संपूर्ण महाभारत कथा | Mahabharat Story in Hindi

महाभारत को सनातन धर्म का पांचवा वेद माना गया है। जिसकी रचना का श्रेय ऋषि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी को दिया  जाता है। जिन्होंने 4वीं शताब्दी के दौरान इस महान ग्रंथ की रचना की थी। इसमें कुल 1,10,000 श्लोक है।

कहा जाता है कि महाभारत द्वापरयुग की रचना है, जिस युग में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया था। इसमें कुरु-पांडव वंश समेत ज्योतिषशास्त्र, खगोलशास्त्र, योगशास्त्र, धर्मशास्त्र और महाभारत युद्ध का विस्तार से वर्णन किया गया है।

इसलिए महाभारत को हिंदुओं के समस्त धार्मिक ग्रंथों में काफी पवित्र माना जाता है। प्राचीन काल में महाभारत जयसंहिता, भारत और जय महाकाव्य आदि नामों से प्रसिद्ध थी। तो चलिए आज हम महाभारत की कहानी को विस्तार से जानते हैं।

विषय सूची

महाभारत का पहला श्लोक

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वती चैव ततो जयमुदीरयेत्।।

अर्थात् नारायण स्वरूप भगवान श्री कृष्ण, उनके सखा अर्जुन, देवी सरस्वती और भगवान व्यास जी को नमन करके असुरों पर विजय प्राप्त करवाने वाली महाभारत की कथा का अध्ययन प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य करना चाहिए।


महाभारत ग्रंथ के पर्व या भाग

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में कुल अठारह पर्व हैं। यहां पर्व से तात्पर्य इसके जोड़ या भाग से है। जिनमें प्रत्येक में श्लोकों के माध्यम से महाभारत की कथा का सम्पूर्ण सार बताया गया है।

और यह पर्व आदि पर्व, सभापर्व, वन पर्व, विराट पर्व, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशासन पर्व, आश्वमेधिक पर्व, मौसल पर्व, महाप्रास्थानिक पर्व, स्वर्गारोहण पर्व आदि नामों से प्रसिद्ध हैं। जिनको हम आगे एक-एक करके विस्तार से जानेंगे।

आदि पर्व 

उपरोक्त पर्व में कुल 11 उपपर्व, 1626 श्लोक और 233 अध्याय मौजूद हैं। जिसमें दुष्यंत शकुंतला की कहानी, भरत की कहानी, शांतनु और माता गंगा, भीष्म जन्म, कौरवों व पांडवों का जन्म, लाक्षागृह कांड, हिडिम्बा और भीम का विवाह, द्रौपदी का जन्म, सुभद्रा और अर्जुन विवाह, इंद्रप्रस्थ की स्थापना आदि की कथा बताई गई है।

सभा पर्व

इसमें कुल 10 उपपर्व, 4056 श्लोक और 81 अध्याय हैं। यहां युधिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ, जरासंध का वध, शिशुपाल का वध, शकुनि द्वारा द्रुत क्रीड़ा का आयोजन, पांडवों के वनवास की कथा बताई गई है।

वन पर्व

यहां 22 उपपर्व, 11664 श्लोक और 315 अध्याय हैं। जिसमें अर्जुन का ब्रह्म शस्त्रों की प्राप्ति, अर्जुन की इंद्रलोक यात्रा, जटासुर वध, द्रौपदी का सत्यभामा से संवाद, कौरवों और गंधर्वों का युद्ध, जयद्रथ द्वारा द्रौपदी का हरण, कुंती को ऋषि दुर्वासा से आशीर्वाद की प्राप्ति, इंद्र द्वारा कर्ण के कुंडल कवच ले लेना, यक्ष के प्रश्नों का उत्तर युधिष्ठिर द्वारा दिया जाना, अज्ञातवास आदि कहानियों का जिक्र किया गया है।

विराट पर्व

उपरोक्त पर्व में 5 उपपर्व, 2050 श्लोक और 72 अध्याय हैं। जिसमें पांडवों का अज्ञातवास, विराट नगरी, कीचक वध, मत्स्य देश पर आक्रमण, अर्जुन का विराट युद्ध, अभिमन्यु और उत्तरा का विवाह आदि की कथा सुनाई गई है।

उद्योग पर्व

इसमें 10 उपपर्व, 6698 श्लोक और 196 अध्याय हैं। जिसमें महाभारत युद्ध की तैयारियां, संजय का संदेश, महाराज धृतराष्ट्र और विदुर का संवाद, महाराज धृतराष्ट्र द्वारा दुर्योधन से संधि की बात कहना, भगवान श्री कृष्ण का शांति सन्देश, भगवान श्री कृष्ण द्वारा कौरवों को दंड देने की बात, दोनों पक्षों की सेना का वर्णन, भीष्म और परशुराम का युद्ध आदि के बारे में लिखा है।

भीष्म पर्व

इसमें 4 उपपर्व, 5884 श्लोक और 122 अध्याय हैं। जिसमें महाभारत युद्ध संबंधी नियम, दोनों पक्षों की सेना का आमना सामना, श्रीमद् भागवत गीता का व्याख्यान, भीष्म का बाणों की शैय्या पर लेटना आदि वर्णित है।

द्रोण पर्व

इस पर्व के अंतर्गत 8 उपपर्व, 8909 श्लोक और 202 अध्याय आते हैं। जिसमें भीष्म वध, कर्ण का प्रधान सेनापति बनना, द्रोणाचार्य के चक्रव्यूह का निर्माण, अभिमन्यु की मृत्यु, अर्जुन द्वारा जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा लेना, अर्जुन का कौरव सेना से भयंकर युद्ध, कर्ण द्वारा घटोत्कच का वध और धृष्टद्युम द्वारा गुरु द्रोणाचार्य का वध की कहानी को बताया गया है।

कर्ण पर्व

यहां श्लोकों की संख्या 4964 और अध्याय 79 हैं। इसमें कर्ण को कौरव सेना का सेनापति बनाना, महाराज शल्य का कर्ण का सारथी बनना, कर्ण और अर्जुन का युद्ध, कर्ण वध और दुर्योधन का मित्र शोक बताया गया है।

शल्य पर्व

इसमें 2 उपपर्व, 3220 श्लोक और 59 अध्याय हैं। जिसमें कर्ण की मृत्यु के बाद कृपाचार्य द्वारा दुर्योधन को संधि के लिए समझाना, सहदेव द्वारा शकुनि का वध, भीम और दुर्योधन का द्वंद युद्ध, अश्वस्थामा के बारे में बताया गया है।

सौप्तिक पर्व

इसमें एक उपपर्व मौजूद हैं। साथ ही 18 अध्याय और 870 श्लोक हैं। जिसमें कृत वर्मा, कृपाचार्य और अश्वस्थमा द्वारा आगे की युद्ध रणनीति बनाना, अश्वस्थमा द्वारा पांचाली द्रौपदी के पुत्रों का वध, भीम द्वारा अश्वस्थमा को मारने की योजना बनाना और अश्वस्थामा के वन गमन की कहानी बताई गई है।

स्त्री पर्व

इसमें 3 उपपर्व, 775 श्लोक और 27 अध्याय हैं। यहां दुर्योधन की मृत्यु पर महाराज धृतराष्ट्र का शोक, रानी गांधारी का भगवान श्री कृष्ण को श्राप देना, पांडवों का कुंती से मिलन, युधिष्ठिर द्वारा मृत योद्धाओं का अंतिम संस्कार आदि का जिक्र किया गया है।

शांति पर्व

इसमें कुल 365 अध्याय और 3 उप पर्व हैं। यहां पांडवों द्वारा शोकाकुल हो जाना, युधिष्ठिर द्वारा हस्तिनापुर नगरी में प्रवेश, राज्याभिषेक, मंकगीता, पराशर गीता और हंस गीता का भी जिक्र किया गया है।

अनुशासन पर्व

इसके अंतर्गत उपपर्व 2 और श्लोक 8000 है। इसमें भीष्म युधिष्ठिर के बीच धर्म संवाद, भीष्म का प्राण त्याग, माता गंगा का पुत्र शोक और समस्त पांडवों का हस्तिनापुर लौट जाने का जिक्र किया गया है।

आश्वमेधिक पर्व

इसके अंतर्गत दो उपपर्व और 3320 श्लोक आते हैं। इसमें अश्वमेध यज्ञ, ब्राह्मण गीता का उपदेश और भगवान श्री कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को वैष्णव धर्म विषयक ज्ञान का वर्णन किया गया है।

मौसल पर्व

यहां अध्यायों की संख्या 8 है और इसमें 320 श्लोक मौजूद हैं। इसमें मुख्य रूप से यदुकुल वंश के सर्वनाश की कहानी और भगवान श्री कृष्ण व बलराम के परधाम जाने का वर्णन किया गया है।

महाप्रास्थानिक पर्व

इसमें 123 श्लोक और 123 अध्याय हैं। उपरोक्त पर्व में पांडवों और द्रौपदी का स्वर्गलोक को प्रस्थान बताया गया है। जहां यह भी बताया गया कि कैसे समस्त पांडवों और द्रौपदी में केवल युधिष्ठिर को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

स्वर्गारोहण पर्व

इसमें कुल 207 श्लोक और 5 अध्याय हैं। जिसमें स्वर्ग में नारद देवता और युधिष्ठिर के मध्य संवाद, नरक का दृश्य, युधिष्ठिर का श्री कृष्ण और अर्जुन से मिलन और अंत में महाभारत का उपसंहार बताया गया है।



महाभारत काल का समय

महाभारत काल की व्युत्पत्ति के समय को लेकर काफी मतभेद हैं। धार्मिक स्त्रोतों और प्रमाणों के आधार पर लौह युग को महाभारत की उत्पत्ति का काल माना जाता है। कुरु वंश की उत्पत्ति का समय 1200 ईसा पूर्व से लेकर 800 ईसा पूर्व माना गया है। महाभारत काल के अंतिम योद्धा और अर्जुन के प्रपौत्र परीक्षित का शासनकाल 382 ईसा पूर्व कहा जाता है।


महाभारत का नाम कैसे पड़ा?

आरंभ में महर्षि वेदव्यास ने करीब 1 लाख श्लोकों के साथ “भारत” ग्रंथ को रचित किया था। इसके बाद मात्र भारतवंशी राजाओं का परिचय देते हुए महर्षि वेदव्यास ने इसमें 24,000 अन्य श्लोक जोड़े। ऐसे में महाभारत को पहले भारत ग्रंथ नाम से जाना जाता था।

कुछ समय बाद इसे “जय भारत” कहा जाने लगा। तत्पश्चात् एक बार जब समस्त देवतागणों ने तराजू के एक छोर पर हिंदू धर्म में प्रचलित चारों वेदों को रखा। दूसरी तरफ महाभारत ग्रंथ को रखा, तब महाभारत ग्रंथ सभी वेदों की तुलना में अधिक वजनदार सिद्ध हुआ। कहते हैं कि तभी से इसका नाम जय भारत से बदलकर महाकाव्य महाभारत पड़ गया।


महाभारत का लेखन कार्य

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना संस्कृत भाषा में की है। साथ ही इसे महर्षि वेदव्यास ने विघ्नहर्ता भगवान गणेश की सहायता से लिखा था। कहते हैं कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की कथा भगवान गणेश के साथ हिमालय की तलहटी में मौजूद एक गुफा में बैठकर लिखी थी।

जहां भगवान गणेश ने महर्षि वेदव्यास के सामने एक शर्त रखी थी कि महाभारत की कथा लिखते समय महर्षि वेदव्यास जी कथा सुनाते हुए बीच में रुकेंगे नहीं। इसी शर्त पर भगवान गणेश महाभारत की कथा लिखने के लिए तैयार हुए।

ऐसे में महर्षि वेदव्यास ने भी भगवान गणेश से कहा कि ठीक है! लेकिन मेरी भी एक शर्त है कि आप महाभारत की कथा लिखते समय जो भी श्लोक लिखेंगे, उसका पहले अर्थ जानेंगे। ऐसे में जब तक भगवान गणेश व्यास जी के श्लोक समझकर लिखते, तब तक व्यास जी अन्य श्लोक को रचित कर देते थे।

इस प्रकार महाभारत के प्रथम दृष्टा वेदव्यास जी और भगवान गणेश के तीन साल तक परस्पर सहयोग से हिंदुओं के महाकाव्य महाभारत का लेखन कार्य संपन्न हुआ। जिसका सबसे पहले अध्ययन महर्षि वेदव्यास के पुत्र शुकदेव ने किया था और महाभारत का सर्वप्रथम वाचन व्यास जी के शिष्य वैशंपायन ने किया था।

महाभारत ग्रंथ का वाचन जिस राजा जनमेजय की सभा में हुआ था, वह पांडव अर्जुन के प्रपौत्र और राजा परीक्षित के ही बेटे थे। इस प्रकार, महाकाव्य महाभारत के रचना और लेखन काल के पश्चात् अब हम इसकी कथा का सम्पूर्ण अध्ययन करेंगे। क्योंकि कहा गया है कि…..

महाभारत में जो व्याप्त है, वह आपको संसार में कहीं और देखने को नहीं मिलेगा। इसलिए महाभारत की कथा को प्रत्येक व्यक्ति को जानना चाहिए।


महाभारत की कहानी

महाभारत के विभिन्न पर्वों के बारे में जानने के बाद अब आपको महाभारत के सम्पूर्ण कथा से अवगत कराते हैं।

कुरुवंश का सामान्य परिचय

महाभारत काल में जन्मे समस्त वीर पुरुषों के पूर्वज मुख्य रूप से कुरूवंश से संबंधित थे। जिनमें ब्रह्मा से अत्रि, अत्रि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा, पुरुरवा से आयु, आयु से नहुष, नहुष से ययाति, ययाति से पुरु हुए। पुरु के वंशज में राजा भरत हुए। इनके माता-पिता का नाम दुष्यंत और शकुंतला था। भरत के समय में ही कुरु राजा ने जन्म लिया था।

महाभारत कहानी की शुरुआत महाराज शांतनु के राज्यकाल से होती है। जोकि राजा कुरु के वंश में ही जन्मे थे। महाराज शांतनु का विवाह गंगा माता से हुआ था। जिन्होंने विवाह से पहले महाराज शांतनु के समक्ष यह शर्त रखी थी कि वह उनसे तभी विवाह करेंगी। जब वह उन्हें ये वचन देंगे कि महाराज शांतनु उन्हें कभी किसी कार्य को करने के लिए माना नही करेंगे। गंगा माता की यह शर्त मानने के बाद महाराज शांतनु से उनका विवाह हो गया। महाराज शांतनु और माता गंगा के आठ बालक हुए थे।

कहते है माता गंगा प्रत्येक बच्चे के जन्म के बाद उसे नदी में बहा देती थी। जिसके पीछे की वजह बच्चों का पिछले जन्म में श्रापित होना था। लेकिन जब माता गंगा अपने 8वें पुत्र को नदी में बहाने के लिए ले जा रही थी। तभी महाराज शांतनु ने उन्हें टोक दिया और माता गंगा का वहीं पुत्र आगे चलकर भीष्म (देवव्रत) के नाम से जाना गया। भीष्म को कौरव और पांडव पितामह कहकर संबोधित करते थे।

महाराज शांतनु के टोकने के बाद गंगा माता ने उन्हें बताया कि हमारे आठों पुत्र पिछले जन्म में वसु देवता के अवतार थे। जिन्हें गुरु वशिष्ठ ने उनकी गाय का हरण करने के लिए श्राप दिया था। ऐसे में अपने सभी बालकों को श्राप से मुक्त करने के लिए मैंने उन्हें नदी में बहा दिया था, लेकिन अंत मैं आपने मेरा वचन तोड़ दिया।

इसलिए अब मैं अपने पुत्र भीष्म (देवव्रत) को अपने साथ हमेशा के लिए ले जा रही हूं और इतना कहते ही गंगा माता वहां से चली गई। जिसके बाद महाराज शांतनु हर रोज गंगा माता से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगने नदी किनारे जाया करते थे।

फिर एक दिन माता गंगा भीष्म (देवव्रत) को हमेशा के लिए महाराज शांतनु के पास छोड़कर चली जाती हैं। महाराज शांतनु अकेले ही भीष्म (देवव्रत) की परवरिश करते हैं और उन्हें एक महान योद्धा बनाते हैं।

एक बार की बात है जब महाराज शांतनु जंगल में शिकार करने गए थे। तब वहां उनकी मुलाकात सत्यवती (मत्स्यगंधा) से होती है। जिनसे उन्हें प्रेम हो जाता है। महाराज शांतनु सत्यवती के पिता से उनका हाथ मांगने जाते हैं तो सत्यवती महाराज के आगे एक शर्त रख देती हैं, कि वह उनसे तभी विवाह करेंगी।

जब वह भीष्म (देवव्रत) के स्थान पर उनके गर्भ से जन्मे बालक को हस्तिनापुर राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करेंगे। लेकिन महाराज शांतनु को यह बिल्कुल मंजूर नहीं था और वह सत्यवती की शर्त को न मंजूर कर वापस राजमहल लौट आते हैं।

फिर जब भीष्म (देवव्रत) को इस बारे में पता चलता है तब वह अपने पिता के प्रेम की खातिर माता सत्यवती को आजीवन अविवाहित रहने का वचन देते हैं। और उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि वह कभी हस्तिनापुर की राजगद्दी पर नही बैठेंगे।

बल्कि वह अपने प्राण तब तक नहीं त्यागेंगे जब तक हस्तिनापुर पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हो जाता है। इसके बाद वह अपने पिता महाराज शांतनु और सत्यवती का विवाह करा देते हैं। अपने पुत्र के इस बलिदान के बदले में महाराज शांतनु भीष्म (देवव्रत) को इच्छा मृत्यु का वरदान दे देते हैं।


महाराज पाण्डु, धृतराष्ट्र और दासी पुत्र विदुर की उत्पत्ति

महाराज शांतनु की मृत्यु के बाद उनके और रानी सत्यवती के दोनों पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य  हस्तिनापुर का सिंहासन संभालते हैं। लेकिन गंधर्व राजा से युद्ध में हारकर चित्रांगद वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। जिसके बाद विचित्रवीर्य को हस्तिनापुर का सिंहासन मिल जाता है। इनका विवाह काशीराज की पुत्रियों अंबिका और अंबालिका से हुआ था।

जिनको (अंबा, अंबिका और अंबालिका) भीष्म हरण करके ले आते हैं। लेकिन कुछ समय बाद क्षय रोग के चलते विचित्रवीर्य की भी मृत्यु हो जाती है। ऐसे में हस्तिनापुर के राजा का पद कुछ समय के लिए रिक्त हो जाता है। तब रानी सत्यवती महर्षि वेदव्यास को महल में बुलाती हैं।

क्योंकि हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर भीष्म के अतिरिक्त वही बैठ सकता था, जोकि कुरु वंश से संबधित हो। आपको बता दें कि महर्षि वेदव्यास रानी सत्यवती और ऋषि पराशर के पुत्र थे। अपनी माता के कहने पर महर्षि वेदव्यास ने राजकुमार विचित्रवीर्य की पत्नियों अंबिका और अंबालिका को अपनी दिव्य दृष्टि से पुत्र रत्न की प्राप्ति कराई।

इस दौरान महर्षि वेदव्यास के दिव्य रूप को देखकर रानी अंबिका भय से कांप जाती है, तो वहीं अंबालिका अपने नेत्र बंद कर लेती है। ऐसे में रानी अंबिका के गर्भ से महाराज पाण्डु जन्म लेते हैं। जोकि एक वीर और श्रेष्ठ धनुर्धारी थे लेकिन उनकी अल्प आयु थी। क्योंकि उनके जन्म के दौरान उनकी माता भययुक्त हो गई थी।

दूसरी ओर, अंबालिका ने नेत्रहीन पुत्र महाराज धृतराष्ट्र को जन्म दिया था। क्योंकि पुत्र को जन्म देने के दौरान उन्होंने अपने नेत्र बंद कर लिए थे। इसी दौरान रानी अंबिका और अंबालिका ने महर्षि वेदव्यास से भयभीत होकर एक दासी को उनके पास भेज दिया था।

जिसने विदुर जैसे ज्ञानी पुत्र को जन्म दिया। आगे चलकर हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर बैठने के लिए महाराज पाण्डु के नाम की स्वीकृति दी गई। महाराज पाण्डु ने हस्तिनापुर की सीमाओं को चहुं ओर से सुरक्षित कर लिया था। ऐसा कोई युद्ध नहीं था जिसे महाराज पाण्डु ने जीता ना हो।

महाराज पाण्डु के शौर्य की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी थीं। तब महाराज पाण्डु के लिए राजा सूरशेन की पुत्री कुंती (पृथा) के विवाह का प्रस्ताव आया। उधर, भीष्म (देवव्रत) ने महाराज धृतराष्ट्र के लिए गांधार नरेश की पुत्री गांधारी का हाथ मांगा था।

गांधार राजकुमार शकुनि को अपनी बहन के लिए एक अंधे राजा का रिश्ता मंजूर ना था, लेकिन गांधारी ने भीष्म (देवव्रत) का मान रखते हुए विवाह के लिए स्वीकृति दे दी थी। साथ ही महाराज धृतराष्ट्र की नेत्रहीनता के चलते उन्होंने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। तो वहीं दासी पुत्र विदुर का विवाह शुलभा नामक स्त्री से हुआ था।

इसके अलावा, एक बार जब महाराज पाण्डु का युद्ध मद्र देश के राजा शल्य से हो रहा था। तब युद्ध के बाद महाराज पाण्डु की मुलाकात मद्र देश की राजकुमारी माद्री से हुई। जिनसे महाराज पाण्डु ने दूसरा विवाह कर लिया। इसके बाद सम्पूर्ण जगत में अपनी विजय का ध्वज फहराने के बाद महाराज पाण्डु अपनी दोनों पत्नियां के साथ कुछ समय बिताने के लिए राजमहल से बाहर चले गए।

एक बार जब वह जंगल में आखेट के लिए गए हुए थे। तब माद्री की नजर एक मृग पर पड़ी। जिसको देखकर महाराज पाण्डु ने रानी माद्री के कहने पर उसपर तीर चला दिया। फिर जब पास जाकर देखा तो वहां ऋषि किंदम अपनी पत्नी के साथ घायल अवस्था में पड़े हुए थे। जिन्हें देखकर महाराज पाण्डु काफी चिंतित हो गए। इसी दौरान ऋषि किंदम ने महाराज पाण्डु को यह श्राप दे दिया कि जब भी वह अपनी किसी पत्नी के अत्यधिक निकट जाने की कोशिश करेंगे तभी उनकी मृत्यु हो जाएगी।


पांडव और कौरवों का जन्म

महाराज पाण्डु ऋषि किंदम के श्राप के कारण कभी अपनी पत्नियों के अत्यधिक निकट नहीं गए। ऐसे में जब संतान उत्पत्ति की बात आई। तब कुंती ने महाराज पाण्डु से कहा कि ऋषि दुर्वासा की सेवा करने पर उन्होंने मुझे देव पुत्रों के जन्म का आशीर्वाद दिया था। यानि मैं जिस भी देवता का स्मरण करूंगी।

मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। कहते है इसी प्रकार जब रानी कुंती ने यम देवता का स्मरण किया तब युधिष्ठिर ने जन्म लिया, पवन देव के आशीर्वाद से भीम ने जन्म लिया, इंद्र देवता के आशीर्वाद से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। उधर, रानी माद्री ने भी रानी कुंती से उनके लिए पुत्र उत्पन्न करने को कहा।

जिस पर रानी कुंती ने अश्विन देवता को याद करके नकुल और सहदेव को जन्म दिया। रानी कुंती और माद्री ने पांचों पाण्डु पुत्रों की देखभाल की।

एक बार जब महाराज पाण्डु ध्यान में लीन थे। तब रानी माद्री नदी से स्नान करके लौट रही थी। जिन्हें देखकर महाराज पाण्डु स्वयं को रोक नही सके। और वह रानी माद्री के पास जाकर उनके गले लग गए। लेकिन ऋषि किंदम के श्राप के चलते तुरंत उनकी मृत्यु हो गई।

इसी दौरान स्वयं को दोषी मानते हुए रानी माद्री ने भी आत्मदाह कर लिया। जिसके बाद पांचों पांडवों की परवरिश की जिम्मेदारी रानी कुंती पर आ गई। उधर, जब हस्तिनापुर राज्य को महाराज पाण्डु की मृत्यु का समाचार मिला, तब भीष्म (देवव्रत) ने कुंती और पांचों पांडवों को राजमहल वापिस बुला लिया। महाराज पाण्डु की मृत्यु के बाद महाराज धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का कार्यभार सौंपा गया।

आपको बता दें कि जब पांडवों का जन्म हुआ था, उसी वक्त महल में महाराज धृतराष्ट्र और रानी गांधारी ने 100 पुत्रों और 1 कन्या को जन्म दिया था। रानी गांधारी के 100 पुत्रों का जन्म कुछ इस प्रकार से हुआ था। कहा जाता है कि जब रानी गांधारी गर्भवती थी, तब उन्हें महर्षि वेदव्यास का आशीर्वाद मिला था। जिसके चलते वह लगभग 2 सालों तक गर्भवती रही।

ऐसे में उनका गर्भ जब लोहे की तरह कठोर हो गया। तब उन्होंने भय के कारण अपना गर्भ गिरा दिया। और जब महर्षि वेदव्यास को यह बात पता चली तो वह काफी क्रोधित हुए। और उन्होंने रानी गांधारी को यह आदेश किया कि वह तुरंत सौ कुंडों की स्थापना कराएं। और जल्द से जल्द उन कुंडों में गर्भ से निकले मांस के टुकड़ों को डाल दें।

महर्षि वेदव्यास के कहेनुसार रानी गांधारी ने ठीक वैसा ही किया। जिससे रानी गांधारी को दुर्योधन, दुशासन समेत 100 पुत्रों और 1 पुत्री दुशाला की प्राप्ति हुई। इसके अलावा महाराज धृतराष्ट्र के एक दासी के साथ अनैतिक संबंधों के चलते एक बालक ने जन्म लिया। जिसका नाम युयुत्सु था। जिसने महाभारत का युद्ध पांडवों की ओर से लड़ा था।


कौरवों और पांडवों की शिक्षा

उधर, राजमहल पहुंचते ही भीष्म (देवव्रत) ने कुलगुरु कृपाचार्य को पांडवों और कौरवों का गुरु नियुक्त कर दिया। कृपाचार्य और उनकी बहन कृपि महाराज शांतनु को आखेट के दौरान जंगल में लावारिस मिले थे, जिनको वह अपने संग राजमहल ले आए थे।

और वह अपने आश्रम में पांडवों और कौरवों को शिक्षा दीक्षा दिया करते थे। अब कुलगुरू कृपाचार्य राजमहल के भी मुख्य व्यक्ति थे, इसके चलते उनका अधिकतर समय राजमहल के कार्यों में व्यस्त रहा करता था। ऐसे में भीष्म (देवव्रत) ने गुरु द्रोणाचार्य को पांडवों और कौरवों का गुरु नियुक्त किया। गुरु द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन से हुआ था। वह गुरु परशुराम के शिष्य और एक महान धनुर्धारी थे।

जहां एक ओर पांडवों और कौरवों की शिक्षा चल रही थी, तो वही महल में चिंता का विषय यह बना हुआ था कि हस्तिनापुर का युवराज कौन होगा? सही मायनों में तो यह पद महाराज पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर को मिलना चाहिए था।

लेकिन महाराज धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन को बचपन से यही बताया गया था कि वह हस्तिनापुर का युवराज होगा। ऐसे में यह निश्चित किया गया कि जो राजकुमार आगे चलकर स्वयं को सिद्ध करेगा, वही हस्तिनापुर की राजगद्दी को संभालेगा। इस बात ने कौरवों और पांडवों के मध्य सदा ही खींचतान पैदा कर दी और उनके मध्य प्रारंभ से ही दूरियां बढ़ने लगी।

जहां कौरव सदैव ही पांडवों को नीचा और लज्जित करने का अवसर ढूंढा करते थे, तो वही पांडव अपने ज्येष्ठ भाई युधिष्ठिर की बात मानकर सदैव शांत हो जाया करते थे। इस प्रकार, कौरवों और पांडवों के बाल्यकाल के कई ऐसे प्रसिद्ध किस्से हैं, जिनमें उनके मध्य द्वंद की स्थिति देखी गई। जिनमें भीम और दुर्योधन का नागलोक वाला किस्सा मशहूर है।


पांडव अर्जुन का गुरु द्रोणाचार्य के प्रति समर्पण भाव

गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में जहां कौरव और पांडव शिक्षा लिया करते थे। वहां पांडव अर्जुन गुरु द्रोणाचार्य के काफी पसंदीदा शिष्य थे। जिसके पीछे अर्जुन का गुरु के प्रति प्रेम, निष्ठा, कर्तव्य और विश्वास का होना था। गुरु द्रोणाचार्य आश्रम में उपस्थित सभी बालकों के ज्ञान की परख करने के लिए सदैव उनकी परीक्षा लिया करते थे। जिसमें अर्जुन और गुरु द्रोणाचार्य का चिड़िया की आंख और मगरमच्छ का माया रूप वाला किस्सा बहुत प्रसिद्ध है।

साथ ही गुरु द्रोणाचार्य ने सभी बालकों से गुरु दक्षिणा के रूप में राजा द्रुपद की पराजय मांगी थी। बता दें कि राजा द्रुपद पांचाल नरेश थे। साथ ही वह गुरु द्रोणाचार्य के मित्र भी थे, लेकिन उन्होंने गुरु द्रोणाचार्य की गरीबी का उपहास उड़ाया था। जिसका बदला लेने के लिए गुरु द्रोणाचार्य ने उनकी पराजय की बात कही कही थी।

आगे चलकर अर्जुन ने ही राजा द्रुपद को युद्ध में पराजित किया था। ऐसे में गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन से सदैव ही बहुत प्रसन्न रहते थे और हर किसी को यह बताते थे कि अर्जुन उनका परम शिष्य है। अर्जुन की खातिर गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य और कर्ण जैसे महान योद्धाओं की प्रतिभा को भी नजरंदाज कर दिया था। क्योंकि उनका कहना था कि वह अर्जुन को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाना चाहते हैं।

इसलिए जब एकलव्य नाम का एक बालक गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा लेने आया तो उन्होंने उसे शिक्षा देने से मना कर दिया। बदले में उसकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से उसका अंगूठा मांग लिया, ताकि वह कभी अर्जुन से बेहतर धनुर्धर न बन सके।

उधर, कर्ण जोकि एक सूत (रथ चालक) का बेटा था, उन्होंने उसे यह कहकर शिक्षा देने से मना कर दिया कि वह केवल कुरु वंश के राजकुमारों के गुरु है। आपको बता दें कि कर्ण का असली नाम राधे था। जोकि रानी कुंती की ही संतान थे। यह कहानी तब की है जब रानी कुंती अविवाहित थीं।

उनके महल में एक बार ऋषि दुर्वासा पधारे थे, जिनकी कुंती ने श्रद्धा और निष्ठा भाव से सेवा की थी। जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने उन्हें देव पुत्रों की प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था। जिसको अजमाने के लिए अविवाहित कुंती ने सूर्य देव का आह्वान करके कर्ण को जन्म दिया था, लेकिन लोक लाज के भय से वह उन्हें नदी किनारे छोड़ आई थी।

जहां महाराज धृतराष्ट्र के सारथी अधीरथ और उनकी पत्नी राधा  ने कर्ण का पालन पोषण किया। आगे चलकर गुरु द्रोणाचार्य ने ही राधे को कर्ण कहकर संबोधित किया था। कर्ण दुर्योधन का परम मित्र था। साथ ही दुर्योधन ने कर्ण को कभी भी यह एहसास नहीं होने दिया कि वह एक सूत का पुत्र है। जिसके चलते कर्ण अपने जीवन में दुर्योधन को बहुत मानता था और उसके लिए कुछ भी करने के लिए सदैव आतुर रहता था।


हस्तिनापुर के युवराज की घोषणा

आगे जब कौरव और पांडव बड़े हुए। तब युधिष्ठिर और दुर्योधन के मध्य हस्तिनापुर की गद्दी को लेकर विवाद उपज गया। तब कुलगुरु कृपाचार्य ने उनके मध्य एक प्रतियोगिता रखी कि जो भी उनके प्रश्नों का बेहतर ढंग से जवाब देगा वह हस्तिनापुर का युवराज कहलाएगा।

सही मायनों में तो पांडव युधिष्ठिर ने सारे प्रश्नों का अच्छे तरीके से जवाब दिया था। उधर, राजमहल में युधिष्ठिर के कार्यों की प्रशंसा होने लगी और उनका यश चारों ओर फैलने लगा था। जिसके बाद पांडव युधिष्ठिर को युवराज बनाने की घोषणा कर दी गई।

लेकिन हस्तिनापुर के इस फैसले से राजमहल में दुर्योधन, गांधार नरेश शकुनि काफी आहत हुए। ऐसे में एक सोची समझी साजिश के तहत युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और माता कुंती को कुछ समय के लिए महाराज धृतराष्ट्र के आदेश पर वारणावत (लाक्षागृह) भेज दिया गया।

जहां दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि के साथ मिलकर एक षड्यंत्र के तहत पांडवों को मार डालने की योजना बनाई। जिसकी जानकारी राजमहल में विदुर को हो गई थी, जोकि उस समय हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। इसलिए उन्होंने पांडवों और माता कुंती के लाक्षागृह पहुंचने से पहले ही उनकी सुरक्षा के जबरदस्त इंतजाम कर दिए थे।


लाक्षागृह कांड

जब पांडव अपनी माता कुंती के साथ वारणावत पहुंचते हैं। तब वह दुर्योधन द्वारा बनाए गए मायावी लाक्षागृह में ठहरते हैं, जहां प्रधानमंत्री विदुर युधिष्ठिर और अर्जुन को संकेतों के माध्यम से होने वाले खतरे की बात समझा देते हैं। जिसके चलते पांडव लाक्षागृह से एक सुरंग के द्वारा सुरक्षित बाहर निकल आते हैं। 

आपको बता दें कि दुर्योधन ने मामा शकुनि के कहने पर पांडवों को मंत्री पुरोचन की सहायता से जलाकर मार डालने की योजना बनाई थी। लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब ना हो सका। उधर, हस्तिनापुर में यह खबर आग की तरह फ़ैल गई कि पांडव नहीं रहे और दुर्योधन ने उनकी अंत्योष्टि तक करा दी।


भीम और हिडिंबा का मिलन

लाक्षागृह की घटना के बाद पांडवों ने वापिस राजमहल लौटने से इंकार कर दिया। जिसके बाद वह एक गरीब ब्राह्मण का वेश धारण करके एकचक्रा नगरी में जाते हैं। जहां वह सब लोग किसी को यह नही बताते हैं कि वह पांडव है।

इस दौरान भीम बकासुर जैसे अनेक राक्षसों का वध करके गांव वालों की रक्षा करता है। साथ ही जंगल में भटकने के दौरान भीम हिडिंब नाम के एक राक्षस से भी अपनी माता और भाइयों को बचाता है, लेकिन हिडिंब की बहन हिडिंबा को भीम से प्रेम हो जाता है और माता कुंती के आशीर्वाद से भीम का विवाह एक राक्षसी कन्या हिडिंबा से हो जाता है।

हालांकि पहले इस विवाह को किसी की अनुमति नहीं मिलती है, लेकिन जब हिडिंबा यह कहती है कि जब वह गर्भवती हो जाएगी। तब वह भीम को वापस आपके साथ भेज देगी। जिसपर सभी लोग भीम और हिडिंबा के विवाह के लिए हामी भर देते हैं। आगे चलकर हिडिंबा के गर्भ से घटोत्कच का जन्म हुआ और घटोत्कच का बेटा बर्बरीक के नाम से जाना गया। यह दोनों भी महाभारत के मुख्य पात्रों में से एक हैं।


द्रौपदी का स्वयंवर

यह कहानी तब की है जब पांचाल नरेश राजा द्रुपद गुरु द्रोणाचार्य से पराजित होने के बाद उनको परास्त करने के उद्देश्य से अग्नि देव के आशीर्वाद से द्रौपदी और धृष्टद्युम को उत्पन्न करते हैं। और फिर वह द्रौपदी के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन करते हैं। जहां यह शर्त रखी जाती है कि जो भी राजकुमार या युवराज धनुष भेदन करेगा, द्रौपदी उसी क्षत्रिय के गले में वरमाला डालेगी।

उधर, एकचक्रा नगरी में भ्रमण के दौरान महर्षि वेदव्यास पांडवों को पांचाल राज्य में होने वाले मत्स्य भेदन की जानकारी देते हैं। जहां पहुंचकर अर्जुन मत्स्य भेदन कर पांचाल नरेश राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी का हाथ अर्जुन के हाथ में सौंप देते हैं।

हालांकि तब तक किसी को यह ज्ञात नही होता है कि ये पांडव अर्जुन है, क्योंकि समस्त पांडव तो ब्राह्मण का वेश धारण किए हुए थे। जबकि उस सभा में दुर्योधन और कर्ण जैसे महान योद्धा भी मौजूद थे। हालांकि अर्जुन से पहले मत्स्य भेदन कर्ण ने किया था, लेकिन द्रौपदी ने कर्ण को सूत पुत्र कहकर उससे विवाह के लिए मना कर दिया था।

बाद में जब अर्जुन ने ब्राह्मण के वेश आकर मत्स्य भेदन किया, तब द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाल दी। और सभा के दौरान यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह ब्राह्मण कौन है? राजा द्रुपद उस ब्राह्मण को रत्नों के भंडार गृह में ले गए। जहां से उस ब्राह्मण ने कुछ भी पाने की चाह नहीं की।

जबकि अस्त्र शस्त्र गृह में पहुंचते ही उस ब्राह्मण ने धनुष और अस्त्रों में रुचि दिखाई। जिससे सबको यह अंदाजा हो गया कि यह ब्राह्मण कोई और नहीं बल्कि स्वयं अर्जुन है।

फिर जब अर्जुन और भीम द्रौपदी को विवाह के पश्चात् अपनी माता कुंती का आशीर्वाद दिलाने के लिए उनके पास लेकर जाते हैं। तो वह दरवाजे से ही कहते हैं कि मां देखो हम क्या लेकर आए हैं? तब माता कुंती भूलवश बिना देखें यह कह देती हैं कि जो भी लाए हो उसे आपस में बांट दो। इस प्रकार, द्रौपदी पांचों पांडवों की पत्नी कहलाती हैं।

भगवान श्री कृष्ण तब आकर द्रौपदी को स्मरण कराते हैं कि अपने पिछले जन्म में तुमने ही युधिष्ठिर जैसा धर्म और न्याय प्रिय, भीम जैसा बलशाली, अर्जुन जैसा शक्तिशाली, नकुल जैसा सुन्दर और सहदेव जैसे ज्ञानी जीवनसाथी का वरदान भगवान शिव से मांगा था।


युधिष्ठिर और इंद्रप्रस्थ राज्य की स्थापना

हस्तिनापुर राज्य को जब यह समाचार मिलता है कि पांडव जिंदा है। तब वहां कौरव भाइयों को छोड़कर बाकी सब खुशी के मारे झूम उठते हैं। भीष्म द्वारा पांडवों और द्रौपदी के स्वागत के लिए राजमहल में भव्य इंतजाम किए जाते हैं।

परंतु पांडवों की अनुपस्थिति में महाराज धृतराष्ट्र अपने पुत्र दुर्योधन को हस्तिनापुर का युवराज घोषित कर देते हैं। जिसके कारण जब युधिष्ठिर और पांडव भाई मिलकर महाराज धृतराष्ट्र से अपना अधिकार मांगते हैं, तब महाराज धृतराष्ट्र उन्हें खांडवप्रस्थ दे देते हैं।

जोकि नागराज तक्षक की भूमि थी और वहां नागों का बसेरा हुआ करता था। जिन्हें देवराज इंद्र का रक्षण भी प्राप्त था। ऐसे में नागों को खांडवप्रस्थ से हटाने के लिए अर्जुन को देवराज इंद्र से युद्ध करना पड़ा। जिसमें अर्जुन को विजय प्राप्त हुई और इंद्र देवता से वरदान स्वरूप पांडवों को खांडवप्रस्थ एक सुंदर नगरी के रूप में मिल गया। साथ ही अपने पुत्र अर्जुन की कर्मनिष्ठा और शौर्य से प्रभावित होकर देवराज इंद्र ने उन्हें गांडीव और उत्तम रथ दे दिया।

फिर विश्वकर्मा व मय दानव की वास्तु और शिल्पकला के आधार पर खांडवप्रस्थ को सुंदर और भव्य इंद्रपुरी नगरी में परिवर्तित कर दिया गया। जहां पांडवों के लिए एक मायावी और सुंदर महल भी स्थापना की गई थी। जिसका वास्तविक और काल्पनिक रूप दोनों ही भिन्न थे।

इसी कारण जब एक बार दुर्योधन यहां आया, तब वह जिसे वास्तविक भूमि समझ रहा था, वहां असल में जल मौजूद था। जिसके कारण वह गिर गया और तब द्रौपदी ने अंधे का पुत्र अंधा कहकर उसका उपहास उड़ाया। जिसके कारण दुर्योधन द्रौपदी पर काफी क्रोधित हुआ और मन ही मन उससे चिढ़ने लगा।

फिर जब पांडवों द्वारा इंद्रप्रस्थ के स्थापना पर्व के दौरान समस्त राजाओं को निमंत्रित किया गया। तब उस समारोह में पांडवों का भाई शिशुपाल भी मौजूद था। जिसने भगवान श्री कृष्ण का मजाक उड़ाया था। जिसके विरोध में भगवान श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका धड़ सिर से अलग कर दिया।

इसके अलावा, भीम ने भगवान श्री कृष्ण की मथुरा नगरी के सबसे बड़े दुश्मन जरासंध को मारने के लिए द्वंद युद्ध भी किया था। क्योंकि जरासंध को पुर्नजीवित होने का वरदान प्राप्त था। जिस कारण उसकी मृत्यु ऐसे बलशाली व्यक्ति के हाथों होनी थी। जोकि द्वंद युद्ध में उसके शरीर को दो हिस्सों में बांट सके। ऐसे करके भीम ने जरासंध को मृत्यु के घाट उतार दिया।

उधर, एक बार जब इंद्रप्रस्थ राज्य की सीमा पर किसी राक्षस का हमला हुआ था। जिस कारण राज्य की सुरक्षा के खातिर अर्जुन को वहां जाना पड़ा। लेकिन इस दौरान उसका गांडीव युधिष्ठिर के कक्ष में होता है, जिसे लेने के लिए जब वह विवशतापूर्ण उनके कक्ष में प्रवेश करते हैं, तो वहां द्रौपदी भी मौजूद होती हैं। ऐसे में अर्जुन द्रौपदी और युधिष्ठिर के एकांत को भंग करने के अपराध के कारण स्वयं को वनवास देकर दंडित करते थे।

अर्जुन अपने वनवास के दौरान ब्राह्मण का वेश धारण करके जंगलों में भ्रमण करते हैं। तभी भगवान श्री कृष्ण अपनी बहन सुभद्रा का विवाह अर्जुन के साथ कर देते हैं। क्योंकि एक तो वह अर्जुन को अपना प्रिय मानते थे और दूसरा अर्जुन एक महान योद्धा था। इसके तत्पश्चात्, अर्जुन सुभद्रा को लेकर इंद्रप्रस्थ लौट आते हैं। जहां अर्जुन और सुभद्रा का बेटा अभिमन्यु जन्म लेता है।


युधिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ की घोषणा

खांडवप्रस्थ को अपनी कर्मभूमि बनाने के पश्चात् पांडवों ने राजसूय यज्ञ करने की घोषणा कर दी। ऐसे में जिस प्रकार से युधिष्ठिर व चारों पांडवों के यश और वीरता के चर्चे चारों ओर हो रहे थे। ठीक उसी तरह से हस्तिनापुर तक यह बात भी पहुंच गई कि युधिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ की घोषणा की गई है।

आपको बता दें कि राजसूय यज्ञ वैदिक काल में राजा स्वयं को चक्रवर्ती सम्राट घोषित करने के उद्देश्य से किया करते थे। जिसमें अपने परिवार का सहयोग पाने के उद्देश्य से युधिष्ठिर अपने पांडव भाइयों, द्रौपदी और माता कुंती समेत हस्तिनापुर जाते हैं। जहां मामा शकुनि, दुर्योधन और दुशासन एक बार फिर पांडवों को अपनी कुटिल योजना का शिकार बनाते हैं।

जब युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ महाराज धृतराष्ट्र को राजसूय यज्ञ की जानकारी देने महल में जाते हैं। तो दुर्योधन द्वारा उन्हें द्वयुत क्रीड़ा (जुआ) के लिए उकसाया जाता है। ऐसे में युधिष्ठिर दुर्योधन के मंसूबों से अंजान द्वयुत क्रीड़ा में भाग लेने के लिए अपनी सहमति दे देते हैं। हालांकि पांडव भाई मिलकर युधिष्ठिर को ऐसा करने से मना करते हैं, लेकिन इसके बावजूद युधिष्ठिर खेल खेलने के लिए हामी भर देते हैं।


द्वयुत क्रीड़ा, द्रौपदी चीरहरण और पांडवों के वनवास की कहानी

फिर जब राजमहल में द्वयुत क्रीड़ा का आयोजन होता है, तब एक तरफ कौरव, मामा शकुनि और कर्ण थे। तो वही दूसरी तरफ पांडव भाई मौजूद थे। खेल के आरंभ में तो बाजी पांडवों के पक्ष में थी। लेकिन जैसे ही मामा शकुनि ने अपने पासों के माध्यम से चाल डालनी शुरू की। तब मानों खेल का रुख ही बदल गया।

धीरे धीरे खेल में दांव लगने लगे। और युधिष्ठिर ने एक एक करके अपने राज्य, अस्त्रों, रथ और आभूषणों को दांव पर लगाना शुरू कर दिया। उपरोक्त सभी बाजी हारने के बाद युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को भी दांव पर लगा दिया। जिसके बाद मानो हर बाजी कौरवों के पक्ष में जाने लगी।

और जब युधिष्ठिर खेल में अपने भाइयों तक को हार गए तब दुर्योधन के उकसाने पर युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया था। जिसके बाद वह द्वयुत क्रीड़ा में द्रौपदी को भी हार गए। तत्पश्चात् दुर्योधन के आदेश देने पर दुशासन द्रौपदी को भरी सभा में बालों से खींचकर लेकर आया।

उस सभा में हस्तिनापुर के सभी विद्वान व्यक्ति भी मौजूद थे, इसके बावजूद भी वह सब लोग मूकदर्शक बने रहे। इस दौरान दुर्योधन ने दुशासन से कहा कि इस पांच पतियों वाली महिला को वह उसकी जंघा पर बैठा दे। तो वहीं कर्ण ने द्रौपदी को वेश्या कहकर पुकारा।

दुर्योधन की सभा में इससे अधिक नीचता तब हुई जब दुर्योधन ने दुशासन को भरी सभा के सामने द्रौपदी के वस्त्रों का चीर हरण करने को कहा। द्रौपदी इस अपमान के बदले में फूट फूट कर रोई और इसी दौरान उसने महाराज धृतराष्ट्र को श्राप दिया कि उनके वंश का नाश हो जाएगा।

साथ ही वस्त्र हरण के दौरान अपनी रक्षा के लिए द्रौपदी ने भगवान श्री कृष्ण को याद किया, जोकि उनके परम सखा भी थे। भगवान श्री कृष्ण ने भरी सभा में द्रौपदी को अपमान से बचाया। इसके बाद रानी गांधारी सभा में उपस्थित होकर इस अधर्म को रोक लेती है।

तब पांडव भीम द्रौपदी का अपमान का बदला लेने के लिए भरी सभा में यह प्रतिज्ञा लेते हैं। कि द्रौपदी के केशों को हाथ लगाने के बदले में वह दुशासन की छाती फाड़कर उसके लहू से द्रौपदी के बालों को धुलवाएगा। और दुर्योधन ने जिस जंघा पर द्रौपदी को बैठाने की बात कही, उसको तोड़ दूंगा। यानि भीम ने द्रौपदी के अपमान का बदला लेने की ठान ली थी।

जिसके बाद महाराज धृतराष्ट्र उस समय युद्ध की परिस्थितियों को टालने के लिए पांडवों से बातचीत करते हैं और कहते है कि अपराध तो तुमसे भी हुआ है, तुम्हें किसी व्यक्ति या स्त्री को दांव पर लगाने का अधिकार नहीं है। इसलिए तुमको 12 साल का वनवास और 1 साल का अज्ञातवास दिया जाता है।

इसके पश्चात् तुम्हारे वापस आने पर तुम्हें तुम्हारा राज्य सम्मान समेत लौटा दिया जाएगा। परंतु यदि 1 वर्ष के अज्ञातवास के दौरान तुम पहचान लिए जाते हो, तो तुम्हें पुन: वनवास भोगना होगा।


पांडवों का 12 वर्ष का वनवास

पांडव अपने वनवास के दौरान एक जंगल में कुटिया बनाकर रहने लगते हैं। जहां वह जंगल की लकड़ियां, नदियों का पानी और पेड़ों के फल खाकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। तभी एक बार तालाब में पानी पीने के दौरान पांडवों की मुलाकात यक्ष के भेष में यमराज से होती है।

जोकि उनसे कहते हैं कि यदि उनको इस तालाब से पानी पीना है तो उन्हें पहले कुछ प्रश्नों का उत्तर देना होगा। लेकिन युधिष्ठिर को छोड़कर सारे पांडव भाई यक्ष की बात को अनसुनी कर देते हैं और मूर्छित हो जाते हैं। ऐसे में युधिष्ठिर द्वारा सारे प्रश्नों का ठीक उत्तर देने पर यमराज खुश होकर युधिष्ठिर के समस्त भाइयों को जीवित कर देते हैं। जिसके बाद युधिष्ठिर को धर्म राज के नाम से जाना गया।

उधर, एक बार जब द्रौपदी अकेली कुटिया में रह रही थी। तब दुर्योधन की बहन का पति जयद्रथ द्रौपदी की परिस्थिति का फायदा उठाकर उन्हें हरण करके अपने साथ ले जाता है। और जब पांडवों को यह बात पता लगती है, तब अर्जुन और भीम मिलकर जयद्रथ को युद्ध करके बंदी बना लेते है और युधिष्ठिर के सामने प्रस्तुत करते हैं। तब समस्त पांडव भाई मिलकर जयद्रथ को इसलिए माफी कर देते हैं क्योंकि वह उनकी बहन का पति था।

पांडवों के वनवास के समय ही ऋषि दुर्वासा ब्राह्मणों समेत पांडवों की कुटिया में पधारते हैं। और ब्राह्मणों को भोजन कराने को कहते हैं, लेकिन उस दौरान पांडवों के पास ब्राह्मणों को खिलाने के लिए भोजन नहीं था। ऐसे में भगवान श्री कृष्ण वहां पांडवों की सहायता के लिए आते हैं। और पांडवों की कुटिया में चावल का एक दाना खाकर अपनी चमत्कारी शक्तियों से सभी ब्राह्मणों का पेट भर देते हैं। ऐसे में भगवान श्री कृष्ण के कारण ही पांडव ऋषि दुर्वासा के श्राप से बच जाते हैं।

इसके बाद समस्त पांडवों को श्री कृष्ण यह आदेश देते हैं कि वह अलग अलग होकर ब्रह्म शक्तियों को पाने के लिए तपस्या करें। ऐसे में नकुल और सहदेव ने जंगल में रहकर अश्वनी कुमारों, भीम ने पवन पुत्र हनुमान, अर्जुन ने भगवान शिव का आह्वान किया। तो वही युधिष्ठिर और द्रौपदी मिलकर ऋषियों की सेवा में लग गए।

इसी दौरान जब अर्जुन ने भगवान शिव की तपस्या की तब भगवान शिव ने उन्हें पाशुपतास्त्र दे दिया।  तो वहीं हनुमान जी ने भीम को द्वंद युद्ध की नीति का ज्ञान कराया। साथ ही नकुल और सहदेव को अश्विन देवता से औषिधियों का ज्ञान प्राप्त हुआ।

इसके अलावा जब अर्जुन नृत्य ज्ञान और दिव्य शस्त्रों की प्राप्ति के लिए इंद्रलोक पहुंचे। तब वहां चित्रसेन ने अर्जुन को नृत्य ज्ञान की शिक्षा दी। इस दौरान इंद्रलोक में उर्वशी नाम की एक अप्सरा थी। जोकि अर्जुन पर मोहित हो गई थी। ऐसे में जब उर्वशी नामक अप्सरा ने अर्जुन से अपने प्रेम का इजहार किया। तब अर्जुन ने उन्हें ठुकरा दिया। जिसपर क्रोधित होकर उर्वशी ने अर्जुन को 1 वर्ष के लिए किन्नर का श्राप दे दिया।


विराट नगरी और कीचक वध

पांडवों ने 12 साल का वनवास खत्म करने के बाद अज्ञातवास के लिए विराट नगरी को चुना। जहां युधिष्ठिर भेष बदलकर विराट राजा के राज्य में मंत्री कंक के नाम से रहने लगे, भीम रसोइया वल्लव के भेष में और द्रौपदी सैरंध्री के भेष में रानी सुदेष्ण की सेवा में लग गई।

वहीं नकुल ग्रंथिक बनकर अस्तवल में काम करने लगे और सहदेव तांतिपाल नाम से गौ की सेवा में समर्पित हो गए। जबकि अर्जुन जिन्हें एक वर्ष का किन्नर बनने का श्राप मिला था, उन्हें राजा विराट की पुत्री उत्तरा का नृत्य और गायन  शिक्षक घोषित कर दिया गया। जिनका नाम ब्रह्नलला था।

विराट नगरी में एक बार द्रौपदी (सैरंध्री) का आमना सामना वहां के सेनापति कीचक से हुआ। जोकि उसको बुरी नजरों से देखा करता था। एक बार जब कीचक ने सैरंध्री को अपनी दासी बनाने की बात कही, तब द्रौपदी ने यह बात जाकर भीम को बताई। तब भीम ने द्रौपदी के अपमान का बदला लेते हुए कीचक को अर्जुन की सहायता से मार दिया।


अर्जुन का कौरवों से विराट युद्ध

उधर, दुर्योधन ने अपने गुप्तचरों के माध्यम से यह पता लगा लिया था कि पांडव अज्ञातवास के दौरान आखिर कहां ठहरे हुए थे? जिसके चलते उसने अपनी कौरव सेना के साथ विराट नगरी पर आक्रमण कर दिया। और जवाब में अर्जुन ने ब्रह्नलाला के भेष में ही अपने गांडीव के द्वारा कौरव सेना को विराट नगर के बाहर ही रोक दिया। साथ ही जब तक दुर्योधन पांडवों के अज्ञातवास का भेद खोल पाता, तब तक पांडवों का अज्ञातवास सफलतापूर्वक पूर्ण हो चुका था।


युद्ध की परिस्थितियों का उत्पन्न होना

इसके बाद पांडव अपना वनवास पूरा करके हस्तिनापुर अपना अधिकार मांगने वापस लौटे। जिसपर दुर्योधन ने उन्हें राज्य लौटाने से मना कर दिया। उसका कहना था कि मैंने तुम्हारा अज्ञातवास भंग किया है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं हुआ था।

फिर दुर्योधन की बात सुनकर पांडवों को काफी गुस्सा आया और उन्होंने युद्ध करके अपना राज्यपाठ वापिस लेने की बात कही। उसी दौरान महामंत्री विदुर ने कौरवों को समझाया कि पांडवों से युद्ध आसान नहीं हैं। लेकिन दुर्योधन अहंकार के वशीभूत पांडवों से युद्ध के लिए तैयार हो जाता है।

इसके बाद, दोनों ही पक्ष युद्ध में अपनी-अपनी सेना को बढ़ाने के उद्देश्य से लग जाते हैं। जहां  कौरवों की तरफ से गांधार नरेश, अंगराज कर्ण, मत्स्य राजा शल्य, अश्वस्थमा, भूरिश्रवा, सोमदत्त, कृतवर्मा, शल, वृषसेन, जयद्रथ समेत हस्तिनापुर के महान योद्धा भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि भी युद्ध में लड़े थे।

जबकि पांडवों की तरफ से राजा द्रुपद, राजा विराट, सात्यकि, धृष्टकेतु आदि युद्ध लड़े थे। तो वहीं भगवान श्री कृष्ण और उनकी नारायणी सेना के चुनाव के समय अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण और दुर्योधन ने नारायणी सेना को चुना था। इस प्रकार, कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी (24,05,700) और पांडवों के पास 9 अक्षौहिणी (15,30,900) सेना थी।

उधर, युद्ध की बात निश्चित होने पर विदुर भीष्म पितामह से युद्ध को रोकने की बात कहते हैं, लेकिन भीष्म पितामह राजा के आदेश से बंधे होने के कारण विवशतापूर्ण कुछ कर नही पाते हैं। जिसके चलते महामंत्री विदुर का पद त्याग देते हैं और इस अधर्म से खुद को अलग कर लेते है। इस दौरान संजय को महाराज धृतराष्ट्र का मुख्य सेवक नियुक्त किया जाता है।


भगवान श्री कृष्ण का शांतिदूत बनकर कौरवों के पास जाना

युद्ध की तैयारियां सुनिश्चित हो जाने के पश्चात् दोनों ही पक्षों की ओर से शांति दूतों को भेजा गया। जहां पांडवों की ओर से भगवान श्री कृष्ण को कौरवों के पास भेजा गया तो वहीं महाराज धृतराष्ट्र ने संजय को शांति दूत बनाकर पांडवों के पास भेजा। इधर, जब भगवान श्री कृष्ण कौरवों के पास पांडवों का संदेश लेकर पहुंचे।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने महाराज धृतराष्ट्र से पांडवों के लिए पांच गांव (दिल्ली, सोनीपत, पानीपत, बागपत और तिलपत)  मांगे। लेकिन दुर्योधन ने इस शांति प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इतना ही नहीं शांति दूत बनकर आए श्री कृष्ण को बंदी बनाने का अपराध किया। जिसके क्रोधित होकर भगवान श्री कृष्ण ने दुर्योधन को अपना विराट रूप दिखाया।


महाभारत युद्ध का आरंभ

युद्ध से एक दिन पहले कौरवों ने भीष्म पितामह को और पांडवों ने राजा धृष्टद्युम को अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया। और फिर भीष्म पितामह ने युद्ध की शर्तें बताई, जिसे दोनों पक्ष मानने के लिए बाध्य थे।

  1. सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं किया जाएगा।
  2. एक श्रेणी का योद्धा अपने सामान श्रेणी के योद्धा से ही युद्ध करेगा।
  3. निशस्त्र व घायल योद्धा पर कोई वार नही करेगा।
  4. इस युद्ध में मनुष्यों को छोड़कर अन्य कोई राक्षस प्रजाति का व्यक्ति भाग नहीं लेगा।
  5. युद्धभूमि से दूर जाकर कोई युद्ध नहीं करेगा।


महाभारत युद्ध के संपूर्ण दिनों की कथा

युद्ध के पहले दिन का आरंभ शंखनाद से किया गया। जिसके बाद दोनों पक्ष एक दूसरे के सामने आ गए। इस दौरान जब अर्जुन ने अपने सामने पिता तुल्य भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य को देखा, तब उन्होंने अपने गांडीव को रखते हुए भगवान श्री कृष्ण से युद्ध को टालने की बात कही। जिसपर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद भगवद्गीता का ज्ञान दिया। इसके बाद युद्ध प्रारंभ हुआ।

युद्ध आरंभ से पहले युधिष्ठिर द्वारा यह घोषणा की गई थी कि यदि कोई अपना पक्ष बदलना चाहता है तो बदल सकता है, तब कौरवों का सौतेला भाई युयुत्सु कौरवों का साथ छोड़कर पांडवों की ओर चला जाता है।
युद्ध के पहले दिन पांडवों को काफी हानि हुई। तथा राजा विराट के दोनों पुत्र उत्तर और श्वेत वीरगति को प्राप्त हो गए।

युद्ध के दूसरे दिन किसी की मृत्यु का समाचार नही मिला। साथ ही अर्जुन ने भीष्म पितामह को अपने साथ युद्ध में कड़ी टक्कर दी। जिसके परिणामस्वरूप पांडवों को अधिक नुकसान नहीं हुआ।

युद्ध के तीसरे दिन दुर्योधन ने भीष्म पितामह पर पक्षपात का आरोप लगाया। जिसके फलस्वरूप भीष्म पितामह ने युद्ध में पांडवों की सेना में खलबली मचा दी। जिससे पांडवों को काफी नुकसान हुआ।

युद्ध के चौथे दिन भीष्म पितामह समस्त पांडवों पर भारी पड़ गए।

युद्ध के पांचवे दिन अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से भीष्म पितामह का परिचय हुआ। उस दौरान अभिमन्यु मात्र 16 वर्ष का था, जिसका साहस और सामर्थ्य देखकर भीष्म पितामह दंग रह गए। अभिमन्यु ने दिनभर भीष्म पितामह को युद्ध में उलझाए रखा और संध्या के समय तक हार नही मानी। इस दौरान भीष्म पितामह के बल से डरकर सात्यकि युद्ध मैदान छोड़कर भाग गया था।

युद्ध के छठे दिन भगवान श्री कृष्ण ने भीष्म पितामह को अपने शस्त्र त्यागने के लिए कहा और ना त्यागने पर विराट रूप के दर्शन कराए। जिसके बाद भीष्म पितामह ने पांचों पांडवों को अपनी मृत्यु का भेद बता दिया।

उन्होंने बताया कि तुम्हारी सेना में शिखंडी नाम का एक अर्धनारी रूप लिए योद्धा मौजूद है। जोकि देवी अंबा का पुनर्जन्म है।जिसका हरण मैंने माता सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य के विवाह के लिए किया था। लेकिन वह किसी और से प्रेम करती थी।

परंतु बाद में उसके प्रेमी ने उसे अपनाने से इंकार कर दिया था। जिस कारण अंबा ने भीष्म पितामह के आगे विवाह का प्रस्ताव रखा था। परंतु भीष्म पितामह ने आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले रखी थी। जिसके बाद राजकुमारी अंबा भगवान परशुराम के पास जाती है और तत्पश्चात् भीष्म पितामह और परशुराम के भीषण युद्ध होता है।

जिसको रोकने के लिए भगवान शंकर को मध्यस्थता करनी पड़ती है। तभी भीष्म पितामह कहते हैं कि जब भी देवी अंबा युद्ध भूमि में मेरे सामने होंगी तब मैं अपने शस्त्र त्याग दूंगा। इस प्रकार महाभारत के युद्ध में देवी अंबा ने शिखंडी के रूप में अवतार लिया था। जोकि भीष्म पितामह की मृत्यु का कारण बना।

युद्ध के सांतवे दिन शिखंडी ने अर्जुन के रथ पर सवार होकर युद्ध भूमि में प्रवेश किया। जिसे देखकर भीष्म पितामह ने अपने शस्त्र त्याग दिया और फिर अर्जुन ने उन पर बाणों की वर्षा दी। जिसके बाद भीष्म पितामह के लिए बाणों की शैय्या तैयार कर दी।

क्योंकि भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था। साथ ही वह तब तक प्राण नही त्याग सकते थे, तब तक हस्तिनापुर में धर्म की स्थापना नही होती। हालांकि अर्जुन ने जब भीष्म पितामह पर बाणों से प्रहार किया तब उनके आंखों में अश्रु थे।

युद्ध के आठवें दिन कौरवों के सेनापति गुरु द्रोणाचार्य को बनाया जाता है। इस दिन अभिमन्यु और दुर्योधन युद्धभूमि में आमने सामने आ गए। और अभिमन्यु ने दुर्योधन को कड़ी चुनौती दी। साथ ही इस दिन कर्ण युद्ध लड़ने के लिए मैदान में आते हैं। क्योंकि युद्ध आरंभ होने से पहले कर्ण ने अपना समर्पण सेनापति के प्रति नही दिखाया होता है। जिस कारण भीष्म पितामह कर्ण को युद्ध लड़ने से रोक देते हैं।

युद्ध के नौंवे दिन भीम ने 17 कौरवों का वध कर दिया।

युद्ध के दसवें दिन गुरु द्रोणाचार्य युधिष्ठिर को बंदी बनाने के उद्देश्य से आगे बढ़ते है लेकिन अर्जुन उन्हें रोक लेता है।

युद्ध के ग्यारहवें दिन गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वस्थमा का युद्ध अभिमन्यु से होता है। तो वही अर्जुन का युद्ध गुरु द्रोणाचार्य से होता है।

युद्ध के बारहवें दिन अर्जुन का युद्ध त्रिगर्त राजा से होता है। जोकि युद्ध भूमि से अर्जुन को दूर ले जाते हैं ताकि अन्य लोग युधिष्ठिर को बंदी बना सके। परंतु उसी दौरान राजा त्रिगर्त को परास्त करके लौट आता है।

युद्ध के तेहरवें दिन अर्जुन को पराजित करने के लिए भगदत्त राजा उसे दूर ले जाकर युद्ध करते हैं। लेकिन अर्जुन छलपूर्वक उन्हें भी पराजित कर देता है। इसी दिन गुरु द्रोणाचार्य युद्ध के दौरान पांडवों के लिए चक्रव्यूह की रचना करते हैं।

जिसमें से केवल अभिमन्यु ही चक्रव्यूह तोड़ना जानता था, लेकिन उससे निकालना उसे नही आता था। क्योंकि जब वह अपनी माता के गर्भ में था, तब अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन बता रहे थे, लेकिन इसी दौरान सुभद्रा की आंख लग जाने के कारण अभिमन्यु का ज्ञान अधूरा रह गया और वह चक्रव्यूह से निकलने की युक्ति न जान सका।

जिस कारण अंत में अभिमन्यु कौरवों के हाथों मारा गया। ऐसे में अर्जुन को जब अभिमन्यु के वध का समाचार मिला। तब उसने जयद्रथ को अगले दिन सूर्यास्त से पहले मारने की प्रतिज्ञा ली और ऐसा न करने पर स्वयं अग्नि समाधि लेने की बात कही।

युद्ध के चौदहवें दिन जब अर्जुन जयद्रथ को मारने के लिए आगे बढ़ते हैं, तब उन्हें रोकने के लिए कौरव सेना उनके सामने आ जाती है। लेकिन वह अर्जुन को रोक नही पाते हैं। उधर सूर्योदय भी निकट होता है और जयद्र्थ का कुछ पता नहीं लगता है।

तब भगवान श्री कृष्ण अपने सुदर्शन चक्र से सूर्य देव के प्रकाश को छुपा देते हैं और सबको ऐसा लगता है सूर्यास्त हो गया। तब जयद्रथ बाहर आ जाता है और तभी भगवान श्री कृष्ण अपने सुदर्शन चक्र को हटा लेते हैं। और अर्जुन अपने दिव्यास्त्र से जयद्रथ का वध कर देते हैं। जिसका धड़ उसके पिता की गोद में जाकर गिरते ही भस्म हो जाता है।

साथ ही इस दिन गुरु द्रोणाचार्य राजा द्रुपद और राजा विराट का वध कर देते हैं। इसके अलावा भीम इस दिन अपने पुत्र घटोत्कच का आह्वान करता है और वह युद्ध में आकर कौरवों की 2 अक्षौहिणी सेना का नाश कर देता है।

तभी कर्ण भगवान इंद्र द्वारा दिए गए दिव्यास्त्र का प्रयोग घटोत्कच पर कर देता है, जिसे इंद्र देवता ने उसके कुंडल और कवच के बदले में दिया होता है। आपको बता दें कि बाल्यकाल से ही कर्ण अर्जुन से प्रतिस्पर्धा करना चाहता था और उसने यह दिव्यास्त्र अर्जुन का वध करने के लिए ही इंद्र देव से लिया था।

युद्ध के पंद्रहवें दिन पांडव गुरु द्रोणाचार्य को अश्वस्थमा की मृत्यु का गलत समाचार देते है। जिसपर गुरु द्रोणाचार्य युधिष्ठिर से इस बात की पुष्टि करते हैं तब युधिष्ठिर अश्वस्थमा नामक गज की मृत्यु को उनके पुत्र की मृत्यु बना देते हैं। जिसके बाद शोक में आकर गुरु द्रोणाचार्य अपने अस्त्रों को त्याग देते हैं, जिसका फायदा उठाकर धृष्टद्युम गुरु द्रोणाचार्य का  सिर धड़ से अलग कर देता है।

युद्ध के सोलहवें दिन गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु के बाद कर्ण को कौरवों का सेनापति बनाया जाता है। लेकिन वह अर्जुन को छोड़कर पांडवों का वध नहीं करता है, क्योंकि उसने अपनी माता कुंती को वचन दिया था। उधर भीम दुशासन को मारकर प्रतिज्ञानुसार उसकी छाती का रक्त पीता है।

युद्ध के सतरहवें दिन अर्जुन और कर्ण के मध्य भीषण युद्ध होता है। जिसमें श्राप युक्त होने के कारण कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस जाता है और भगवान परशुराम के श्राप के कारण कर्ण अपनी विद्या भी भूल जाता है। जिसके बाद अर्जुन निशस्त्र कर्ण को छलपूर्वक मार देते हैं। इसी रात समस्त पांडवों को यह ज्ञात होता है कि कर्ण उनका जयेष्ठ भ्राता था। तभी युधिष्ठिर समस्त स्त्री जाति को यह श्राप देते हैं कि अब वह कोई भेद नहीं रख सकेंगी।

युद्ध के अठहारवें दिन भीम समस्त कौरव भाइयों का वध कर देता है। नकुल और सहदेव मामा शकुनि और शल्य का वध कर देते हैं। तो वहीं दुर्योधन अपनी हार के डर से एक तालाब में जाकर छुप जाता है। जिसको बाद में द्वंद युद्ध के लिए भीम द्वारा उकसाया जाता है।

हालांकि रानी गांधारी ने अपनी शक्ति से दुर्योधन के सम्पूर्ण शरीर को वज्र का बना दिया था। लेकिन केवल उसकी जंघा का भाग व्रज का ना हो पाया था। जिसके कारण युद्ध के अंत में भीम छलपूर्वक दुर्योधन की जंघा तोड़ देते हैं और उसी दौरान उसका वध हो जाता है। जिसके साथ ही पांडव महाभारत का युद्ध जीत जाते हैं।


द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध और परीक्षित का जन्म

दुर्योधन की मृत्यु के बाद गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वस्थामा ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए धृष्टद्युम को मारने की योजना बनाई। लेकिन धोखे से उसने धृष्टद्युम समेत द्रौपदी के पांचों बेटों ( प्रतिविंध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक, श्रुतसेन) को मार दिया।

जिस कारण उसे धरती पर जीवन भोगने का श्राप मिला। इतना ही नहीं अश्वस्थमा ने ही अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे परीक्षित पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। जिसे बाद में श्री कृष्ण द्वारा पुनर्जीवन मिला था।

इस प्रकार, दुर्योधन की मृत्यु के बाद महाभारत के युद्ध का अंत हो जाता है। उधर, भगवान श्री कृष्ण के यदुकुल वंश का भी नाश हो जाता है। क्योंकि भगवान श्री कृष्ण को माता गांधारी ने वंशहीन
होने का श्राप दिया था।

साथ ही जब भीष्म पितामह को यह ज्ञात होता है कि पांडव युद्ध जीत गए हैं तब वह भी प्राण त्याग देते हैं। तत्पश्चात् युद्ध के बाद कौरवों की ओर से लड़ने वाले योद्धाओं में कृतवर्मा, अश्वस्थामा और कृपाचार्य जीवित बचे थे। जबकि पांडवों की ओर से पांचों पांडव और सात्यकि जीवित रहे।

महाभारत युद्ध के बाद राजा युधिष्ठिर का राज्याभिषेक किया गया। इस दौरान उन्होंने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन कर चारों ओर शांति और समृद्धि का संदेश दिया। तब पांडव भाईयों ने अपने सभी परिवार जनों को एकत्रित कर लिया और चहुं ओर खुशहाली  का विस्तार हुआ।


युधिष्ठिर समेत पांडवों का स्वर्गलोक प्रस्थान

महाभारत युद्ध की समाप्ति, यदुवंश का सर्वनाश और अर्जुन के बेटे परीक्षित को राज्य की जिम्मेदारी सौंपने के पश्चात् युधिष्ठिर ने स्वर्गलोक प्रस्थान करने की सोची। जिसपर चारों पांडव और द्रौपदी भी उनके साथ जाने को तैयार हो गए।

कहते हैं जब पांडव और द्रौपदी स्वर्गलोक जाने के लिए मेरु पर्वत की यात्रा पर निकले, तब एक कुत्ता भी उनके साथ-साथ चल रहा था। असल में उस कुत्ते के वेश में और कोई नही बल्कि स्वयं मृत्यु के देवता यमराज थे। जोकि युधिष्ठिर के साथ अंत तक रहे।

स्वर्ग जाते समय रास्ते में ही द्रौपदी समेत भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की एक एक करके मृत्यु हो जाती है। जिनमें द्रौपदी की मृत्यु का कारण यह था कि वह हम पांचों पांडवों में सबसे अधिक अर्जुन से प्रेम करती थी। भीम की मृत्यु इसलिए हुई क्योंकि उन्हें अपनी प्रशंसा स्वयं करना पसंद था और वह भोजन का अत्यधिक मात्रा में सेवन करते थे।

अर्जुन को अपनी शक्ति पर घमंड था इसलिए उसकी भी मृत्यु हो गई। तो वहीं नकुल को अपनी सुन्दरता और सहदेव को अपने ज्ञानी होने पर अभिमान था। इसलिए युधिष्ठिर को छोड़कर अन्य सभी मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुंचे।

जबकि युधिष्ठिर को सशरीर स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी क्योंकि युधिष्ठिर जीवनपर्यंत धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर प्रशस्त रहे। हालांकि गुरु द्रोणाचार्य के बेटे अश्वस्थमा की मृत्यु की गलत सूचना देने पर कुछ समय के लिए युधिष्ठिर को भी नरक के दर्शन कराए गए थे।

लेकिन उसके बाद वह हमेशा के लिए सशरीर स्वर्गलोक पहुंच गए। जहां वह अपने भाइयों समेत द्रौपदी, कर्ण, भीष्म और भगवान श्री कृष्ण से मिले। और भगवान श्री कृष्ण से मिलते ही युधिष्ठिर ने उन्हें प्रणाम किया।


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