जानिए महाभारत के उन 12 योद्धाओं के बारे में, जो युद्ध के बाद जीवित बचे थे

करीब 5000 वर्ष पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का युद्ध कौरव और पांडवों के बीच लड़ा गया था। जानकारी के लिए बता दें कि महाभारत का युद्ध प्राचीन समय का सबसे विशाल युद्ध था जोकि लगभग 18 दिनों तक चला था। जिसमें कौरवों को 11 और पांडवों को 7 अक्षौहिणी सेना प्राप्त थी। साथ ही युद्ध का अंत कौरवों की हार और पांडवों की जीत से हुआ था।

हालांकि महाभारत के युद्ध का परिणाम भगवान श्री कृष्ण समेत भीष्म पितामह, ऋषि वेदव्यास, सहदेव, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और संजय को पहले से ही ज्ञात था। ऐसे में महाभारत के युद्ध के पश्चात् 12 ऐसे योद्धा जीवित बचे थे जिन्होंने महाभारत के युद्ध के दौरान अपने कौशल और पराक्रम का परिचय दिया था। आज हम उन्हीं वीर योद्धाओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।

1. भगवान श्री कृष्ण

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भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण महाभारत के युद्ध में पांडवों की तरफ से युद्ध में शामिल हुए थे, क्योंकि पांडवों ने सदैव ही श्री कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति प्रकट की थी। दूसरी ओर, कौरवों ने हमेशा श्री कृष्ण की बातों की उपेक्षा की थी। जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब श्री कृष्ण महाभारत युद्ध से पहले कौरवों के समक्ष संधि का प्रस्ताव लेकर गए थे तो दुर्योधन ने गुस्से में भगवान श्री कृष्ण को बंदी बनाने की बात कही थी।

जिसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने सत्य और धर्म का साथ देते हुए युद्ध में अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया। हालांकि युद्ध के दौरान उन्होंने अपनी नारायणी सेना के खिलाफ शस्त्र उठाने से मना कर दिया था। साथ ही उन्होंने युद्ध के समय कर्ण को पांडवों की ओर से लड़ने का भी प्रस्ताव दिया था लेकिन कौरवों से मित्रता के कारण कर्ण ने श्री कृष्ण के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इसके अलावा भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध के दौरान अर्जुन को श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान दिया था। जिसके माध्यम से उन्होंने अर्जुन को युद्ध के समय धर्म और नीति का बोध कराया।

इतना ही नहीं जब युद्ध के मैदान में अर्जुन के सामने उनके गुरु थे तब अर्जुन ने युद्ध लड़ने से मना कर दिया था। जिस पर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें कई जरूरी उपदेश दिए। साथ ही अर्जुन को समझाया कि युद्ध के समय यदि तुम वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा यदि नहीं होगे तो मौत तो निश्चित है, इसलिए तुम युद्ध लड़ो।

इसके अलावा युद्ध स्थल पर जब कर्ण ने अर्जुन को मारने के लिए तीर कमान से अर्जुन पर वार करना शुरू किया तो भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं 12 बाणों की पीड़ा को सह लिया था और इस तरह से भगवान श्री कृष्ण ने अपने प्रिय भक्त अर्जुन के प्राणों की रक्षा की। साथ ही भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन की ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों की शिक्षा दी थी। अतः हम कह सकते हैं कि भगवान श्री कृष्ण महाभारत के बलशाली योद्धाओं में जाने जाते हैं।

2. अर्जुन

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पाण्डु पुत्र अर्जुन महाभारत के प्रमुख योद्धाओं में से एक थे। अर्जुन को पार्थ, धनंजय इत्यादि नामों से भी पुकारा जाता है। इन्होंने द्रौपदी को एक स्वयंवर में जीता था।  कहा जाता है कि इंद्र देवता के आशीर्वाद से अर्जुन का जन्म हुआ था। साथ ही अर्जुन गुरु द्रोणाचार्य के योग्य शिष्यों में से एक थे। जिन्हें धनुर्विद्या का पूर्ण ज्ञान अर्जित था। तो वहीं अर्जुन पर भगवान श्री कृष्ण की कृपा सदैव ही बनी रही। वह भगवान श्री कृष्ण के प्रिय भक्त होने के साथ साथ उनके सखा भी थे।

महाभारत के युद्ध के दौरान अर्जुन ने अपने पराक्रम से शत्रुओं को परास्त कर दिया था। इतना ही नहीं अर्जुन ने कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि पर पहले तो कौरवों की सेना में शामिल अपने गुरुओं पर बाण चलाने से साफ इंकार कर दिया था लेकिन भगवान श्री कृष्ण के समझाने के बाद वह कौरवों के प्राच्य, क्षुद्रक, सौवीर और मलाव क्षत्रियों को युद्ध में पराजित कर देते हैं। इसके अलावा अर्जुन ने कुरुक्षेत्र की भूमि पर अपने युद्ध कौशल का परिचय देते हुए इरावान विन्द और अनुविन्द को हराया था।

युद्ध के दसवें दिन अर्जुन ने भीष्म पितामह को बाणों की शय्या पर लिटा दिया था। इसके साथ ही अर्जुन को महाभारत के युद्ध के समय चक्रव्यूह से बाहर निकालने का सम्पूर्ण ज्ञान था। तो वहीं गुरु द्रोणाचार्य द्वारा जब अर्जुन के बेटे अभिमन्यु की मौत हो गई तब उसका प्रमुख कारण जयद्रथ को मानकर अर्जुन ने उसका वध करने का संकल्प लिया था। इस प्रकार हम  कह सकते है कि महाभारत का युद्ध जीतने में अर्जुन का भी विशेष योगदान रहा।

3. भीम

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पाण्डु पुत्र भीम पांचों पांडवों में सबसे अधिक बलशाली थे। जोकि पवन देवता के आशीर्वाद से उत्पन्न हुए थे। यह पांडवों में सबसे ज्येष्ठ युधिष्ठिर के सबसे प्रिय भाई थे। इनमें लगभग 10 हजार हाथियों के समान ताकत थी। इतना ही नहीं महाभारत के युद्ध का अंत भी भीम के हाथों ही हुआ था क्योंकि इन्होंने ही दुर्योधन समेत सभी कौरव भाइयों का वध किया था। इनका प्रमुख अस्त्र गदा है। तो वहीं कहा जाता है कि भीम का विवाह मायावी राक्षसनी हिडिंबा से हुआ था जिनसे इनका पुत्र घटोत्कच पैदा हुआ था।

वह इतना शक्तिशाली था कि वह दुश्मन सेना को अपने पैरों के नीचे ही कुचल दिया करता था। तो वहीं बलशाली भीम ने अनेकों राक्षसों का वध किया था। इतना ही नहीं महाभारत के युद्ध के दौरान भीम ने द्रौपदी के चीरहरण का बदला दुशासन का सीना चीरकर लिया था। इस प्रकार महाभारत के युद्ध के समय भीम ने दुर्योधन के साथ गदा युद्ध किया और उसे पराजित कर महाभारत का युद्ध जीत लिया।

4. युधिष्ठिर

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पांच पांडव भाइयों में युधिष्ठिर सबसे बड़े भाई थे। युधिष्ठिर महाराज पाण्डु और कुंती के पहले पुत्र थे। इन्हें यमराज का पुत्र भी कहा गया है। युधिष्ठिर भाला चलाने में निपुण थे और सदैव सच का साथ दिया करते थे। इसके साथ ही युधिष्ठिर एक अच्छे राजनीतिज्ञ, धर्मनीति और सत्यनिष्ठ थे। महाभारत के युद्ध से पहले युधिष्ठिर ने अपने सभी गुरु तुल्य व्यक्तियों भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, मामा शल्य और कृपाचार्य का आशीर्वाद ग्रहण किया था।

हालांकि युद्ध के समय मामा शल्य का वध भी युधिष्ठिर के हाथों ही हुआ था। इसके अलावा युधिष्ठिर ने अपना धर्म कर्तव्य निभाते हुए महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् सभी मृत सैनिकों के शवों का अंतिम संस्कार किया था। इस प्रकार युधिष्ठिर ने युद्ध स्थल पर अपना कौशल और धर्म दोनों एक साथ निभाया। इतना ही नहीं युद्ध समाप्ति के बाद युधिष्ठिर ने राज पाठ त्याग दिया था।

5. नकुल

हिंदुओं के पवित्र काव्य महाभारत में वर्णित पांडवों में से नकुल एक थे। यह महाराज पाण्डु की दूसरी पत्नी माद्री के पुत्र थे। यह अपने नाम की भांति बुद्धिमान, केंद्रित, परिश्रमी, रूपवान, स्वास्थ्य, आकर्षक, सफल, आदर करने वाले और प्रेम पूर्वक व्यवहार करने वाले थे। पांडव नकुल के विषय में एक बात कहीं जाती है कि वह बारिश में बिना जल की बूंद को छुए घुड़सवारी कर सकते थे। इतना ही नहीं अत्यधिक सुंदर होने के कारण इनकी तुलना कामदेव से की जाती है। इनका विवाह जरासंध से हुआ था। साथ ही यह पशु शल्य चिकित्सा में निपुण थे। महाभारत के युद्ध में इन्होंने अपने पराक्रम से कौरवों को धूल चटाई। साथ ही नकुल अपनी तलवारबाजी के लिए भी जाने गए।

6. सहदेव

सहदेव पांचों पांडवों में सबसे छोटे थे। कहा जाता है जब माता माद्री को दो जुड़वा संताने हुई तो यह भविष्यवाणी हुई थी कि नकुल और सहदेव के रूप में उत्पन्न यह रूप और शक्ति अश्विनों से बढ़कर होंगे। इसके अलावा सहदेव परशु अस्त्र चलाने में निपुण थे। इतना ही नहीं सहदेव को त्रिकालदर्शी भी माना जाता है। सहदेव महाभारत के उन चुनिंदा लोगों में शामिल है जिन्हें महाभारत के युद्ध का परिणाम पहले से ही ज्ञात था। तो वहीं युद्ध के दौरान इनके रथ पर हंस का ध्वज लहर रहा था।

इन्होंने गुरु द्रोणाचार्य से ज्योतिष विद्या भी सीखी थी। साथ ही युद्ध के मैदान में इन्होंने अपनी युद्ध नीति से कौरवों को शिकस्त दी थी। सहदेव की कुल चार पत्नियां थीं। तो वहीं इन्हें भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में पहले ही ज्ञान हो जाया करता था लेकिन श्री कृष्ण ने कहा था कि यदि वह महाभारत के युद्ध का परिणाम किसी को बताएंगे तो उनकी मौत निश्चित है। वहीं बात करें कि सहदेव को त्रिकालदर्शी क्यों कहा जाता है तो इन्होंने अपने पिता पाण्डु के मस्तिष्क के तीन टुकड़ों को खाया था। जिससे उन्हें इतिहास, वर्तमान और भविष्य का ज्ञान हो गया था।

7. अश्वत्थामा

अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचार्य और माता कृपि के पुत्र थे। जोकि महाभारत युद्ध के दौरान कौरवों की ओर से लड़े थे। कहा जाता है कि अश्वत्थामा के मस्तक पटल पर एक मणि मौजूद थीं, जिससे उन्हें कोई मार नहीं सकता था लेकिन महाभारत युद्ध के दौरान जब उनके पिता की मौत हो गई। तब अश्वत्थामा से क्रोधित होकर युद्ध में ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया था। जिससे युद्ध भूमि शमशान भूमि में तब्दील हो गई थी। तभी

भगवान श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को करीब तीन हजार वर्षों तक कोढ़ी बनकर जीने का श्राप दे दिया था। इसके अलावा युद्ध भूमि में अश्वत्थामा ने भीम के पुत्र घटोत्कच और घटोत्कच के पुत्र अंजनपर्वा का वध किया था। इतना ही नहीं महाभारत के युद्ध में अश्वत्थामा ने कुंतीभोज दस पुत्रों को मौत के घाट उतार दिया था। इस प्रकार अश्वत्थामा और गुरु द्रोणाचार्य ने मिलकर कौरवों की तरफ से महाभारत युद्ध में पांडवों को मुंह तोड़ जवाब दिया था।

8. युयत्सु

महाभारत में वर्णित युयुत्सु राजा धृतराष्ट्र की एक वैश्य दासी की कोख से जन्मे थे। हालांकि यह धर्मात्मा प्रवृत्ति के थे जिसके चलते युयुत्सु कभी भी कौरवों से इत्तेफाक नहीं रखते थे इसलिए युद्ध प्रारंभ होने के बाद यह पांडवों की ओर से लड़े थे। इतना ही नहीं जब युधिष्ठिर ने युद्ध शुरू होने से पहले घोषणा की थी कि मैं यह युद्ध धर्म के लिए लड़ रहा हूं और जो धर्म के लिए यह युद्ध लड़ना चाहता है वह मेरे साथ आए। तब कौरवों की सेना से अकेले युयुत्सु आगे आए थे।

महाभारत के युद्ध के दौरान युधिष्ठिर ने युयुत्सु को हथियारों और रसद के प्रबंधन का कार्य भार सौंपा था। जिसे युयुत्सु ने जिम्मेदारी के साथ निभाया। इतना ही नहीं युयुत्सु ने ही अपने पिता धृतराष्ट्र की मृत्यु के बाद उनकी चिता को आग लगाई थी।

9. सात्यकि

सात्यकि अर्जुन के परम मित्र थे। साथ ही वह महाभारत के युद्ध के दौरान यादवों की सेना को प्रधान सेनापति था। सात्यकि शिनि का पुत्र था और इन्होंने अर्जुन से धर्नुविद्या सीखी थी। हालांकि प्रारम्भ में जब श्री कृष्ण की सारी नारायणी सेना कौरवों की ओर चली गई थी तब सात्यकि ने श्री कृष्ण से निवेदन किया था कि वह अपने गुरु अर्जुन के खिलाफ युद्ध नहीं लड़ सकेंगे। ऐसे में फिर उन्होंने पांडवों की ओर से युद्ध लड़ा।

कहा जाता है कि सात्यकि ने ही आगे चलकर कृत वर्मा का वध किया था। इतना ही नहीं अर्जुन ने जब अभिमन्यु की मौत का बदला लेने के लिए या तो जयद्रथ को मारने या आत्मदाह का संकल्प लिया था। उस दौरान अर्जुन ने सात्यकि से ही युधिष्ठिर की ढाल बनने को कहा था। इस प्रकार सात्यकि ने महाभारत के युद्ध में कौरवों के प्रमुख जलसन्धि, त्रिगतों की गज सेना, सुदर्शन, मलेच्छों की सेना, कर्ण पुत्र प्रसन और भूरिश्रवा आदि का वध किया था। इस प्रकार सात्यकि भी महाभारत युद्ध के बाद जीवित रहे योद्धाओं में से एक थे।

10. कृपाचार्य

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महाभारत में वर्णित कृपाचार्य कौरवों के कुल गुरु थे। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के दौरान कृपाचार्य इसलिए बच गए थे क्योंकि इन्हें चिरंजीवी रहने का वरदान प्राप्त था। साथ ही इनके पिता शरद्वान गौतम ने इन्हें धर्नुविद्या सिखाई। जिसके बाद बड़े होकर कृपाचार्य ने महाराज पाण्डु और राजा धृतराष्ट्र के पुत्रों को धनुर्विद्या का ज्ञान दिया था।

इतना ही नहीं महाभारत के युद्ध के दौरान कर्ण की मृत्यु के पश्चात् कृपाचार्य ने दुर्योधन को पांडवों से संधि करने को कहा था। इस प्रकार महाभारत के युद्ध के दौरान कृपाचार्य ने अपनी नीति और बुद्धिमता का उचित उपयोग करके कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ा था।

11. कृतवर्मा

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महाभारत में वर्णित कृतवर्मा भोजराज ह्रदिक के पुत्र थे। इन्होंने महाभारत का युद्ध कौरवों की तरफ से लड़ा था। यह कौरवों की सेना का सबसे वीर योद्धा था। इन्होंने महाभारत के युद्ध में पांडवों की सेना के भीमसेन, युधिष्ठिर, उत्तमौजा और धृष्टदयुम्र इत्यादि को करारी हार दी थी।

कहते है कि द्वैपायन सरोवर पर पहुंचकर कृतवर्मा ने ही दुर्योधन को युद्ध के लिए प्रेरित किया था। इतना ही नहीं इन्होंने पांडवों के शिविर में आग भी लगाई थी। हालांकि यह महाभारत युद्ध में जीवित योद्धाओं में से एक थे लेकिन मौसल युद्ध में सात्यकि ने इनका वध कर दिया था।

12. वृषकेतु

महाभारत में वर्णित वृषकेतु कर्ण के पुत्र थे। कर्ण ने ही  वृषकेतु को युद्ध नीति का ज्ञान कराया था। इतना ही नहीं जब पांडवों को मालूम चला कि वह उनके भाई कर्ण का बेटा है तो उन्होंने महाभारत युद्ध के बाद उसे इंद्रप्रस्थ का राजा बना दिया। वृषकेतु के कुल आठ भाई थे जिनमें से महाभारत के युद्ध के दौरान वृषकेतु को छोड़कर सभी मौत के घाट उतार दिए गए थे।

हालांकि वृषकेतु और वभ्रूवाहन के बीच युद्ध में वृषकेतु मार दिए गए थे लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने जब पांडवों से वृषकेतु को पुनः जीवित करने की विनती की तब वृषकेतु को दुबारा जिंदा कर दिया गया। इस प्रकार महाभारत के युद्ध के बाद जीवित बचे योद्धाओं में वृषकेतु भी एक थे।

महाभारत के युद्ध के बाद इन 12 योद्धाओं के अलावा महाराज धृतराष्ट्र और माता गांधारी समेत कुंती, विदुर, बलराम, द्रौपदी आदि लोग बचे थे। जिनमें से अधिकतर लोगों ने अपना अंतिम समय वनों में व्यतीत किया और फिर देह त्याग दिया।

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

1 thought on “जानिए महाभारत के उन 12 योद्धाओं के बारे में, जो युद्ध के बाद जीवित बचे थे”

  1. बहुत ही सुंदर जानकारी है जो हमारी संस्कृति से भी जुड़ी है ।

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