सालों से धरती पर मौजूद हैं ये चिरंजीवी, जानिए क्यों अब तक नहीं मिला इन्हें जन्म मरण के बंधन से छुटकारा

Chiranjivi


चिरंजीवी भव:…. अर्थात् अमर रहो। सोचिए अगर आपको आशीर्वाद के तौर पर अमर होने का वरदान मिल जाए, तो आपको कभी मृत्यु का भय नहीं सताएगा।

लेकिन अगर धरती पर केवल आप ही जीवित बचे हो, तो सोचिए ये कितना अजीब है।

हालांकि भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भागवतगीता में कहा है कि….

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्धुवं जन्म मृतस्य च।

तस्मादपरिहार्येर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।

अर्थात् जिस व्यक्ति ने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है। उसे दुबारा भी जन्म लेना पड़ता है, इसलिए मनुष्य को किसी भी परिस्थिति में शोक नहीं करना चाहिए।

हिंदू धार्मिक स्त्रोतों के अनुसार, धरती पर आज भी ऐसे 8 लोग मौजूद हैं, जिन्हें चिरकाल तक जीवित रहने का वरदान मिला हुआ है।

हालांकि इनमें से कुछ दिव्य शक्तियों, नियमों, श्राप और वचन के कारण अमरत्व को प्राप्त हुए हैं। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति अपने जीवनकाल में इन चिरंजीवियों का स्मरण करता है, वह लंबी आयु और निरोगी काया को प्राप्त करता है।

हिंदू धर्म में इन व्यक्तियों को महामानव की संज्ञा दी गई है। ऐसे में हमारे आज के इस लेख में हम आपको इन्हीं चिरंजीवियों के बारे में बताने वाले हैं, साथ ही उन कारणों के बारे में भी बताने वाले हैं, जिन्होंने इन लोगों को सदा के लिए अमर बना दिया।

हनुमान जी (Hanuman ji): 

हनुमान जी / image source:- hindi.news18

सबसे पहले हम बात करेंगे राम भक्त हनुमान जी की। जिन्हें भी चिरकाल तक अमर रहने का वरदान मिला हुआ है। हनुमान जी को कलियुग का देवता कहा जाता है।

जिनकी माता का नाम अंजनी और पिता का नाम केसरी है। जिन्होंने त्रेतायुग में जन्म लिया था। हनुमान जी जीवनपर्यंत बाल ब्रह्मचारी रहे और उन्होंने सदा तन-मन-धन से भगवान श्री राम की आराधना की।  

यह बात तब की है जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया था। तब हनुमान जी भगवान श्री राम का संदेश लेकर लंका स्थित अशोक वाटिका में माता सीता के पास पहुंचे।

संदेश सुनने के बाद माता सीता ने हनुमान जी से खुश होकर उन्हें अजर अमर रहने का वरदान दिया था। साथ ही उन्होंने कहा था कि चिरकाल तक वह धरती पर जीवित रहेंगे और कलियुग के मनुष्यों पर अपना आशीर्वाद बनाए रखेंगे।

कृपाचार्य (Kripacharya):

कृपाचार्य

अब हम बात करेंगे महाभारत काल के कुलगुरु कृपाचार्य की। जिन्होंने महाभारत का युद्ध कौरवों की तरफ से लड़ा था। कृपाचार्य के पिता का नाम ऋषि गौतम है, लेकिन इनका और इनकी बहन कृपी का पालन पोषण राजा शांतनु ने किया था।

इन्होंने द्वापरयुग में जन्म लिया था। कृपाचार्य आगे चलकर कौरव और पांडव दोनों के ही कुलगुरू कहलाए। जिन्हें अमर रहने का वरदान इसलिए मिला, क्योंकि कृपाचार्य ने महाभारत का युद्ध बिना किसी छल कपट के लड़ा था।

साथ ही वह परम ज्ञानी हैं, जिन्हें अपनी तपस्या के बल पर अमरत्व का वरदान मिला है।

अश्वथामा (Ashwathama):

अश्वथामा

तीसरे स्थान पर अब हम आपको ऐसे चिरंजीवी के बारे में बताएंगे, जिन्हें चिरकाल तक अमर रहने का वरदान नहीं अपितु श्राप मिला था।

जी हां…हम बात कर रहे हैं गुरु द्रोण के पुत्र अश्वथामा की। जिन्हें स्वयं भगवान नारायण ने सदा जीवित रहने का श्राप दिया था। गुरु द्रोण और कृपाचार्य की बहन कृपि के बेटे अश्वथामा का जन्म द्वापर युग में हुआ था।

जिन्होंने महाभारत का युद्ध कौरवों की तरह से लड़ा था। वह दुर्योधन के परम मित्रों में से एक हैं। अश्वथामा मृत्यु के देवता यम और भगवान शिव के अंश हैं।

जिन्हें पांडवों की भांति ब्रह्मास्त्र चलाने की शिक्षा प्राप्त हुई थी। लेकिन उन्होंने महाभारत युद्ध के बाद अभिमन्यु के अजन्मे पुत्र को कोख में ही मार डालने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया था।

जिससे क्रोधित होकर भगवान श्री कृष्ण ने अश्वथामा को धरती पर ही भटकते रहने का श्राप दे दिया। कहते हैं कि अश्वथामा आज भी मध्य प्रदेश स्थित असीरगढ़ किले में भगवान शिव की पूजा करने प्रतिदिन आते हैं।

राजा महाबलि (Raja Mahabali):

राजा महाबलि

इसी कड़ी में हम बात करने वाले हैं, एक ऐसे असुर राजा की। जिसकी दानवीरता से प्रसन्न होकर खुद भगवान ने उसे अमर होने का वरदान दिया था।

हम बात कर रहे हैं राजा महाबलि की। जोकि विष्णु जी के परम भक्त प्रह्लाद का वंशज था। राजा महाबलि के पास ब्रह्मांड की संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा था,

जिसे उसने दान में देने के लिए एक बहुत बड़े समारोह का आयोजन किया। इस दौरान भगवान विष्णु ने अपना 5वां वामन अवतार लेकर राजा महाबलि की परीक्षा लेनी चाही।

तब उन्होंने राजा महाबलि से तीन पगों के बराबर भूमि देने को कहा। जिसके बाद जब राजा महाबलि ने ऋषि को भूमि देने के लिए हामी भर दी, तब ऋषि वामन ने अपने बृहद रूप में तीनों लोकों की भूमि को अपने पैर से नाप लिया।

जिस पर राजा महाबलि ने ऋषि वामन को खुशी-खुशी सारी संपत्ति दे दी। जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने राजा महाबलि को पाताल लोक का राजा बना दिया। साथ ही हमेशा के लिए अमर होने का वरदान दे दिया।

महर्षि वेदव्यास (Maharishi Vedvyas):

महर्षि वेदव्यास

महाभारत की रचना के लेखक महर्षि वेदव्यास जी भी चिरंजीवियों की श्रेणी में आते हैं। महर्षि वेदव्यास ऋषि पाराशर और माता सत्यवती के पुत्र थे।

जिन्हें महाभारत युद्ध का दिव्य दृष्टया भी माना जाता हैं। इन्होंने हिंदू धर्म के चारों वेदों और करीब 18 पुराणों के संपादन का कार्य किया है।

महर्षि वेदव्यास के इन्हीं कार्यों, सिद्धियों और पुरुषार्थ के चलते इन्हें अमर रहने का वरदान मिला था।

ऋषि मार्कण्डेय (Rishi Markandeya):

ऋषि मार्कण्डेय

भगवान शिव के परम भक्त ऋषि मार्कण्डेय को भी अमरत्व का वरदान मिला हुआ है। ऋषि मार्कण्डेय के पिता का नाम मर्कण्डु था।

इनके अमर होने की कहानी इनके बाल्यकाल से जुड़ी हुई है। ऋषि मार्कण्डेय जब केवल 16 वर्ष के थे, तब उन्हें पता चला था कि उनकी आयु काफी कम है।

लेकिन ऋषि मार्कण्डेय इस बात से तनिक भी विचलित नहीं हुए और पूर्ण निष्ठा के साथ उन्होंने भगवान शिव की भक्ति की।

ऐसे में जब यमराज ऋषि मार्कण्डेय के प्राण लेने धरती पर पहुंचे, तब भगवान शिव ने ऋषि मार्कण्डेय की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके प्राणों की रक्षा की। साथ ही उन्हें हमेशा अमर रहने का वरदान दे दिया।

राजा विभीषण (Raja Vibhishan):

राजा विभीषण

जैसा कि विदित है कि त्रेतायुग में भगवान विष्णु के अवतार श्री राम के हाथों रावण का वध हुआ था। लेकिन इसके विपरित भगवान श्री राम ने रावण के अनुज भाई विभीषण को अमर होने का वरदान दिया था।

इतना ही नहीं, रावण के मरने के बाद  विभीषण को राजपाठ भी मिल गया था। राजा विभीषण जोकि भगवान श्री राम के परम भक्त थे, उन्होंने रावण को भगवान राम से माफी मांगने को भी कहा था।

लेकिन रावण ने उनकी एक बात नहीं मानी, और उन्हें लंका से निकाल दिया। जिसके बाद विभीषण ने जीवनपर्यंत  भगवान श्री राम की भक्ति की और धर्म की स्थापना के लिए प्रयासरत रहे।

जिससे प्रसन्न होकर ही भगवान श्री राम ने विभीषण को चिरंजीवी होने का वरदान दिया था।

परशुरामजी (Parashurama ji):

परशुराम जी

चिरंजीवियों की श्रेणी में अंतिम नाम आता है परशुराम जी का। जोकि स्वयं भगवान विष्णु के 6वें अवतार थे। इनके पिता का नाम ऋषि जमदर्गि और माता का नाम रेणुका था।

परशुराम जी भगवान शिव के अनन्य भक्त थे।  परशुराम ने अपनी शक्ति के बल पर बड़े बड़े शूरवीरों को परास्त किया था। इस दौरान इन्होंने धरती पर बुराई का सर्वनाश करके धर्म की स्थापना की थी।

जीवन के उत्तरार्ध में परशुराम जी ने स्वयं को शिव भक्ति में लीन कर लिया था, जिससे प्रभावित होकर ही भगवान शिव ने इन्हें सदा अमर होने का वरदान दे दिया।

माना जाता है भगवान परशुराम अपना अगला जन्म कल्कि के गुरु के रूप में धरती पर लेंगे, जिसके बाद परशुराम जी को भी हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी। 


इस प्रकार, ये हैं वह 8 चिरंजीवी जो आज भी धरती पर जीवित हैं।

धार्मिक मान्यता है कि ये चिरंजीवी आज भी धरती पर अच्छाई की जीत और बुराई के सर्वनाश के लिए मौजूद हैं, जिनको दिव्य शक्तियों द्वारा धर्म और सदाचार की रक्षा के लिए सदा अमर रहने का वरदान मिला है।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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