हिंदू धर्म के वैदिक ग्रंथों में बताया गया है सृष्टि के सृजन का रहस्य, इस तरह से रचा गया था ब्रह्मांड

theory of world creation

The Theory of Creation of World by Hindu Mythology

सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर धर्म और विज्ञान दोनों ही अलग-अलगमत प्रस्तुत करते हैं। जहां विज्ञान सृष्टि की उत्पत्ति के लिए बिग बैंग (Big Bang) की थ्योरी को सच मानता है, तो वहीं धार्मिक दृष्टि से, सृष्टि का निर्माण ईश्वर की देन है।

लेकिन हिंदू धर्म के विभिन्न वेदों और धार्मिक ग्रंथों में सृष्टि की रचना का सार अलग तरीके से बताया गया है। जिस आधार पर हमारे आज के इस लेख में हम आपको हिंदू धर्म की वैदिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई? इसके बारे में विस्तार से जानकारी देने वाले हैं।

ऋग्वेद में क्या लिखा है?

सृष्टि से पहले सत और असत नहीं था, अंतरिक्ष और आकाश भी नहीं था। छिपा था क्या कहां? किसने देखा था उस पल को अगम….अटल जल भी कहां था।

तात्पर्य यह है कि सृष्टि की रचना से पहले ब्रह्मांड शून्य था। यहां सिर्फ अंधकार मौजूद था। फिर जब सृष्टि के निर्माण का समय आया, तब ब्रह्मांड में एक ज्योति बिंदु उत्पन्न हुआ। जिसमें हुए विस्फोट से ही सृष्टि के अंकुरण का बीज फूटा।

माना जाता है कि इसी बिंदु में से निकलने वाली ध्वनि को हिंदू धर्म में ॐ रूप में स्वीकार किया गया है। सरल शब्दों में, परमपिता परमात्मा के बिंदुरूप से निकली ध्वनि और प्रकाश ही सृष्टि के निर्माण के लिए जिम्मेदार हैं।

वेदों में सृष्टि के निर्माण से जुड़ी क्या है मान्यता?

वेदों में लिखा है कि सृष्टि का सृजन ईश्वर ने नहीं, बल्कि ईश्वर की उपस्थिति में हुआ है। इस तरह से आत्मा और परमात्मा में कोई अंतर नहीं है। आत्मा बिना परमात्मा नहीं और परमात्मा बिन आत्मा नहीं। आत्मा और परमात्मा के बिना ब्रह्मांड की कल्पना करना भी निरर्थक है।

वेदों के अनुसार, ये सम्पूर्ण ब्रह्मांड पांच कोषों के साथ मिलकर बना है…जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। इन पांचों कोषों के होने पर ही ब्रह्मांड अस्तित्व में आया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ब्रह्मांड, ब्रह्म और आत्मा जैसे तत्वों के मिलन पर ही बना है। जहां ब्रह्म ही सृष्टि की रचना और विनाश के लिए उत्तरदायी हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद को आधार मानें तो..ब्रह्म ने जब बिंदु स्वरूप होकर सृष्टि के निर्माण का बीज बोया। तब उसके बाद आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, औषधि, अन्न, वीर्य और उसके बाद मानव योनि अर्थात् पुरुष का जन्म हुआ। जिसे प्रकृति से सत्व, रज और तम गुणों की प्राप्ति हुई।

सात्विक गुणों में गंभीरता का भाव झलकता है, रजो गुण क्रियाशील हैं और तम विस्फोटक प्रवृत्ति के हैं। इन तीनों के क्रियाशील होने पर ही सृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया पूर्ण हुई। जिससे ही दिन-रात, ग्रह, नक्षत्र, आकाश, लोक परलोक, प्रकृति आदि अस्तित्व में आए। साथ ही इन्हीं गुणों से पंचइंद्रियों ने जन्म लिया। जिसके आधार पर ही मानव मस्तिष्क कार्य करता है।

हिंदुओं की सृष्टि के निर्माण से जुड़ी धार्मिक मान्यता

हिंदुओं ने ब्रह्मदेव और भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप को सृष्टि की रचना के लिए जिम्मेदार ठहराया है। उनके अनुसार, ब्रह्मांड में पुरुष और स्त्री की रचना ने ही सृष्टि के संचालन का कार्यभार संभाला। इस प्रकार, सृष्टि की रचना के उपरांत श्रद्धा और मनु नामक स्त्री पुरुष ने जन्म लेकर सम्पूर्ण सृष्टि का उद्धार किया। इस थ्योरी के मुताबिक, ब्रह्म ने ही मानव योनि को जन्म दिया है, जिसके अंत में उसे ब्रह्म में ही लीन हो जाना है

अंतिम सार

ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर वेद अलग मान्यताएं रखता है। इसके मुताबिक आज से 14 अरब वर्ष पहले ब्रह्मांड का सूत्रपात हुआ था। और जब सृष्टि अस्तित्व में आई तब प्रकृति के आठों तत्व पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी जन्मे। आगे चलकर इन्हीं से ज्ञानेंद्रियों और कमेंद्रियां विकसित हुईं। जिनसे मन का निर्माण हुआ और मानव बुद्धि कार्य करने लगी।

यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड जल से अधिक अग्नि, अग्नि से अधिक वायु, वायु से अधिक आकाश, आकाश से अधिक अंधकार और अंधकार से अधिक अनंत से घिरा है। सम्पूर्ण मानव जाति अपने अंत समय में इसी अनंत का हिस्सा बनकर रह जाती है, अर्थात् ब्रह्म से आरंभ होकर ब्रह्म में ही लीन होना प्रकृति के उत्पन्न होने की शक्ति का अद्भुत और जटिल रहस्य है, जिसको सुलझाना साधारण मानव के वश की बात नहीं है।

लेकिन फिर भी वैदिक ग्रंथों ने सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े अनेकों रहस्यों को उजागर किया है। इतना ही नहीं, धरती पर आने वाले प्रलयों के विषय में भी वेदों में वर्णित है। जिसमें चार प्रकार के प्रलयों के विषय में बताया गया है….नित्य, नैमित्तिक, द्विपार्थ और प्राकृत।

हिंदुओं की पवित्र श्रीमद्भागवत गीता में लिखा है कि एक दिन जब धरती का अंत समय निकट होगा तो जो कुछ भी ब्रह्म द्वारा प्रकट है, वह सब उसी में मिल जाएगा। ऐसे में ब्रह्म द्वारा उत्पन्न जो आत्माएं श्रेष्ठ हैं, वह परलोक सिधार जाएंगी और अन्य मृत्यु को प्राप्त करके पुन: जन्म लेंगी और जन्म-मृत्यु का ये चक्र इसी तरह से चलता रहेगा।

इतना ही नहीं, प्रकृति में भी अंत समय में कुछ बदलाव होते हैं, जैसे लहलाती फसल सूख जाती है, बर्फ  इस तरह से सृष्टि के निर्माण के दौरान ब्रह्मांड में भूमि, आकाश और स्वर्ग की अवधारणाएं प्रस्तुत की गई थी, इन्हीं से सृष्टि का पालन होता है और इसके ऊपर या पश्चात् असीम आनंद मौजूद है।

आशा करते है आपको यह ज्ञानवर्धक जानकारी अवश्य पसंद आई होगी। ऐसी ही अन्य धार्मिक और सनातन संस्कृति से जुड़ी पौराणिक कथाएं पढ़ने के लिए हमें फॉलो करना ना भूलें।

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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