चंडी प्रसाद भट्ट की जीवनी – Chandi Prasad Bhatt Biography

किसी ने सही कहा है…..

वह चंदन भी क्या चंदन है, जो अपना वन महका ना सका।
वह जीवन भी क्या जीवन है, जो काम देश के आ ना सका।

उपयुक्त पंक्तियां चंडी प्रसाद भट्ट के जीवन पर सटीक बैठती हैं। जिन्होंने जीवनपर्यंत देश में राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए कार्य किया। अपने सामाजिक कार्यों के चलते चंडी प्रसाद भट्ट को एशिया के नोबेल पुरस्कार रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है। इतना ही नहीं इन्होंने सदैव ही गांधीवाद सोच का समर्थन किया। साथ ही आज यह एक सामाजिक कार्यकर्ता, क्रन्तिकारी और पर्यावरण हितैषी के रूप में प्रसिद्ध है। तो चलिए जानते है सामाजिक कार्यकर्ता चंडी प्रसाद भट्ट के जीवन के बारे में।

चंडी प्रसाद भट्ट का जीवन परिचय

23 जून वर्ष 1934 को उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वर गांव में चंडी प्रसाद भट्ट का जन्म अत्यधिक गरीब परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम गंगाराम भट्ट और इनकी माता का नाम महेशी देवी थपलियाल था। चंडी प्रसाद भट्ट ने मैट्रिक तक की पढ़ाई अपने गांव से ही सम्पूर्ण की थी। उसके बाद परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों का बोझ चंडी प्रसाद भट्ट के कंधों पर आ गया। जिस कारण वह मैदानी क्षेत्र में आकर बस गए और उन्होंने ऋषिकेश में बस यूनियन के एक ऑफिस में क्लर्क की नौकरी कर ली।

साल 1956 में उनकी मुलाकात सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण से हुई। जिनसे मिलने के बाद चंडी प्रसाद भट्ट गांधीवादी विचारधारा की ओर आकर्षित हो गए। परिणामस्वरूप उन्होंने अपने गांव गोपेश्वर में साल 1964 को दशोली ग्राम स्वराज संघ की स्थापना की। इतना ही नहीं उन्होंने समाज में नशाबंदी और दलितों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ भी अपनी आवाज बुलंद की।इसके साथ ही वह समाज सुधार के अपने कार्यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक लेकर गए। इस दौरान उन्होंने रूस, जापान, जर्मनी, पाकिस्तान, बंगलादेश, फ्रांस, मैक्सिको इत्यादि देशों का भ्रमण किया।

चिपको आंदोलन

चंडी प्रसाद भट्ट की संस्था दशोली ग्राम स्वराज संघ ने गांधी जी के प्रसिद्ध आंदोलन चिपको आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साल 1973 में चंडी प्रसाद भट्ट ने वनों की रक्षा के लिए महिलाओं को हथियार बनाया और जिसका परिणाम यह रहा कि गांव की वन सम्पदा को बचाने के लिए गांव की स्त्रियां एक एक पेड़ को अपनी बाहों में भरकर खड़ी रहती थीं। जिससे ठेकेदारों को वन सम्पदा के बिना ही संतोष करना पड़ा। इस आंदोलन के पीछे चंडी प्रसाद भट्ट का उद्देश्य मात्र वन सम्पदा की रक्षा करना मात्र नहीं था बल्कि वह यह भली भातिं जानते थे कि बिना वृक्षों के वन पूर्णतया खाली और बर्बाद हो जाएंगे। साथ ही यह पर्यावरण के लिए भी खतरा साबित होंगे।

चंडी प्रसाद भट्ट के पुरस्कार

चंडी प्रसाद भट्ट ने जीवन भर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों का अनुसरण किया और उसी के आधार पर समाज के लिए खुद को समर्पित किया। उनके द्वारा संचालित चिपको आंदोलन ने समाज में पर्यावरण की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार चंडी प्रसाद भट्ट का पर्यावरण और समाज के शोषित वर्ग के प्रति व्यावहारिक और संवदेनशील नजरिया देखने को मिलता है। जिसके लिए भारत सरकार द्वारा साल 2005 में उन्हें पदम् भूषण से भी सम्मानित किया गया। तो वहीं साल 2013 में उन्हें गांधी शांति पुरस्कार मिला।

इसके अलावा साल 1982 में उन्हें रमन मैग्सेसे पुरस्कार, 1983 में अरकांसस ट्रैवलर्स सम्मान और इसी साल लिटिल रॉक मेयर के द्वारा नागरिक सम्मान,वर्ष 1986 में पदमश्री, 1987 में ग्लोबल 500सम्मान, 1997 में इंडियन फॉर कलेक्टिव एक्शन सम्मान, 2005 में पदम् भूषण, 2008 में डॉक्टर ऑफ़ साइंस, 2010 रीयल हीरोज लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड समेत कई सारे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार चंडी प्रसाद भट्ट ने प्राप्त किए हैं।

इसके अलावा साल 2019 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर चंडी प्रसाद भट्ट को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार दिया गया। तो वहीं चंडी प्रसाद भट्ट ने अपनी सांसारिक यात्राओं पर पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती नामक बेहतरीन यात्रा संग्रह की रचना की है। आज चंडी प्रसाद भट्ट की आयु 86 वर्ष है लेकिन राष्ट्र भक्ति का जज्बा उनमें आज भी बरकरार है।

चंडी प्रसाद भट्ट के सामाजिक कार्य

चंडी प्रसाद भट्ट उत्तराखंड के एक छोटे से गांव गोपेश्वर में जन्मे थे। जहां ना तो रोजगार था और ना ही खेती योग्य कृषि। गरीबी और भुखमरी के चलते गांव का हाल बेहाल था। ऐसे में पहाड़ी इलाकों में लोगों की कमाई का जरिया वन हुआ करते हैं क्योंकि गांव वालों को वनों से ईधन और पशुओं का चारा इत्यादि मिलता था। ऐसे में जब ठेकेदारों द्वारा जब वनों पर कब्जा करने की योजना बनाई जा रही थी। तब चंडी प्रसाद भट्ट के नेतृत्व में गांव की महिलाओं ने चिपको आंदोलन की शुरुआत की।

इसके बाद चंडी प्रसाद भट्ट ने गांव को वनों के माध्यम से औद्योगिकरण की ओर आगे ले जाने की सोची। इस दौरान गांव वालों द्वारा आयुर्वेदिक इलाज के लिए जड़ी बूटियों का इस्तेमाल किया जाने लगा और धीरे धीरे यही से उनके लिए रोजगार की राह आसान हो गई। इसके बाद चंडी प्रसाद भट्ट ने पहाड़ी इलाकों में वनों की उपयोगिता और उपलब्धता को लेकर जनहित में काफी कार्य किया।

उन्होंने समाज में जागरूकता की एक मशाल जलाई। जिसके अंतर्गत उन्होंने सबको यह बताया कि पहाड़ों पर सघन पेड़ों के माध्यम से पानी के तेज बहाव को रोका जा सकता है। जिससे गांव को बाढ़ और बादल फटने से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। इसके अलावा चंडी प्रसाद भट्ट ने पर्यावरण को बचाने के लिए छात्रों और स्थानीय लोगों के सहयोग से वृक्षारोपण का कार्यक्रम बड़े स्तर पर शुरू किया। साथ ही साथ पहाड़ी इलाकों में नर्सरी स्थापित की गई।

इतना ही नहीं पहाड़ी इलाकों में ढलान की ठोस व्यवस्था चंडी प्रसाद भट्ट ने की। साथ ही पथरीली चट्टानों को तलहटी तक रोकने के लिए दीवारों का निर्माण किया गया क्योंकि चंडी प्रसाद भट्ट गांव में भूस्खलन, बाढ़ और बादल के फटने से हुई जान माल की हानि से बेहद ही दुखी थे जिसके चलते उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों पर जीवन को बसाने के लिए हमेशा प्रयास किया।


इस प्रकार चंडी प्रसाद भट्ट का जीवन हम सभी के लिए एक सीख है। साथ ही सादा जीवन और उच्च विचार पर आधारित उनकी जीवन शैली आम जनता के लिए प्रेरणास्रोत है।

Chandi Prasad Bhatt Image Source – Facebook


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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