Dharm Kya Hai – धर्म क्या है?

धर्म का अर्थ प्राय: “धारण करने योग्य धारणा से” लगाया जाता है। तभी कहा जाता है कि धारयति इति धर्म:। धर्म ही एक साधारण व्यक्ति को इंसान बनाता है। धर्म के विषय में कहा गया है कि…..

यतो Sअभ्युदयनि: श्रेयससिद्धि: स धर्म:।

तात्पर्य यह है कि धर्म जीवन की वह अनुशासित प्रक्रिया है, जिसमें मनुष्य को लौकिक प्रगति और आध्यात्मिक ज्ञान दोनों की ही प्राप्ति होती है।

प्राय: कहा जाता है कि समाज में मौजूद हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और बौद्ध आदि धर्म है। जबकि वास्तव में यह धर्म ना होकर एक संप्रदाय मात्र है। धर्म की अवधारणा इससे काफी अलग होती है। जिसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि धर्म का अर्थ किसी सम्प्रदाय विशेष के लिए युद्ध करना नही होता है, अपितु धर्म न्याय और सत्य को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है।

इस प्रकार, सम्पूर्ण संसार में जन्मे किसी भी व्यक्ति के जीवन में धर्म, अर्थ, काम, क्रोध और मोक्ष का मुख्य स्थान होता है। जिनमें से आज हम धर्म के बारे में जानेंगे।


धर्म का अर्थ

धर्म संस्कृत भाषा का शब्द है। जो धृ धातु से निर्मित हुआ है। जोकि इस धरती पर मौजूद समस्त प्राणियों को खुद में समेटे हुए है। यानि धर्म ही सम्पूर्ण विश्व के संतुलन को व्यवस्थित किए हुए है। मूल रूप से, अहिंसा, सदाचरण, सद्गुण, न्याय, सत्य, तप, स्वाध्याय, क्षमा, संतोष, शौच, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य आदि नियमों को अपने जीवन में उतारना ही धर्म को धारण करने के समान है। जिसकी परिकल्पना मनु ने भी की है-

धृति: क्षमा दमोSअस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम।।

तात्पर्य यह है कि धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रियां, बुद्धिमता, विद्या, सत्य, क्रोध आदि धर्म के दस लक्षण हैं।

स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने धर्म को उल्लेखित करते हुए कहा है कि…

अहिंसा परमो धर्म:

यानि अहिंसा ही मानव का परम धर्म है।

हालांकि धर्म क्या है? इस विषय पर अनेकों मत दिए गए हैं। लेकिन वास्तव में धर्म को परिभाषित करना सरल नहीं है। क्योंकि धर्म ना केवल एक शब्द है बल्कि यह एक संवेदना है और इसको समझना आत्मा को समझने जैसा है। परंतु धर्म के विषय में प्राचीन ऋषि मुनियों द्वारा कहे गए वाक्यांश को उचित ठहराया जा सकता है। उनके अनुसार, इस सम्पूर्ण संसार और उसमें रहने वाले प्राणी मात्र के हित में किए जाने वाले कर्म ही धर्म को परिभाषित करते हैं।


धर्म की विशेषताएं

धर्म में भरोसा और अलौकिकता का गुण विद्यमान होता है। साथ ही धर्म में एक व्यवस्था समाहित होती है। जिसमें कुछ निश्चित प्रतिमान भी मौजूद होते हैं। कहीं कहीं धर्मों में मान्यताओं, कर्म कांडों और पौराणिक कथाओं की मौजूदगी होती है। तो वहीं धर्म के कारण ही व्यक्ति के भीतर धार्मिक चेतना का विकास होता है।


धर्म की परिभाषा

डॉ राधाकृष्णन के अनुसार, धर्म की अवधारणा के अनुसार हिंदू संप्रदाय को मानने वाले उन प्रतिक्रियाओं को अभिव्यक्त करते हैं। जो मानव जीवन की उत्पत्ति करती है और उसे धारण करती है।

टेलर के अनुसार, धर्म से तात्पर्य किसी आध्यात्मिक शक्ति में भरोसा करने से है।

जॉनसन के अनुसार, धर्म प्राणियों, शक्तियों और वस्तुओं की अलौकिक व्यवस्था से संबंधित विश्वासों और व्यवहारों की अधिक या कम साम्यपूर्ण व्यवस्था है।

बोसांके के मुताबिक, जहां धर्म परायणता और भक्ति देखने को मिलती है, वही धर्म का प्रथम रूप दृष्टया हो जाता है।

होबेल के अनुसार, धर्म किसी अलौकिक शक्ति पर विश्वास का नाम है, जिसमें आत्मवाद और मानव सम्मिलित होता है।


धर्म के प्रकार

सनातन संस्कृति में मान्यता है कि जो व्यक्ति सुबह शाम की पूजा, चारों धाम की यात्रा, व्रत रखना, मकर संक्रांति पर दान दक्षिणा और 16 संस्कारों का विधिवत तरीके से पालन करता है, वह ही धर्म के रास्ते पर चलने योग्य है। यहां धर्म समेत अर्थ, काम और क्रोध इत्यादि जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं।

साथ ही हिंदु संप्रदाय में धर्म को मानव का मूल कर्तव्य बताया है। जिसके मुताबिक व्यक्ति को दूसरे के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। जैसा वह स्वयं के लिए चाहता है। इसके अलावा हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ महाभारत में भी भगवान श्री कृष्ण द्वारा धर्म की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मान् सृजाम्यहम्।।

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि जब जब धरती पर धर्म की ग्लानि होती है, तब तब मैं धरती पर अवतरित होता हूं।

स्वकर्मनिरतो यस्तु धर्म: स इति निश्चय:।

नित्य अपने कर्म में लगे रहना निश्चय ही धर्म है।

दण्ड धर्म विदुर्बुधा:।।

इस सम्पूर्ण संसार में ज्ञानी लोग दंड को ही धर्म मानते हैं।

सत्यं धर्मस्तपो योग:।

इस दुनिया में सत्य ही तप, योग और धर्म है।

उदार मेव विद्वांसो धर्म प्राहुर्मनीषिण:।।

उदार व्यक्ति उदारता को ही धर्म मानते हैं।

दातव्यमित्ययं धर्म उक्तो भूतहिते रतै:।

जो व्यक्ति सदैव लोगों के हित में लगा रहता है वह दान को ही धर्म मानता है।

हिंदुओं के पवित्र पुराणों में वर्णित कहानी के अनुसार, धर्म ने भगवान ब्रह्मा के दाहिने वक्ष से जन्म लिया था। जिसका विवाह महाराज दक्ष की 13 कन्याओं के साथ हुआ था। धर्म और अहिंसा के मिलाप से ही भगवान विष्णु उत्पन्न हुए। जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए धरती पर कई जन्म लिए।

वात्सायन के मुताबिक धर्म व्यक्ति के कर्म, वाणी, चिंतन और मन से संबंधित होता है।

जैन समुदाय में भी धर्म के 10 प्रकारों का वर्णन किया है:-

उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य, उत्तम ब्रह्मचर्य आदि।

बौद्ध संप्रदाय के लोग धर्म को गौतम बुद्ध द्वारा प्रदान की गई शिक्षा मानते हैं। उनके अनुसार धर्म का अर्थ सदाचार है।

अन्य धार्मिक स्रोतों के अनुसार, धर्म के दो रूप बताए गए हैं। जहां परमात्मा को धारण करना आत्मा का धर्म और माया को धारण करना शरीर का धर्म बताया गया है। जहां माया से तात्पर्य सांसारिक क्रिया कलापों में लिप्त रहना बताया गया है। जिसकी पुष्टि श्रीमद् भागवत में भी की गई है कि…..

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।।

हे मानव! तू प्रत्येक समय मेरा स्मरण कर। यानि भक्ति अवश्य कर और शरीर के धर्म का पालन भी अवश्य कर।

इस प्रकार हमारा यह लेख धर्म क्या है? यहीं समाप्त होता है। उम्मीद है आपको हमारा यह लेख पसंद आया होगा। ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए Gurukul99 पर दुबारा आना ना भूलें।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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