तक्षशिला, भारत में था दुनिया का पहला विश्वविद्यालय

Takshashila


तक्षशिला विश्वविद्यालय प्राचीन भारत की ऐतिहासिक धरोहर के तौर पर जाना जाता हैं। जिसके गौरवशाली अतीत पर सम्पूर्ण विश्व आज भी गर्व करता है।

हालांकि वर्तमान पीढ़ी विश्व प्रसिद्ध नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय के नाम से तो वाकिफ है।

लेकिन इसके बारे में, बहुत कम लोगों को ही मालूम है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय को सम्पूर्ण विश्व के प्रथम विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है।

इतना ही नहीं, भारत के महान नीतिज्ञ चाणक्य ने भी इसी विश्व प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान से शिक्षा हासिल की थी।

ऐसे में हमारा आज का यह लेख पूर्ण रूप से तक्षशिला विश्वविद्यालय के प्राचीन और गौरवमयी इतिहास को अपने पाठकों को बताने के लिए प्रतिबद्ध है।

हालांकि वर्तमान में हम तक्षशिला विश्वविद्यालय का जो खंडहर स्वरूप देख रहे हैं, वह पहले ऐसा नहीं था।

जबकि बीते दिनों तो पाकिस्तान ने तक्षशिला विश्वविद्यालय को भारत का हिस्सा मानने से इंकार कर दिया था, जिस पर काफी विवाद भी हुआ था।

लेकिन तक्षशिला विश्वविद्यालय का प्राचीन इतिहास वर्तमान से काफी सहज और गौरवशाली है। तो चलिए जानते हैं तक्षशिला विश्वविद्यालय के सम्पूर्ण इतिहास के बारे में।

तक्षशिला विश्वविद्यालय का संबंध है त्रेतायुग से


तक्षशिला विश्वविद्यालय के इतिहास की जड़ें काफी प्राचीन है।

जिसे समझने के लिए हमें भारत के चक्रवर्ती सम्राट अशोक के दरबार से लेकर अलग-अलग युगों तक का रूख करना पड़ेगा।

जैसा कि आप जानते हैं कि चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर सम्पूर्ण विश्व में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया था, जिस कारण 6वीं शताब्दी बौद्ध काल के नाम से जानी गई।

इसी काल में शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने के लिए विद्यालयों की स्थापना की गई थी।

जबकि सनातन धर्म में शिक्षा प्रदान करने के लिए गुरुकुल और आश्रमों की व्यवस्था पहले ही हो चुकी थी।

लेकिन शिक्षा के लिए विद्यालय और महाविद्यालयों की स्थापना बौद्ध काल में हुई थी।

ऐसे में माना जाता है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय का निर्माण बौद्ध काल में 6 वीं से 7 वीं शताब्दी के मध्य हुआ था। 

हालांकि तक्षशिला विश्वविद्यालय को बनाने का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जाता है, इसका संबंध कई युगों से जुड़ा हुआ है।

ऐसे में धार्मिक स्रोतों के अनुसार, तक्षशिला का नाम भगवान श्री राम के भाई भरत के बेटे तक्ष के नाम पर रखा गया था।

जिन्होंने ही त्रेतायुग में तक्षशिला नगरी भी स्थापित की थी, जोकि द्वापर युग में गांधार देश की राजधानी हुआ करती थी।

जिस कारण द्वापर युग में तक्षशिला विश्वविद्यालय के संरक्षण का जिम्मा गांधार के तत्कालीन नरेश आंभिक को सौंपा गया था। 

वर्तमान में कहां मौजूद है तक्षशिला विश्वविद्यालय?

वर्तमान में तक्षशिला विश्वविद्यालय की मौजूदगी की बात करें तो यह विश्वविद्यालय पाकिस्तान के इस्लामाबाद शहर से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

यानि पाकिस्तान अधिकृत पंजाब के रावलपिंडी जिले में तक्षशिला विश्वविद्यालय के अवशेष मौजूद हैं।

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जिस कारण पाकिस्तान की सरकार तक्षशिला को पाकिस्तान की धरोहर बताती हैं, लेकिन यह सर्वविदित है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास का संबंध केवल और केवल भारतवर्ष से जुड़ा है।

जिसके कई पौराणिक और सामाजिक साक्ष्य मौजूद है, जिनके बारे में आगे हम आपको बताएंगे।

प्राचीन समय में तक्षशिला विश्वविद्यालय की जगह के बारे में बात करें तो धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्री राम के अनुज भरत ने गांधार राज्य को जीतने के बाद अपने दोनों पुत्र तक्षशिला और पुष्करावती को गांधार राज्य सौंप दिया। जोकि उस समय सिंधु नदी के समीप स्थित था।

वर्तमान में जब भारत पाकिस्तान का विभाजन हुआ, तब सिंधु नदी के आसपास बसा अधिकांश क्षेत्र पाकिस्तान के पास चला गया।

जिस कारण वर्तमान में तक्षशिला विश्वविद्यालय पाकिस्तान में मौजूद है, जोकि वर्तमान में बिल्कुल ही खंडहर स्थिति में है। 


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तक्षशिला विश्वविद्यालय के खंडहर में बदलने के पीछे का कारण

वर्तमान में तक्षशिला विश्वविद्यालय का जो स्वरूप आपको देखने को मिल रहा है, वह ऐसा नहीं था।

जिस तरह से भारत का प्राचीन इतिहास काफी गौरवशाली और वीर पुरुषों से भरा पड़ा है, लेकिन समय समय पर यहां इस्लाम, शक, हूण, कुषाण, यूनानी, ब्रिटिश हुकूमत ने शासन किया।

इस दौरान जब मोहम्मद गजनवी, गौरी, औरंगजेब, बाबर, गजनवी, खिलजी समेत अनेक आक्रांताओं ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता को नष्ट करना चाहा, तब तक्षशिला विश्वविद्यालय भी इसी की भेंट चढ़ गया।

इतना ही नहीं, इन इस्लामिक आक्रांताओ ने इससे जुड़े साहित्य को भी नष्ट कर दिया था।

ऐसे में जब 7वीं सदी के दौरान चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया, तो उन्होंने प्राचीन भारत की धरोहर तक्षशिला को खंडहर पाया।

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तक्षशिला प्राचीन भारत में शिक्षा के अलावा व्यापार और राजनीति का भी प्रमुख केंद्र हुआ करता था।

जिस कारण भारत देश पर आक्रमण करने वाले लोगों ने तक्षशिला के अस्तित्व को भी मिटाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन वह पूरी तरीके से इसमें सफल नहीं हो सके।

तक्षशिला विश्वविद्यालय से जुड़ी मुख्य बातें

  1. इस महान विश्वविद्यालय में केवल भारतवर्ष से ही नहीं, अपितु चीन, सीरिया, ग्रीस, बेबीलोन से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।
  2. तक्षशिला विश्वविद्यालय में अध्यापक वेतन भोगी नहीं हुआ करते थे और न ही वहां कोई निर्धारित विषय पढ़ाए जाते थे।
  3. यहां लगभग 64 विषयों का अध्ययन कराया जाता था, जिनमें अर्थशास्त्र, दर्शन, व्याकरण, आयुर्वेद, ललित कलाओं, युद्ध विद्या, राजनीति, शल्यक्रिया, मंत्र विद्या, ज्योतिष, अश्व विद्या, राजनीति, अनेक भाषाएं, हस्त विद्या, गणित और सामाजिक विषयों की शिक्षा दी जाती थी।
  4. इस विश्वविद्यालय को बौद्ध भिक्षु महाविहार कहकर संबोधित किया करते थे।
  5. महान नीतिज्ञ चाणक्य के अतिरिक्त इस विश्वविद्यालय से पाणिनी, कोसल नरेश प्रसेनजित, वैशाली के महाली, मगध नरेश बिंबिसार के राजवैद्य जीवक, प्रसिद्ध चिकित्सक कौमारभृत्य, वसुबंधु आदि ने भी शिक्षा ग्रहण की थी।
  6. तक्षशिला विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म के बारे में बताने के लिए कई प्रकार के बौद्ध स्तूप, स्तंभ, विहार और मंदिर बने हुए थे, जोकि बौद्ध और हिंदू धर्म से जुड़ी संस्कृति और सभ्यता का प्रचार प्रसार करते थे।
  7. इस प्राचीन विश्वविद्यालय के बारे में चाणक्य ने अपनी अर्थशास्त्र में, पाणिनी ने अपनी रचनाओं में, ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत में और अनेक बौद्ध धर्म के अनुयायियों, विदेशी यात्रियों ने अपनी रचनाओं में किया है।
  8. प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत में तक्षशिला को ता चा शि ले कहकर संबोधित किया था, जिसके साक्ष्य हमें पाकिस्तान के एक म्यूजियम से मिलते हैं।
  9. तक्षशिला विश्वविद्यालय सम्पूर्ण तक्षशिला नगरी में बसा हुआ था, जैसे आज बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस के अधिकांश भाग में बसा हुआ है।
  10. तक्षशिला विश्वविद्यालय को यूनेस्को ने वर्ष 1980 में विश्व विरासत सूची में शामिल किया था।

इतिहास के बारे में जानकारी हमें प्राचीन शिलालेख, पांडुलिपियों, धार्मिक ग्रंथों, किताबों या खुदाई में प्राप्त वस्तुओं के माध्यम से होती है।

उसी तरह से तक्षशिला के बारे में भी हमें जानकारी खुदाई में मिले अवशेषों से मिली है।

वर्ष 1863 में जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था, तब जनरल कनिंघम को तक्षशिला के खंडहर के विषय में जानकारी मिली थी।

ठीक इसी तरह से, सिंधु घाटी सभ्यता की खोज के दौरान यानि साल 1912 से लेकर 1929 के मध्य सर जॉन मार्शल ने तक्षशिला नगरी से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण सामग्रियों के बारे में खुदाई से पता लगाया था। 

इस प्रकार, तक्षशिला विश्वविद्यालय प्राचीन भारत के इतिहास का आवश्यक पहलू है, जिसको संरक्षित और सहजने की जिम्मेदारी हर भारतीय नागरिक की है।

लेकिन इसके लिए तक्षशिला विश्वविद्यालय के इतिहास बारे में जानना भी जरूरी है। हम उम्मीद करते हैं हमारे उपरोक्त लेख से आपको इसके विषय में सारी जानकारी मिल गई होगी।


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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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