसे ही युद्ध का जिक्र करने जा रहे है। जोकि भगवान शिव और विष्णु के मध्य हुआ था। और यदि उस समय इस युद्ध का अंत नहीं हुआ होता, तो धरती का विनाश निश्चित था।

शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव और विष्णु के बीच हुए इस भीषण युद्ध की दो पौराणिक कथाएं हैं। जोकि आपस में एक दूसरे से परस्पर जुड़ी हुई हैं। तो आइये इनके बारे में विस्तार से जानते हैं।


अमृत मंथन और अप्सराओं से जुड़ी धार्मिक कहानी

पहली धार्मिक कहानी के अनुसार, जब अमृत मंथन के दौरान अमृत कलश निकला। तब उसे दानवों से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपनी मायावी शक्तियों से कई सारी अप्सराओं को जन्म दिया। जिन पर मोहित होकर दानव उन सभी अप्सराओं को बंधी बनाकर पाताल लोक की ओर ले गए।

तत्पश्चात् भगवान विष्णु भी उन अप्सराओं को दानवों से बचाने के लिए पाताल लोक पहुंचे। जहां दानवों का युद्ध भगवान विष्णु से हुआ। जिनको युद्ध में हराकर भगवान विष्णु ने सभी अप्सराओं को दानवों के चंगुल से आजाद कराया। जिसके बाद समस्त अप्सराएं भगवान विष्णु पर मोहित हो गई।

और भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में पाने के लिए भगवान शिव से वरदान मांगने लगी। कहते है तभी भगवान शिव ने उनको वरदान दिया कि अब भगवान विष्णु अप्सराओं के साथ पाताल लोक में रहेंगे। जिसके कारण भगवान विष्णु समस्त संसार के कार्यभार का त्याग करके पाताल लोक चले गए। कहते है तभी भगवान विष्णु को अप्सराओं से पुत्रों की प्राप्ति हुई थी।

हालांकि वह सभी राक्षस प्रवृत्ति के थे। जिन्होंने जन्म लेने के उपरांत ही तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। जिसपर भगवान शिव ने सभी देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु के सभी दैत्य पुत्रों का सर्वनाश करने की ठानी। जिसके लिए भगवान शिव ने स्वयं वृषभ नामक बैल का अवतार लिया था।

जोकि भगवान शिव के 19 अवतारों में से एक था। भगवान शिव के बैल रूपी इस अवतार ने पाताल लोक जाकर भगवान विष्णु के सभी पुत्रों का वध कर दिया। इस प्रकार, भगवान शिव ने वृषभ रूप लेकर तीनों लोकों की रक्षा की। हालांकि भगवान शिव के इस कृत्य से भगवान विष्णु काफी क्रोधित हुए। और उन्होंने भगवान शिव के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।

धार्मिक स्रोतों के अनुसार, वह युद्ध काफी वर्षों तक चला। जिसमें भगवान विष्णु और शिव दोनों की ही ओर से शक्तिशाली अस्त्रों का प्रयोग किया गया था। लेकिन ना तो इस युद्ध में भगवान शिव विजयी हुए और ना ही भगवान विष्णु। जबकि भगवान शिव और विष्णु के युद्ध के कारण धरती का संतुलन बिगड़ गया था।

ऐसे में धरती की रक्षा के लिए गणेश देवता ने पाताल लोक की अप्सराओं को उस वरदान से भगवान विष्णु को मुक्त करने के लिए कहा। जिसके वसीभूत होकर भगवान विष्णु अपने कर्तव्य को भूला बैठे थे। गणेश देवता की आज्ञा मानकर अप्सराओं ने भगवान विष्णु को वरदान से मुक्त कर दिया।

जिसके बाद भगवान विष्णु और शिव के बीच चल रहे युद्ध की समाप्ति हुई। तत्पश्चात् भगवान विष्णु पाताल लोक से विष्णु लोक लौट आए। और उन्होंने वहां भगवान शिव की आराधना की। कहा जाता है इसी दौरान भगवान विष्णु को शंकर भगवान से सुदर्शन चक्र की प्राप्ति हुई थी, क्यूंकि भगवान विष्णु अपना सुदर्शन चक्र पाताल लोक ही छोड़ आए थे।


माता लक्ष्मी और उनकी पांचों बहनों से जुड़ी धार्मिक कहानी

दूसरी धार्मिक कथा के अनुसार, कहा जाता है कि जब माता लक्ष्मी अपने पिता समुन्द्र देवता से मिलने पहुंची। तब उनके पिता काफी चिंतित लग रहे थे। माता लक्ष्मी ने अपने पिता से उनकी चिंता का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि पुत्री वैसे तो मैं बहुत प्रसन्न हूं। क्योंकि भगवान विष्णु तुम्हारे पति परमेश्वर है।

लेकिन तुम्हारी पांचों बहनें सुवेषा, सुकेशी, समिषी, सुमित्रा और वेधा भी भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही हैं। यह सुनकर माता लक्ष्मी भी चिंतित हो जाती हैं। और तुरंत ही भगवान विष्णु के पास जाकर उनसे यह पूछती है। कि स्वामी मेरे सम्पूर्ण हृदय में आपका वास है, परन्तु आपके हृदय में किसका वास है?

माता लक्ष्मी के इस प्रश्न को सुनकर भगवान विष्णु कहते हैं कि मेरे हृदय के एक भाग में भगवान शिव का वास है। और दूसरे हिस्से में माता लक्ष्मी समेत समस्त प्राणी रहते हैं। भगवान विष्णु के मुख से यह वचन सुनकर माता लक्ष्मी दुःखी हो जाती है।

उधर, माता लक्ष्मी की पांचों बहनें अपनी तपस्या में सफल हो जाती हैं। और भगवान विष्णु उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें मनवांछित वरदान मांगने को कहते हैं। जिसपर वह पांचों देवियां भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में पाने का वरदान मांगती है।

और भगवान विष्णु उन्हें ताथस्तु का आशीर्वाद दे देते हैं। साथ ही वह उन पांचों देवियों के साथ पाताल लोक में वास करने लगते है। भगवान विष्णु के पाताल लोक जाने के बाद सम्पूर्ण संसार का संतुलन बिगड़ने लगता है। जिससे चिंतित होकर माता लक्ष्मी भगवान शिव के पास जाती हैं।

जहां माता पार्वती ने उनसे कहती हैं कि हे देवी! आप यह निश्चित ही जानती हैं कि भगवान विष्णु जगत के पालनहार है। ऐसे में जहां भगवान शिव के हृदय के एक भाग में भगवान विष्णु का वास है। तो वहीं उनके हृदय के दूसरे भाग में मैं समस्त प्राणियों के साथ रहती हूं।

और इसलिए मैं अत्यंत खुश हूं कि भगवान शिव के हृदय में मेरा विशेष स्थान है। ठीक उसी प्रकार से भगवान विष्णु के हृदय के एक भाग में आपका भी विशेष स्थान है। माता पार्वती की यह बात सुनकर माता लक्ष्मी को अपनी भूल पर पछतावा होता है।

तो वहीं माता लक्ष्मी के आग्रह पर भगवान शिव भगवान विष्णु को पाताल लोक से वापस लाने का मार्ग खोजते हैं। और वृषभ नामक बैल का अवतार लेकर पाताल लोक पर आक्रमण कर देते हैं। जिसपर भगवान विष्णु भी भगवान शिव पर पलटवार करते हैं।

इस प्रकार दो शक्तिशाली देवों के मध्य युद्ध प्रारंभ हो जाता है। जहां भगवान विष्णु युद्ध के दौरान महादेव पर नारायण अस्त्र का प्रयोग करते हैं। तो वहीं भगवान शिव भी भगवान विष्णु पर पशुपत अस्त्र का प्रयोग करते हैं।

यह युद्ध दो बराबर शक्ति रखने वाले भगवानों के मध्य हुआ था, इसलिए यह युद्ध युगों तक चला। फिर एक समय ऐसा आया कि दोनों भगवानों ने एक दूसरे को अपने अस्त्रों में बांध दिया।  परिणामस्वरूप, गणेश देवता ने पाताल लोक जाकर पांचों देवियों से कहा कि वह भगवान विष्णु को अपने वरदान से मुक्त कर दें। तभी यह युद्ध समाप्त हो पाएगा।

जिससे समस्त सृष्टि का संतुलन भी ठीक हो जाएगा। गणेश देवता की बात मानकर पांचों देवियों से भगवान विष्णु से कहा कि आप जगत के पालनहार है। आपको हम अपने वरदान से मुक्त करते हैं। जिसके बाद जाकर भगवान विष्णु और शिव के बीच का युद्ध खत्म हुआ। और भगवान विष्णु ने दुबारा वैकुंठधाम की ओर प्रस्थान किया।


इस प्रकार, भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच युगों युगों तक कई सारे युद्ध हुए। जिनमें भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों जैसे राम, कृष्ण और महादेव के मध्य हुए युद्ध विशेष हैं। जिनके बारे में हम आपको अपने अगले लेख में बताएंगे। तब तक आप यह बताइएगा कि आपको हमारा यह लेख कैसा लगा?

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ॐ नमः शिवाय।।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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