Sushruta Samhita- सर्जरी नहीं है आधुनिक डॉक्टरों की देन, आचार्य सुश्रुत ने किया था शल्य चिकित्सा का सूत्रपात

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आधुनिक समय में चिकित्सा के क्षेत्र में अनेक वैज्ञानिक चमत्कार देखने को मिलते है, और ये वर्तमान उन्नतशाली तकनीक के माध्यम से ही संभव हो सका है, कि मनुष्य ने कई असाध्य रोगों पर विजय पा ली है

लेकिन अगर हम आपसे कहें कि आज से पहले जब दुनिया में तनिक भी वैज्ञानिक प्रगति नहीं हुई थी, तब भी शल्य चिकित्सा यानि सर्जरी हुआ करती थी। तो क्या आप हमारी बात पर यकीन करेंगे? यदि नहीं, तो हमारे आज के इस लेख में हम आपको प्राचीन भारत की चिकित्सा पद्धति और उससे जुड़े एक महान ग्रंथ के बारे में विस्तार से बताएंगे।

जिससे आपको इस बात पर पूर्णतया विश्वास हो सकेगा कि भारतवर्ष का प्राचीन इतिहास किसी भी सूरत में वर्तमान दृष्टिकोण से पीछे नहीं रहा है।

जिस तरह से आज, एलोपैथिक चिकित्सा चलन में है, तो उस दौर में चिकित्सा के क्षेत्र में आयुर्वेद का बोलबाला था। साथ ही प्राचीन भारत में दो प्रकार की चिकित्सा व्यवस्था हुआ करती थी। एक काय चिकित्सा और दूसरी शल्य चिकित्सा। जहां काय चिकित्सा के अंतर्गत दवाइयों का इस्तेमाल किया जाता है। तो वहीं 

शल्य चिकित्सा के माध्यम से किसी व्यक्ति की पीड़ा को शस्त्र और यंत्र तकनीक के द्वारा सही किया जाता है।

शल्य चिकित्सा के जनक थे ‘आचार्य सुश्रुत’

शल्य चिकित्सा को सामान्य भाषा में सर्जरी कहा जाता है। जिसका सूत्रपात आचार्य सुश्रुत ने किया था। इन्हें ही प्राचीन भारत में ‘सर्जरी का पितामह’ कहा जाता है। जिन्होंने आयुर्वेद के महान ग्रंथ ‘सुश्रुत संहिता’ की रचना की थी। इन्हें प्राचीन भारत का प्रथम शल्य चिकित्सक अर्थात् सर्जन भी कहा जाता है, यानि ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उस दौर में भी सर्जरी हुआ करती थी। 

सुश्रुत संहिता के बारे में आगे जानने से पहले हम आचार्य सुश्रुत के बारे में विस्तार से जानेंगे। तत्पश्चात् जानेंगे क्या है सुश्रुत संहिता?

आचार्य सुश्रुत का जन्म 6वीं सदी के दौरान काशी में हुआ था। जिनके गुरु स्वयं विष्णु अवतार धनवंतरी थे। इनके वंशज ऋषि विश्वामित्र थे। इन्होंने सुश्रुत संहिता का सूत्रपात किया था, जिसे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों में विशेष स्थान दिया गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार,  चिकित्सा संबंधी ज्ञान ब्रह्मा जी ने  प्रजापति को, प्रजापति ने अश्वनी कुमारों को और फिर ये ज्ञान देवराज इंद्र से मानव तक पहुंचा था। यहां तक आते-आते चिकित्सा पद्धति दो भागों में बंट गई थी। जिन्हें काय चिकित्सा और शल्य चिकित्सा कहा जाता है।

काय चिकित्सा के वैद्य के तौर पर, भारद्वाज, आत्रेय पुनर्वसु, अग्निवेश जाने जाते हैं और इस चिकित्सा पद्धति का प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता है। उधर, सुश्रुत संहिता को शल्य चिकित्सा के प्रमुख ग्रंथ के तौर पर जाना जाता है।

आचार्य सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता में शल्य यानि सर्जरी क्रिया का सूत्रपात किया था। इसके साथ ही वह शल्य चिकित्सा के अंतर्गत हड्डी की टूट को जोड़ने, मूत्र मार्ग के मार्ग से पथरी निकालने, प्रसव क्रिया और मोतियाबिंद आदि का भी इलाज किया करते थे। इतना ही नहीं, वर्तमान में जिस तरह से सर्जरी से पहले रोगी को बेहोश किया जाता है।

ठीक उसी तरह से, पहले भी मघपान आदि कराके रोगी को बेहोश किया जाता था, ताकि दर्द का एहसास न हो। इस विधि को संज्ञाहरण कहा जाता था।

आचार्य सुश्रुत का प्रेरक प्रसंग

आचार्य सुश्रुत के जीवनकाल का एक बड़ा ही प्रचलित प्रसंग है कि एक बार जब खून से लथपथ एक व्यक्ति आचार्य सुश्रुत के पास पहुंचा। तब उन्होंने उसे पानी में एक दवा मिलाकर मुंह धोने को कहा। उसके पश्चात् उसे मदिरा पीने को कहा। उस व्यक्ति की नाक कट गई थी और काफी खून बह चुका था।

जिस पर आचार्य सुश्रुत ने अनेक शल्य उपकरणों की मदद से उस व्यक्ति के गाल के  मांस का एक टुकड़ा काटकर नाक की जगह उपचारित कर दिया। उसके बाद उस कटे हुए गाल पर लाल चंदन का बुरादा और घुंघुची आदि का लेप लगा दिया। साथ ही उस व्यक्ति को नियमित तौर पर कुछ दवाइयों का सेवन करने को कहा।

इस तरह आचार्य सुश्रुत ने उस दौर में ही सर्जरी की तकनीक को विकसित कर दिया था, यही कारण है कि प्राचीन भारत को विश्व गुरु का दर्जा दिया जाता है।

जानिए, सुश्रुत संहिता के बारे में

सुश्रुत संहिता में विशेषकर शल्य चिकित्सा यानि सर्जरी से जुड़े यंत्र और शस्त्रों का वर्णन किया गया है। ये ग्रंथ पूर्णतया संस्कृत भाषा में लिखा गया है। जिसका 800 ईसा पूर्व में अरबी भाषा में ‘किताब-ए-सुस्त्रद’ नाम से अनुवाद हुआ था। इसको दो खंडों में बांटा गया है… पूर्वतंत्र और उत्तरतंत्र।

सुश्रुत संहिता के पूर्वतंत्र को कुल पांच भागों में बांटा गया है। जोकि निम्न है – सूत्रस्थान (46 अध्याय), निदानस्थान (16 अध्याय), शरीरस्थान (10 अध्याय), कल्पस्थान (8 अध्याय) और चिकित्सास्थान (40 अध्याय)।

साथ ही इसमें आयुर्वेद के शल्यतंत्र, अगदतंत्र, रसायनतंत्र, वाजीकरण समेत 120 अध्यायों का विस्तृत वर्णन किया गया है।

सुश्रुत संहिता के उत्तरतंत्र में आयुर्वेद के शालाक्य, कौमार्यभृत्य, काया चिकित्सा, भूतविद्या समेत 64 अध्यायों का वर्णन किया गया है। इसमें मुख्यता आंख, नाक, गला, सिर आदि से जुड़े रोगों का वर्णन शालाक्य तंत्र के अंतर्गत किया गया है। उत्तरतंत्र को औपद्रविक भी कहा गया है, क्योंकि इसमें बुखार, खांसी, पेचिस, हिचकी, खांसी, पीलिया, कुष्ठ रोगों आदि का भी जिक्र मिलता है।

सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के 125 उपकरणों का भी वर्णन मिलता है। जिनमें चाकू, सुइयां, चिमटी, कैंची आदि विशेष है। इस ग्रंथ में शल्य चिकित्सा से जुड़े करीब 101 यंत्रों के बारे में बताया गया है, जिसमें चीर फाड़ से जुड़े अनेकों यंत्रों की जानकारी दी गई है, जोकि लोहे से निर्मित होते थे और उनका आकार विशाल पशु पक्षियों के मुख के समान था।

इसके अलावा,

24 प्रकार के स्वास्तिक यंत्र (इनका आकार क्रॉस की तरह होता है। इन यंत्रों के नाम जानवरों और पक्षियों पर रखा गया है। इनका इस्तेमाल टूटी हड्डियों को बाहर निकालने के लिए किया जाता है। जैसे:- काकमुख, व्याघ्रमुख, सिंहमुख, मार्जारमुख, गृध्रमुख आदि।)

2 प्रकार के संदेश यंत्र (इन यंत्रों को त्वचा, मांस आदि को शरीर से बाहर निकालने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। ये देखने में संडासी सा लगता है।)

2 प्रकार के तालयंत्र (शरीर में मौजूद भिन्न प्रकार की हड्डियों के उपचार या जोड़ने आदि के लिए तालयंत्र जैसे यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे:- कान और नाक की हड्डी।

20 प्रकार के नाड़ी यंत्र (इनका आकार नली के समान होता है और ये अनेक प्रकार के उपचार के दौरान प्रयोग में लाए जाते हैं।)

28 प्रकार के शाल्का यंत्र (इन्हें सिलाई के तौर पर प्रयोग किया जाता है। ये शरीर के मांस को खोदने और भेदने के तौर पर प्रयोग में लाए जाते हैं।)

24 प्रकार के उपयंत्रों  (शल्य चिकित्सा के दौरान इन उप यंत्रों का भी इस्तेमाल किया जाता है।

इनके अतिरिक्त, सुश्रुत संहिता में अन्य 20 प्रकार के अनुशस्त्रों का वर्णन किया गया है। जोकि धातु, कांच, जानवरों के नाखून और लौह धातु के बने होते हैं।

इतना ही नहीं, इस ग्रंथ में ऑपरेशन और सर्जरी से जुड़ी 300 प्रक्रियाओं के बारे में भी बताया गया है। आचार्य सुश्रुत ने अपने ग्रंथ सुश्रुत में व्रर्णितगार का जिक्र भी किया है, जिससे तात्पर्य अस्पताल की साफ सफाई से था। यानि उस दौर में भी लोगों को संक्रमण आदि के बारे में जानकारी हुआ करती थीं।

सुश्रुत संहिता में घावों को सिलते समय विशेष सावधानी रखने को कहा गया है। जिसके लिए रेशम, बारीक सूत, पेड़ों की छाल आदि का प्रयोग किया जाता था। इस ग्रंथ में सैनिक उपचार के लिए भी युक्तसेनीय विधि का वर्णन किया गया है। साथ ही राजाओं के दरबार में कुशल वैद्यों के होने की बात लिखी हुई है।

सुश्रुत संहिता में मोतियाबिंद, प्रसव, कॉस्मेटिक सर्जरी, हड्डी की जोड़ टूट, मधुमेह, मोटापा, बाल रोग, दंत चिकित्सा, मनोरोग, कायाचिकित्सा, स्त्री रोगों से जुड़े समाधानों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। इस ग्रंथ में वर्णित है कि कैसे शल्य चिकित्सा के दौरान दर्द को कम करने के लिए मघपान और विशेष दवाइयां दी जाती हैं।

सुश्रुत संहिता में चिकित्सा के छात्रों को कैसे शल्य चिकित्सा का अभ्यास करना है, इसकी भी जानकारी दी गई है। चिकित्सा से जुड़े छात्रों को कैसे मोम के पुतलों, मरे हुए जानवरों, तरबूज, लौकी आदि का प्रयोग करके शल्य ज्ञान में बढ़ोतरी करनी है, इसको समझाया गया है।

सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के लिए 8 प्रकार के उपकरणों का जिक्र किया गया है, जिन्हें अष्टविध शस्त्रकर्म कहा गया है। जिनका नाम और प्रयोग निम्न है-

छेदन ( छेदने के लिए)

भेदन (भेदने के लिए)

लेखन (अलग करने के लिए)

वेधन (हानिकारक द्रव्य निकालने के लिए)

ऐषण (नाड़ी में घाव खोजने हेतु)

आहरण (हानिकारक पदार्थों को निकालने के लिए)

विस्त्रवण (द्रव्य निकालने के लिए)

सीवन (घाव जोड़ने या सिलने के लिए)

ऐसे में सुश्रुत संहिता आयुर्वेद के तीन प्रमुख ग्रंथों में से एक है। जिनमें 184 अध्यायों में 1120 रोगों, 700 दवाइयों, 64 खनिज स्रोतों से जुड़ी प्रक्रियाएं, 57 जंतु स्रोतों से जुड़ी प्रक्रियाएं, और 8 शल्य यंत्र वर्णित है।

इस प्रकार, सुश्रुत संहिता 6वीं सदी का एक महान ग्रंथ है। जिसका 9वीं से लेकर 10वीं सदी तक पश्चिमी देशों में काफी विस्तार हुआ था। यही कारण है कि ईरान के जाने माने चिकित्सक राजी ने सुश्रुत को महान चिकित्सक की उपाधि दी थी और तब से ही सुश्रुत संहिता शल्य चिकित्सा के प्रमुख ग्रंथ के तौर पर जाना जाने लगा।

आशा करते है आपको यह ज्ञानवर्धक जानकारी अवश्य पसंद आई होगी। ऐसी ही अन्य धार्मिक और सनातन संस्कृति से जुड़ी पौराणिक कथाएं पढ़ने के लिए हमें फॉलो करना ना भूलें।

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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