शिवलिंग है प्राचीन विज्ञान का प्रतीक, इसकी उत्पत्ति का रहस्य

Shivling

शिवलिंग की महिमा का बखान करते हुए स्कंद पुराण और वायु पुराण में लिखा है कि… 

“शिवलिंग के भीतर ब्रह्मांड की समस्त शक्तियां मौजूद हैं, ऐसे में जब सम्पूर्ण संसार का अंतिम समय निकट होगा, तब सारी दैवीय शक्तियां शिवलिंग में अंतर्निहित हो जाएंगी”

सम्पूर्ण विश्व में जहां भी हिंदू धर्म के अनुयायी मौजूद हैं, वहां शिव भगवान के प्रतीक के तौर पर शिवलिंग की पूजा की जाती है।

शिवलिंग क्या है?

धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से ये कितना महत्वपूर्ण है?

इसकी रचना कैसे हुई और ये ऐसा क्यों दिखता है?

साथ ही ये कैसे अस्तित्व में आया? यदि आप भी शिवलिंग के बारे में यह सब जानना चाहते हैं, तो हमारा ये लेख आपके लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

हिंदू धर्म में तीन प्रमुख देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश माने गए हैं।

जिन्हें ही सृष्टि की रचना का श्रेय दिया जाता है। इन त्रिदेवों में महेश यानि भगवान शंकर को सृष्टि का संहारकर्ता कहा गया है, जोकि दुष्टों का सर्वनाश करते हैं, और अपने भक्तों को मनचाहा वरदान देते हैं।

कलियुग में भगवान शिव के प्रतीक के तौर पर शिवलिंग की पूजा की जाती है। ऐसे में भगवान शिव ही एकमात्र ऐसे देव हैं, जिनको मूर्ति और शिवलिंग दोनों ही रूपों में पूजा जाता है।

तो चलिए अब हम जानते हैं कि क्या है शिवलिंग की उत्पत्ति का रहस्य…

शिवलिंग का अर्थ क्या है और क्या है इसका धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व?


शिवलिंग दो शब्दों के मेल से बना है, शिव और लिंग यानि परम कल्याणकारी शिव का प्रतीक।

अन्य धार्मिक स्रोतों के मुताबिक, शिवलिंग लिया और गम्य दो शब्दों के मेल से बना है, जिसका अर्थ आरंभ से लेकर अंत होता है।

जिसके अनुसार, शिवलिंग ब्रह्मांड के आरंभ से लेकर अंत तक विद्यमान है। जिसके चलते वर्षों से धरती पर शिवलिंग को भगवान शिव के अवतार के रूप में पूजा जा रहा है।

जिसकी उत्पत्ति को लेकर कई सारी धार्मिक कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन अगर इसके वैज्ञानिक आधार पर नजर डालें तो ऐसा माना जाता है कि शिवलिंग हजारों सालों वर्षों पूर्व धरती पर गिरे उल्का पिंडों से ही निकले हैं।

जिन्हें आगे जाकर धार्मिक दृष्टि से प्रकाश का स्रोत यानि ज्योतिर्लिंग मान लिया गया। जबकि कुछ साल पहले विदेशी वैज्ञानिकों द्वारा की गई खोज में यह बात सामने आ चुकी है कि शिवलिंग परमाणु रिएक्टर से संबंधित है।

जिस पर जल चढ़ाने और चंदन का लेप लगाने के पीछे वैज्ञानिक मान्यता यह है कि परमाणु रिएक्टर को भी ठंडा या शांत करने के लिए जल की बूंद का सहारा लिया जाता है।

इस तरह से शिवलिंग में परमाणु रिएक्टर की तरह रेडिएशन होने के कारण इसके चारों ओर परिक्रमा भी नहीं की जाती है।


इतना ही नहीं, शिवलिंग पर चढ़ाएं जल को जोकि नाली के सहारे बाहर जाता है, उसे फलांगने को भी मना किया जाता है,

क्योंकि शिवलिंग से निकलने वाला रेडिएशन भी परमाणु रिएक्टर की तरह शरीर के अंगों के लिए हानिकारक माना जाता है।

जबकि धार्मिक आधार पर शिवलिंग की उत्पत्ति का आधार प्राकृतिक बताया जाता है।

कहा जाता है कि एक बार जब देवलोक में ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच श्रेष्ठता सिद्ध करने की होड़ मच गई।

तब अग्नि से उत्पन्न लिंग उन देवों के मध्य आ गया।

जिसके रहस्य को खोजने के लिए स्वयं ब्रह्मा और विष्णु ने सालों तक प्रयत्न किया, लेकिन वह उसकी उत्पत्ति के बारे में कुछ पता नहीं लगा पाए।

जिसके बाद स्वयं भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और दोनों देवों के मध्य मैत्री भाव स्थापित कराया।

तभी से भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाने लगा और अग्नि से उत्पन्न लिंग को शिव जी के प्रतीक चिह्न के तौर पर स्थापित करके पूजा जाना जाने लगा।

जिस पर जल या दूध चढ़ाने के पीछे भी एक धार्मिक मान्यता है कहा जाता है कि जब समुद्र मंथन से निकले विष को भोलेनाथ ने अपने कंठ में रख लिया था,

तब भगवान शंकर के शरीर का दाह बढ़ गया था,

जिसे शांत करने के लिए शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाने की परपंरा शुरु हुई।

शिवलिंग कितने प्रकार के हैं?

हिंदू पुराणों के अनुसार, शिवलिंग 6 प्रकार के होते हैं, जिनका वर्णन निम्न है। जिनमें से दो प्रमुख हैं।

देव लिंग

जिन शिवलिंगों को देवलोक के देवी देवताओं द्वारा निर्मित या स्थापित किया गया, उन्हें देव लिंग कहा गया।

जबकि असुरों जैसे रावण द्वारा स्थापित शिवलिंग को असुर लिंग की उपाधि दी जाती है। इसी तरह से ऋषि मुनियों द्वारा स्थापित शिवलिंग को अर्श लिंग कहा जाता है।

पुराण लिंग

जिन लिंगों की उत्पत्ति के बारे में पुराण और धार्मिक किताबों में उल्लेख मिलता है, वह पुराण लिंग होते हैं। जबकि साधारण मनुष्यों द्वारा स्थापित लिंग को मानव शिवलिंग कहा गया है।

धार्मिक पुराणों में, शिवलिंग को अग्नि स्तंभलिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभलिंग, ऊर्जा स्तंभलिंग, प्रकाश स्तंभलिंग और ज्योतिर्लिंग आदि नामों से भी वर्णित किया गया है।

ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति को लेकर कहा जाता है कि जब धरती पर उल्का पिंड गिरे, तब लोगों ने उसे प्रकाशपिंड मान लिया।

जो जहां गिरे, मनुष्यों ने वहीं शिव मंदिर बना दिए। हालांकि उस दौरान भारत में 108 ज्योतिर्लिंग मौजूद थे, लेकिन धीरे धीरे उनकी संख्या 12 रह गई।

यही कारण है कि भारत में मौजूद 12 ज्योतिर्लिंग का विशेष धार्मिक महत्व है,

जोकि 12 खंडों (जीव, माया, मन, बुद्धि, अहंकार, वायु, अग्नि, जल, मन, ब्रह्म, आकाश, धरती) को दर्शाते हैं।

शिवलिंग का आकार ऐसा क्यों हैं ?


हम शिवलिंग का जो रूप वर्तमान में देखते हैं, वह गोलाकार, स्तंभाकार और अंडाकार रूप में मौजूद है।

धार्मिक मान्यताओं की मानें तो शिवलिंग का ऐसा आकार इसलिए है क्योंकि भगवान शिव ही वह बीज हैं, जिन्होंने सृष्टि की रचना की है।

जिस कारण शिवलिंग का आकार अंडाकार है क्योंकि इसी में ब्रह्मांड का आरंभ हुआ है और अंत भी इसी में सुनिश्चित है।


जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अंडे के आकार जैसे एक छोटे से अणु से निर्मित हुआ है, जिसको ही शिवलिंग की उत्पत्ति का आधार माना जाता है।

वहीं बात करें शिवलिंग के भागों के बारे में..तो शैव संप्रदाय के अनुयायियों ने दो भागों में बांटा है।

उनके अनुसार शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा परमशिव यानि निराकार शिव और निचला भाग पराशक्ति यानि सर्वव्यापी शिव का प्रतिनिधित्व करता है। 

जबकि अन्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग को तीन भागों में बांटा गया है। जिसमें ऊपरी हिस्सा भगवान शिव, मध्यम हिस्सा भगवान विष्णु और निचला हिस्सा ब्रह्मा जी का प्रतीक माना गया है।

कुछ लोग शिवलिंग के ऊपरी हिस्से को स्त्री जाति का प्रतीक जबकि ऊपरी हिस्से को पुरुष जाति का प्रतीक मानते हैं।

जबकि शिवलिंग पर तीन लकीरें शिव जी के त्रिनेत्र और एक बिंदु ज्योति स्वरूप आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है।

प्राकृतिक और मानव निर्मित शिवलिंग में मुख्य अंतर क्या है


शैव अनुयायियों की मानें तो शिवलिंग स्फटिक नामक पत्थर से निर्मित है, जिसे प्राकृतिक शिवलिंग की संज्ञा दी गई है।

जबकि उनके अनुसार, अस्थाई प्रकार के शिवलिंग का निर्माण 12 सामग्रियों जैसे, रेत, चावल, पकाए गए भोजन, गाय के गोबर, मक्खन, रुद्राक्ष बीज, राख, चंदन, दूब घास, फूलों की माला, शीरा और नदी की मिट्टी आदि से किया जा सकता है।

इस प्रकार, मानव निर्मित शिवलिंग जमे हुए ठोस पारे और पन्ना रत्न से बनाया जा सकता है, जबकि स्फटिक खनिज से बने शिवलिंग को प्राकृतिक शिवलिंग माना जाता है। 

क्या है शिवलिंग का प्राचीन इतिहास?


ऐतिहासिक दृष्टि से देखें, तो आज से करीब 3500 ईसा पूर्व से लेकर 2300 ईसा पूर्व भी शिवलिंग की पूजा होती थी, जिसके साक्ष्य हमें सिंधु घाटी, मेसोपोटामिया और बेबोलिन आदि सभ्यताओं से मिले हैं।

जहां पशुओं के संरक्षक देवता के तौर पर भगवान शिव के उस रूप को पूजा जाता था। जिसे वर्तमान में हम भगवान शिव के पशुपति अवतार के रूप में पूजते हैं।

वहीं सैंधव सभ्यता में 3 मुंह वाले पुरुष की तस्वीर के भी साक्ष्य मिले थे, जिसे ही भगवान शिव का प्रतीक माना गया है। इन्हीं स्थानों से शिवलिंग के साक्ष्य दुनिया के सामने आए थे, जो आज भी तथ्यात्मक माने जाते हैं।

विभिन्न जगहों पर खुदाई में प्राप्त हुए प्राचीन शिवलिंग 


सम्पूर्ण भारतवर्ष में कुल 12 ज्योतिर्लिंग हैं, जिनको हिंदू धर्म में विशेष मान्यता दी गई है। लेकिन इनके अलावा भी, कई सारी जगहों पर प्राकृतिक तौर पर शिवलिंग पाए गए हैं।

जिनका वर्णन निम्न प्रकार से हैं….

  1. आंध्र प्रदेश में गुडिमल्लन नामक स्थान पर आज भी दूसरी शताब्दी में खुदाई से मिली शिवलिंग की पूजा की जाती है, जिसमें साक्षात भगवान शिव की प्रतिमा देखी गई है।

  2. आंध्र प्रदेश की ही बोरा गुफाओं में प्राकृतिक शिवलिंग  पाया गया था। जिसका धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है।

  3. नर्मदा नदी के आसपास ही बाणलिंग खुदाई के दौरान पाए गए थे।

  4. हर वर्ष शीत ऋतु में अमरनाथ की गुफाओं में बर्फ का शिवलिंग बनता है, जिसका धार्मिक तौर पर विशेष महत्व माना गया है।

  5. कदावुल मंदिर, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका में भी एक स्फटिक शिवलिंग मौजूद हैं। जिसको भी खुदाई के दौरान प्राप्त किया गया था।

  6. गढ़वाल उत्तराखंड में हिमानी नदी के आसपास भी एक शिवलिंग प्राकृतिक रूप से पाया गया है, जिसको भी धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जाता है।

  7. सिद्धेश्वर नाथ मंदिर, अरुणाचल प्रदेश में भी सबसे ऊंचा शिवलिंग खुदाई के दौरान प्राप्त हुआ था।

  8. छत्तीसगढ़ राज्य में मिले भूतेश्वर शिवलिंग को भी धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।

तो इस प्रकार, शिवलिंग हिंदू धर्म के लोगों द्वारा धार्मिक दृष्टि से काफी जरूरी माना गया है।

जिसे ही भगवान शिव का कलियुगी अवतार कहा जाता है और विभिन्न धार्मिक अवसरों खासकर महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पूजन और शिव जी के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों पर शिवलिंग का श्रृंगार और भस्म आरती का प्रचलन है।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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