महात्मा गांधी की जीवनी – Mahatma Gandhi Biography in Hindi

चल पड़े जिधर दो डग मग में।
चल पड़े कोटि पग उसी ओर।
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि।
गड़ गए कोटि दृग उसी ओर।।

हिंदी कवि सोहनलाल द्विवेदी की उपयुक्त पंक्तियां महात्मा गांधी के जीवन को भली भांति जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करती हैं। देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन सत्य, अहिंसा और प्रेम के रास्तों पर आधारित उनके जीवन मूल्य देश की सीमाओं से निकलकर संपूर्ण संसार को रोशनी प्रदान कर रहे हैं। ऐसे में हम कह सकते है कि 19 वीं सदी को जिस महापुरुष ने अपने कार्यों और विचारों के माध्यम से सबसे अधिक प्रभावित किया वह थे अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी जी। 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म

भारत देश की आज़ादी में अपना अतुलनीय योगदान देने वाले महात्मा गांधी का जन्म गुजरात राज्य के पोरबंदर जिले में 2 अक्टूबर 1869 को हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी था, जोकि सनातन धर्म की पंसारी जाति से संबंध रखते थे। और काठियावाड़ की एक रियासत में दीवान थे। तो वहीं महात्मा गांधी की माता का नाम पुतलीबाई था, जोकि वैश्य समाज से संबंध रखती थी।

कहते है कि पुतलीबाई महात्मा गांधी के पिता करमचंद गांधी की चौथी पत्नी थी। और माता पुतलीबाई की सज्जनता और धार्मिक व्यक्तित्व का ही सबसे अधिक असर महात्मा गांधी के सम्पूर्ण जीवन पर पड़ा था। साथ ही गांधी जी अपने तीन भाइयों में सबसे छोटे थे। लेकिन वह अपने सबसे बड़े भाई लक्ष्मीदास के काफी करीब थे। आगे चलकर उन्हीं के सहयोग ने गांधी जी ने विदेश में जाकर बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी की। गांधी जी के बचपन का नाम  मोहनदास करमचंद गांधी था।

तो वहीं गांधी जी जब मात्र 7 साल के थे कि तभी उनका पूरा परिवार काठियावाड़ के राजकोट जिले में रहने लगा। जहां मोहनदास ने अपनी प्राथमिक और उच्च शिक्षा हासिल की थी। कहा जाता है कि गांधी जी बचपन से ही शर्मीले और संकोची स्वभाव के थे। ऐसे में ना तो उन्हें अधिक खेलना पसंद था और ना ही वह पाठ्यक्रम के अलावा अन्य कोई पुस्तक पढ़ते थे। 

महात्मा गांधी जी का विवाह

उन दिनों भारतीय समाज में बाल विवाह प्रचलन में था। और जब मोहनदास मात्र 13 साल के थे, कि तभी साल 1883 में उनका विवाह अपने से एक साल बड़ी कस्तूर बाई मकनजी से करवा दिया गया था। जिनका नाम छोटा कर मोहनदास ने उनका नाम कस्तूरबा कर दिया था और सभी लोग उन्हें प्रेम से बा बुलाते थे।

हालांकि कस्तूरबा गांधी एक धनी व्यापारी की पुत्री थी, लेकिन वह पढ़ना लिखना नहीं जानती थीं। शादी के बाद महात्मा गांधी ने उन्हें पढ़ना लिखना सिखाया। और साल 1885 में कस्तूरबा ने एक बच्चे को जन्म दिया लेकिन वह जन्म के कुछ समय पश्चात् ही मर गया। जिसके बाद मोहनदास के पिता करमचंद गांधी भी चल बसे। पिता की मौत के बाद उन्होंने लदंन जाकर बैरिस्टर की पढ़ाई करने का फैसला लिया। इस दौरान कस्तूरबा गांधी ने अकेले ही एक संतान का उत्तरदायित्व संभाला। और कस्तूरबा और महात्मा गांधी को चार पुत्र हुए थे। जिनका नाम क्रमशः हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास था।

महात्मा गांधी और कानून की पढ़ाई

पिता के देहांत के बाद मोहनदास ने लदंन जाकर कानून की पढ़ाई करने का मन तो बना लिया था, लेकिन उनकी मां पुतलीबाई उनके इस निर्णय से खुश नहीं थी। हालांकि बाद में शराब, पराई स्त्री और मांस को हाथ ना लगाने की शर्त पर वह मोहनदास के विदेश जाने पर राजी हो गई थी।

शुरुआती दिनों में गांधी जी को विदेश में काफी परेशानियां उठानी पड़ी। इतना ही नहीं विदेश जाने से पहले मुंबई में उन्हें अपनी जाति के लोगों के बीच द्वेष से रूबरू होना पड़ा था। लेकिन उन्होंने बिना किसी की परवाह किए अपना इरादा मजबूत रखा।

हालांकि इस दौरान उन्हें अपनी जाति से हाथ धोना पड़ा था। लेकिन 18 वर्ष की आयु में वह लदंन के लिए रवाना हो गए। जहां से वकालत पूर्ण करने के बाद गांधी जी राजकोट वापस लौट आए और मुंबई में वकालत ना जमने की वजह से उन्होंने राजकोट में ही अपनी वकालत को जारी रखने की सोची। 

महात्मा गांधी और दक्षिण अफ्रीका की रेल यात्रा

यह बात साल 1893 की है जब महात्मा गांधी दादा अब्दुल्ला नामक व्यापारी के कानूनी सलाहकार के रूप में कार्य करने डरबन गए थे। उन दिनों दक्षिण अफ्रीका में काले और गोरे का भेदभाव चरम सीमा पर हुआ करता था। और इसी का गांधी जी के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा। क्यूंकि एक बार न्यायालय में दंडाधिकारी द्वारा गांधी जी को पगड़ी उतरने को कहा गया। लेकिन उन्होंने उनकी बात नहीं मानी और गांधी जी को न्यायालय से बाहर निकाल दिया गया।

इसके साथ ही दक्षिण अफ्रीका में एक रेल यात्रा के दौरान एक श्वेत व्यक्ति ने गांधी जी के प्रथम श्रेणी में यात्रा करने पर नाराजगी जाहिर की। जिस पर गांधी जी के अंतिम श्रेणी के डिब्बे में ना बैठने की बात सुनकर उन्हें ट्रेन से ही उतार दिया। जिस घटना ने गांधी जी को आहत कर दिया। और उन्होंने ठान ली कि वह दक्षिण अफ्रीका में काले लोगों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आंदोलन करेंगे। और उनका यह आंदोलन सत्याग्रह के नाम से जाना गया।

कहते है सत्याग्रह आंदोलन के बाद गांधी जी को भारत में काफी प्रशंसा मिली। और भारत लौटते ही उन्होंने साबरमती नदी के तट पर सत्याग्रह आश्रम की नींव डाली और इसी आश्रम से उन्होंने साल 1930 को दांडी यात्रा निकाली। जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक विशेष भूमिका निभाई।

महात्मा गांधी और उनके द्वारा चलाए गए आंदोलन

कहते है कि देश की आज़ादी से पहले गांधीवादी युग की शुरुआत साल 1920 में असहयोग आंदोलन से हुई थी। जिसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हल्ला बोलना था। इस दौरान बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया, लोगों ने नौकरियां छोड़ दी, कई लोगों ने अपनी उपाधियां लौटा दी। क्यूंकि उस वक़्त सब लोग देश को ब्रिटिश हुकूमत से आज़ाद कराना चाहते थे।

इसके लिए सभी ने विदेशी कपड़ों का त्याग कर खादी को अपनाया। साथ ही गांधी जी के असहयोग आंदोलन में महिलाओें और बच्चों ने भी बढ़ चढ़कर भाग लिया था। इतना ही नहीं इस आंदोलन के दौरान कई देशभक्त सामने निकलकर आए। और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गांधी जी के आंदोलनों में प्रतिभाग किया। गांधी जी ने समय समय पर कई सारे आंदोलनों का नेतृत्व कर ब्रिटिश सरकार को हिला कर रख दिया था। जिसमें साल 1930 का नमक आंदोलन जोकि ब्रिटिश सरकार द्वारा नमक कर के खिलाफ शुरू किया गया था।

साथ ही 1932 में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ा। और आंदोलनों को आग देने के लिए कितने ही बार गांधी जी को जेल टक जाना पड़ा। लेकिन उन्होंने भारत देश की आज़ादी का सपना देखना नहीं छोड़ा। और साल 1942 में गांधी जी ने अंग्रेज़ो को भारत से बाहर करने के लिए भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की। लेकिन इस दौरान भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की खबर ने गांधी जी को दुःखी कर दिया। क्यूंकि वह कभी नहीं चाहते थे कि भारत और पाकिस्तान का विभाजन हो। 

अहिंसा दिवस

प्रत्येक वर्ष गांधी जी के जन्मदिवस यानि 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस के रूप में मनाया
जाता है। तो वहीं सम्पूर्ण विश्व इस दिन अहिंसा, सत्य, मानवता और शांति की मिसालें दिया करता है। भारतीय लोग गांधी जी को बापू कहकर संबोधित किया करते हैं।

गांधी जी ने ना केवल स्वतंत्रता बल्कि समाज में व्याप्त आडंबरों, नारी शोषण, अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव आदि के खिलाफ भी आवाज बुलंद की। सर्वप्रथम गांधी जी ने ही अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों को हरिजन नाम से पुकारा था। साथ ही उनका ही मानना था कि भारत गांवों में बसता है। इतना ही नहीं उन्होंने लदंन में हो रहे गोलमेज सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तरफ से अकेले ही भारत का प्रतिनिधित्व किया था। साथ ही मानवता को बचाने की खातिर गांधी जी ने भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दौरान लोगों की काफी मदद और सेवा की थी। 

महात्मा गांधी के जीवन से जुड़े अन्य पहलू

महात्मा गांधी ने स्वयं अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग लिखी थी। इसके साथ ही हिन्द स्वराज, दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास और गीता पदार्थ कोष। साथ ही महात्मा गांधी को महात्मा यानि कि महान् आत्मा की संज्ञा देने वाले व्यक्ति थे रविन्द्र नाथ टैगोर। जिन्होंने इनकी न्याय प्रियता और सत्यता के चलते इन्हें इस उपाधि से अलंकृत किया। और भारत सरकार ने महात्मा गांधी की श्रृंखला के नोटों का मुद्रण साल 1996 में शुरू किया और इन्हें देश का राष्ट्रपिता घोषित किया गया।

आज भी भारत समेत विश्व के कई देशों में गांधी जी को अहिंसा पुरुष के रूप में याद किया जाता है। तो वहीं महात्मा गांधी ने पूर्ण रूप से शाकाहार को ही अपना जीवन बनाया था। और वह सूत से बनी शाल और धोती को ही धारण किया करते थे। जिसके लिए उन्होंने चरखे का इस्तेमाल भी किया। लेकिन अहिंसा के इस पुजारी को अपने सिद्धांतों और कार्यों की वजह से कई जगह आलोचनाओं का शिकार भी होना पड़ा। जिससे क्रांति दल के नेताओं ने शुरू से ही गांधी जी के विचारों को ठीक नहीं माना।

खुद संविधान निर्माता भीमराव अम्बेडकर गांधी जी को जाति प्रथा का समर्थक मानते थे। तो वहीं माना जाता है कि उनके शिष्य रहे सुभाष चन्द्र बोस ने उन्हें राष्ट्रपिता कहकर आज़ाद हिन्द फौज के लिए आशीर्वाद मांगा था। किन्तु महात्मा गांधी की मृत्यु के पश्चात् वह आज भी हर भारतीय के दिल में अमर रहेंगे।

महात्मा गांधी की मृत्यु

साल 1948 की 30 जनवरी को शाम के समय गांधी जी दिल्ली के बिड़ला मंदिर से प्रार्थना करके बाहर निकले ही थे कि उसी समय नाथूराम गोडसे ने उनके सीने पर गोलियां चला दी। और गांधी जी जमीन पर गिर पड़े। अन्तिम शब्द जो उनके मुख से निकले थे वह था हे राम। हिंदी की कवियत्री महादेवी वर्मा ने बापू को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए लिखा कि-

चीर कर भू व्योम की प्राचीर हो तम की शिलाएं।
अग्नि शर सी ध्वंस की लहरें गला दें पथ दिशाएं।।

महात्मा गांधी के अनमोल विचार

  1. खुद को खोजने का सबसे अच्छा तरीका है, कि खुद को दूसरों की सेवा में खो दो।
  2. जिस दिन से एक महिला रात में सड़कों पर स्वतंत्र रूप से चलने लगेगी। उस दिन से हम कह सकते है कि भारत ने स्वतंत्रता हासिल कर ली है।
  3. व्यक्ति अपने विचारों से बनी एक कतपुटली है, जैसा वह सोचता है वैसा ही बन जाता है।
  4. आंख के बदले आंख एक दिन पूरी दुनिया को अंधा कर देगी।
  5. आपका आने वाला कल इस बात पर निर्भर करता है कि आप आज क्या कर रहे हैं।
  6. जीवन ऐसे जियो की तुम कल मरने वाले जो और सीखो ऐसे कि तुम हमेशा जीने वाले हो।
  7. दुनिया हर किसी की जरूरत को पूरा करने के लिए तो पर्याप्त है, लेकिन हर किसी के लालच को पूरा करने के लिए नहीं।
  8. एक अच्छा इंसान हर सजीव का मित्र होता है।
  9. मौन सबसे शक्तिशाली भाषण होता है। इसमें दुनिया धीरे धीरे आपको सुनती है।
  10. कमजोर व्यक्ति कभी माफी नहीं मांगते। जबकि माफ़ करना ही ताकतवर व्यक्ति की विशेषता है।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर कर रही हूं। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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