कश्मीरों पंडितों का दर्द बयां करती है कश्मीर फाइल्स

kashmir files reality

कश्मीरों पंडितों का दर्द बयां करती है कश्मीर फाइल्स, लेकिन न्याय के लिए और कब तक करना पड़ेगा कश्मीरियों को इंतजार?

जहां शिव, सरस्वती, ऋषि कश्यप हुए,

वो कश्मीर हमारा है…

जहां पंचतंत्र लिखा गया,

वो कश्मीर हमारा है….

ये उद्घोष आजादी पाने के लिए गड़ा गया है, लेकिन आजादी किससे? आजादी उससे जो ईश्वर और अल्लाह के बंदों में फर्क करते हैं, जो ईश्वर के बनाए इंसानों को काफिर (नास्तिक) समझते हैं,

आजादी उनसे जो महिलाओं को केवल और केवल उपभोग और इस्तेमाल करके फेंक देने की वस्तु समझते हैं। 

आजादी उनसे जो इस्लाम और जिहाद शब्द का इस्तेमाल अपने फायदों और गलत इरादों को पूरा करने के लिए करते हैं, और जो अल्लाह का खौफ दिखाकर मासूमों की जान लेने से भी नहीं कतराते।

आजादी उन लोगों से जिन्होंने देश की आजादी के बाद भारत के अभिन्न अंग कश्मीर को जिहादियत और इस्लामिक कट्टरता के खून से रंग दिया।

इतना ही नहीं, उन्होंने भी मुगल आक्रांताओं की भांति ये चाहा कि भारत की तरह कश्मीर को भी वे अपना गुलाम बना लेंगे। लेकिन जब कश्मीर के विद्वान जिन्हें आज हम कश्मीरी पंडित के नाम से जानते हैं,

उन्होंने सनातन संस्कृति छोड़कर इस्लाम धर्म अपनाने से मना कर दिया, यहां तक कि उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी त्यागने से मना कर दिया। तो उन लोगों ने नारा दिया कि या तो अपना धर्म बदलो, भागो या मर जाओ…

ऊपर अभी हमने जो आपको बताया ऐसा किसने कहा और क्यों कहा? आज हम इसके बारे में बात बाद में करेंगे। इससे पहले हम ये जान लेते हैं कि आखिर कौन है ये कश्मीरी पंडित! जिनके नरसंहार (Genocide) को ही कश्मीरी फाइल्स (Kashmiri files) फिल्म के जरिए दिखाया जा रहा है।

कश्मीरी फाइल्स के जरिए दर्शाया गया कश्मीरी पंडितों पर हुआ अत्याचार

Atrocities on Kashmiri Pandits depicted through Kashmiri Files

11 मार्च 2022 को रिलीज हुई एक फिल्म ने भारतवर्ष की जनता को पुन: उस नरसंहार के बारे में बताया। जिसके बारे में भारतीयों ने केवल सुना है…कभी देखा नहीं। इस फिल्म को देखने के बाद हर उस व्यक्ति की आंखों में आंसू हैं,

जिसका कश्मीरी पंडितों से कोई संबध रहा है, या नहीं भी रहा है, वह भी इस फिल्म को देखने के बाद यही कह रहा है कि…भारत माता की जय! कश्मीरी पंडितों को इंसाफ दो….

अब सवाल ये उठता है कि ये कश्मीरी फाइल्स कश्मीरी पंडितों पर हुए किस नरसंहार का इंसाफ दिलाने की मांग कर रही है…या इस फिल्म में दर्शाए गए दृश्य वास्तव में कश्मीरी पंडितों पर हुए नरसंहार को छू भी पाए हैं।

क्योंकि फिल्म में कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार का 1 प्रतिशत भी नहीं दिखाया गया है हमारे आज के इस लेख में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या है इस नरसंहार की कहानी जिसके पर्दे पर आने के बाद आज हर भारतीय कश्मीरियों को इंसाफ दिलाने की बात कर रहा है। तो चलिए जानते हैं।

उससे पहले हम कश्मीर फाइल्स को भारतवर्ष की वर्तमान पीढ़ी के समक्ष पर्दे पर दर्शाने वाले निर्देशक vivek agnihotri को धन्यवाद देंगे, और उन अभिनेताओं को भी इस फिल्म की सफलता के लिए बधाई। जिन्होंने कश्मीरी पंडितों का सच भारत के सामने दर्शाने का साहस दिखाया। 


कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की क्या है कहानी

19 जनवरी को कश्मीरी पंडित हर वर्ष दुःखद बहिर्गमन दिवस मनाते हैं। यानि कश्मीरी इतिहास का वो काला दिन… जब कश्मीरी पंडितों यानि हिंदुओं को इस्लाम कबूलने, पाकिस्तान में विलय कराने और शरिया कानून अपनाने पर जोर दिया जा रहा था।

ऐसा कश्मीर के अलगाववादी संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानि जेकेएलएफ और इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा किया जा रहा था। 

वो कश्मीर को आजाद भारत का हिस्सा नहीं मानते थे, उन्हें खुद को पाकिस्तानी कहना अधिक सहज लगता था। इसके पीछे कई राजनैतिक मंशाएं और कारण मौजूद हैं,

लेकिन अभी हम केवल कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर बात कर रहे हैं, जिसने ना केवल कश्मीरियों बल्कि भारतीयों को भी झंकझोर कर रख दिया था।

साल 1990 को 19 जनवरी की सर्द रात में कश्मीर स्थित मस्जिदों में एलान होने लगे कि कश्मीरी पंडित यानि काफिर कश्मीर से चले जाए, या इस्लाम कबूल कर लें।

इतना ही नहीं, पूरे कश्मीर में ये नारे गूंजने लगे… असि गछि पाकिस्तान बटव रोअस त बटनेव सान। अर्थात् यहां बनेगा पाकिस्तान, हिंदुओं के बगैर लेकिन उनकी औरतों के साथ। 

कश्मीर में रहने वाले हिंदू पंडितों के साथ इस्लाम कबूलने के लिए जोर जबरदस्ती की जाने लगी। उन्हें कश्मीर की घाटी छोड़ने को मजबूर किया गया। कश्मीरी पंडित जोकि शास्त्रार्थ में माहिर थे,

लेकिन उन्होंने कभी हथियार नहीं उठाए। जिस कारण इस्लामिक कट्टरपंथियों ने उन पर और उनकी महिलाओं पर बहुत अत्याचार किए। 

19 जनवरी के दिन मस्जिदों से बंदूके, गोला, बारूद और असलहें लेकर झुंड के झुंड कश्मीरी पंडितों के घरों में घुस गए। इतना ही नहीं कश्मीरी पंडितों के नामों की हिट लिस्ट तक तैयार की गई और चुन चुनकर उन्हें मार दिया गया।

वे लोग जो कश्मीर छोड़कर चले गए, किसी तरह उन्होंने अपनी जान तो बचा ली लेकिन अपनी मातृभूमि को दुबारा नहीं पा सके। 

यही कारण था कि 1990 के दशक में जहां कश्मीर में 2-3 लाख कश्मीरी पंडित रहा करते थे, वर्तमान में वहां केवल दो से ढाई हजार ही मौजूद है। जोकि धारा 370 के हटने से पहले खौफ में ही अपनी जिंदगी बसर कर रहे थे।

इस्लामिक कट्टरपंथ के लोगों ने कश्मीर के स्थानीय लोगों तक में जिनमें मुस्लिम भी शामिल थे, कश्मीरी पंडितों के खिलाफ नफरत भर दी। जिस कारण सालों से जिस पवित्र भूमि पर सब एक दूसरे के साथ रह रहे थे, वह एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए।

हालांकि कई लोगों ने कश्मीरी पंडितों को पलायन कराने में मदद की, लेकिन ये काफी नहीं था। कश्मीरी पंडित जो पलायन नहीं करना चाहते थे या नहीं कर पाए। उनमें पुरुषों और बच्चों को बहुत ही बेरहमी से मार दिया गया और उनकी औरतों के साथ जघन्य तरीके से बलात्कार को अंजाम दिया गया।

इतना ही नहीं, महिलाओं के शरीर को आरी तक से काटा गया, पुरुषों के मृत शरीर के साथ खिलवाड़ किया गया। उस दौरान कश्मीर में कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी, लेकिन हुकूमत इस्लामिक संगठन किया करते थे।

जिन्हें पाकिस्तान और उसके नेताओं का संरक्षण प्राप्त था। पाकिस्तान जोकि आजादी के बाद से ही कश्मीर को हथियाना चाहता था, क्योंकि कश्मीर ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति और पर्यटन का केंद्र स्थल है।

जिसकी देश में मौजूदगी जन्नत का एहसास कराती है, ऐसे में पाकिस्तान आज तक समय- समय पर कश्मीर का राग गाता आया है, लेकिन 1990 की जनवरी को जो हुआ, उसे शब्दों से बयां करना आसान नहीं है। 


कश्मीरी पंडितों पर जब ये जुल्म हो रहा था, तब किसी भी राजनैतिक दल ने उन्हें बचाने का साहस नहीं किया, यहां तक कि आज भी जब बात कश्मीरी पंडितों के पलायन या उनकी घर वापसी की आती है, तो सबके मुंह सिल जाते हैं।

ऐसे में कश्मीरी पंडितों की कश्मीर वापसी की राह इतनी आसान नहीं है, ऐसे में यदि हम वास्तव में कश्मीरी पंडितों को इंसाफ दिलाना चाहते हैं या उनकी दास्तां दुनिया को बताना चाहते हैं,

तो हमें आगे आकर कश्मीरी फाइल्स का समर्थन करना चाहिए और तब तक आवाज बुलंद करनी चाहिए…जब तक दुबारा ये कश्मीरी पंडित अपने घर वापिस नहीं चले जाते।

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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