गुरु द्रोणाचार्य – Dronacharya in Mahabharat

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु: गुरु देवो महेश्वर:।
गुरुदेव परमब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:||

अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही भगवान शंकर है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं।

महाभारत महाकाव्य में भीष्म पितामह के बाद गुरु द्रोणाचार्य को सबसे अधिक प्राथमिकता दी गई है। गुरु द्रोणाचार्य महाभारत के पांडव भाइयों और कौरवों के शिक्षक के रूप में विख्यात हैं। इसके साथ ही यह एक श्रेष्ठ धनुर्धारी भी थे। इन्होंने महाभारत का युद्ध कौरवों की तरफ से लड़ा था। भीष्म की मृत्यु के बाद इन्हें कौरवों की सेना का सेनापति नियुक्त किया गया था।

द्रोणाचार्य की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनके एक शिष्य जिसका नाम एकलव्य था, उसने गुरु दक्षिणा के नाम पर द्रोणाचार्य को अपना अंगूठा काटकर दे दिया था। यह पांडव भाइयों में से सबसे अधिक अर्जुन को प्रेम करते थे और यही कारण था कि वह अर्जुन को संसार का श्रेष्ठ धनुर्धारी बनाना चाहते थे।

ऐसे में आज हम आपके लिए महाभारत के समस्त पात्रों की श्रृंखला में गुरु द्रोणाचार्य की जीवनी लेकर आए हैं। जिसे पढ़कर आप द्रोणाचार्य के बारे में अधिक विस्तार से जान सकेंगे।


गुरु द्रोणाचार्य का संक्षिप्त परिचय

नामद्रोण
जन्म स्थानगुडग़ांव
पिता का नाममहर्षि भरद्वाज
माता का नामघृताची नामक अप्सरा
उपाधिकौरवों और पांडवों के गुरु
गुरुपरशुराम
ज्ञाताअस्त्र शस्त्र और धर्नुविद्या में निपुण
परम शिष्यअर्जुन
श्रेष्ठ शिष्यअर्जुन, कर्ण, एकलव्य
परम मित्रराजा द्रुपद
वैवाहिक स्थितिविवाहित
जीवनसाथीकृपी
संतानअश्वत्थामा
महाभारत युद्ध में दायित्वकौरवों के प्रधान सेनापति
मृत्युराजा द्रुपद के बेटे धृष्टद्युम्न के हाथों मारे गए
आयु400 वर्ष
अवतारगुरु बृहस्पति

द्रोणाचार्य के जन्म की विचित्र कहानी – Drona’s Birth Story

हिंदू पुराणों में वर्णित एक धार्मिक कहानी के अनुसार, द्रोणाचार्य ने एक अप्सरा की कोख से जन्म लिया था। कहा जाता है कि द्रोणाचार्य के पिता महर्षि भरद्वाज एक बार एक नदी के समीप स्नान करने गए थे। उसी दौरान एक घृताची नामक अप्सरा नदी से स्नान करके बाहर निकली।

जिसे देखकर महर्षि भरद्वाज अपनी कामवासना को वश में ना रख सके। माना जाता है कि तभी महर्षि भरद्वाज और अप्सरा के मिलन से द्रोणाचार्य का जन्म हुआ था। इस प्रकार, द्रोण यानि दोने में जन्मे होने के कारण इनका नाम द्रोणाचार्य पड़ा। हालांकि इनका बचपन काफी गरीबी में व्यतीत हुआ था।

परन्तु  वह भगवान परशुराम के परम शिष्यों में से एक थे और उनसे ही इन्होंने अस्त्र – शस्त्र की विद्या अर्जित की थी। साथ ही इन्होंने अपने पिता ऋषि भरद्वाज से चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त किया था। जिसके कारण बहुत ही कम समय में यह वेदों के प्रकांड विद्वान और अस्त्र शस्त्र के जानकार के रूप में विश्व विख्यात हो गए थे।

द्रोणाचार्य ने बचपन में महाराज द्रुपद के साथ वेदों की शिक्षा ग्रहण की थी और वह इनके बाल सखा थे। लेकिन महाराज द्रुपद ने एक बार द्रोणाचार्य को दरिद्र कहकर उनका काफी अपमान कर दिया था। जिसके चलते द्रोणाचार्य ने महाराज द्रुपद से दूरियां बना ली थी और फिर वह अपनी जन्मस्थली उत्तरांचल को छोड़कर हस्तिनापुर चले आए थे।

द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपि से हुआ था। जिनसे ही द्रोणाचार्य को भगवान शिव और यमराज के आशीर्वाद से एक पुत्र अश्वत्थामा की प्राप्ति हुई थी।  महाभारत के युद्ध में गुरु द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा ने मिलकर पांडव सेना से मोर्चा लिया था।


द्रोण से कैसे बने गुरु द्रोणाचार्य – Drona to Dronacharya

द्रोणाचार्य जब हस्तिनापुर आए तब उनकी मुलाकात कौरवों और पांडवों से हुई थी। इन्होंने कौरवों और पांडवों के समक्ष अपनी अस्त्र विद्या का प्रदर्शन करके उन्हें प्रभावित कर दिया था। जिसके चलते भीष्म ने द्रोणाचार्य को सभी कौरवों और पांडव भाइयों का आचार्य नियुक्त कर दिया था।

साथ ही आगे चलकर द्रोणाचार्य को हस्तिनापुर का राजगुरु भी घोषित किया गया। इस प्रकार, गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में रहकर ही समस्त पांडव और कौरव भाइयों ने मिलकर घुड़सवारी, धर्नुविद्या, दिव्य शास्त्रों, वैदिक शिक्षा प्राप्त की थी।

एक बार की बात है कि जब द्रोणाचार्य ने अपने सभी शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही। तब उन्होंने सभी को एक पेड़ के सामने लाकर खड़ा कर दिया और कहा कि आप सभी को सामने पेड़ पर लटकी नकली चिड़िया की आंख पर निशाना लगाना है।

जिसके लिए उन्होंने एक एक करके कौरव और पांडव भाइयों को आगे बुलाया। लेकिन जब उन्होंने सबसे पूछा कि उन्हें निशाना लगाते समय क्या – क्या दिख रहा है तो सबने कहा कि उन्हें अपने भाई, जंगल, पेड़ आदि दिख रहे हैं। इन सबमें मात्र अर्जुन ऐसे थे जिन्होंने कहा कि उन्हें केवल चिड़िया की आंख दिख रही है।


अर्जुन का उत्तर सुनकर द्रोणाचार्य काफी प्रसन्न हुए और उसी वक्त, उन्होंने अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का वरदान दे दिया। हालांकि द्रोणाचार्य के आश्रम में उनका एक अन्य शिष्य हुआ करता था जिसका नाम एकलव्य था। जोकि धनुर्विद्या में अर्जुन से भी श्रेष्ठ था। लेकिन अर्जुन की श्रेष्ठता को बरकरार रखने के लिए द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य से उसका अंगूठा मांग लिया था।

दूसरी ओर, द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा को भी अपने शिष्यों की भांति अस्त्र – शस्त्र का ज्ञान दिया करते थे। जिसके बारे में जब अर्जुन को ज्ञात हुआ तब उन्होंने एक श्रेष्ठ शिष्य बनने के लिए काफी प्रयत्न किए। परिणामस्वरूप अर्जुन ने भी महाराज द्रुपद से गुरु द्रोणाचार्य के अपमान का बदला लिया था।

ऐसे में गुरु द्रोणाचार्य के लिए अपने सभी शिष्यों में से अर्जुन सदैव ही अद्वितीय रहे। इसके अतिरिक्त, गुरु द्रोणाचार्य कौरव और पांडवों के अलावा अष्ठावक्र, याज्ञवकल्य, कात्यायान और ऐतरेय आदि के भी गुरु थे।


जब पांडवों पर भारी पड़ गए थे गुरु द्रोणाचार्य – Dronacharya Pandavas Fight

महाभारत के युद्ध के दौरान जब भीष्म बाणों की शैय्या पर लेट गए थे। उसके बाद द्रोणाचार्य को कौरवों की सेना का प्रधान सेनापति चुना गया। जिसके बाद द्रोणाचार्य ने युद्ध भूमि पर युधिष्ठिर को घेरने के लिए चक्रव्यूह तैयार किया। जिसको सिर्फ भगवान श्री कृष्ण, अर्जुन और अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु तोड़ना जानते थे लेकिन अभिमन्यु चक्रव्यूह से निकलने में असमर्थ थे।

जिसके फलस्वरूप, अभिमन्यु ने अकेले ही कौरवों से युद्ध किया लेकिन चक्रव्यूह से बाहर ना निकल पाने के कारण द्रोणाचार्य और जयद्रथ समेत कौरवों के हाथों उसकी मृत्यु हो गई। ऐसे में अर्जुन ने अपने बेटे अभिमन्यु की मौत का बदला लेने के लिए भगवान श्री कृष्ण की मदद से जयद्रथ को मार दिया। हालांकि द्रोणाचार्य ने जयद्रथ को बचाने का पूर्ण प्रयास किया था लेकिन वह उसे बचा ना सके।

उसी दौरान द्रोणाचार्य के हाथों महाराज द्रुपद, उनके पौत्र और विराट की मौत हो जाती है। इतना ही नहीं, महाभारत युद्ध के समय द्रोणाचार्य ने ब्रह्मास्त्र अस्त्र का प्रयोग किया था। जिससे पांडवों की सेना को जान और माल का काफी नुकसान हुआ था।

ऐसे में क्रोधित द्रोणाचार्य को रोकने के लिए तीनों लोकों के देवताओं ने उनसे युद्ध छोड़ने का आग्रह भी किया था लेकिन द्रोणाचार्य ने किसी की एक ना सुनी। हालांकि यह सब जानते थे कि गुरु द्रोणाचार्य पांडवों को सबसे अधिक प्रेम करते थे और अर्जुन उन्हें सबसे अधिक प्रिय थे। लेकिन उन्होंने वचन बंधन के चलते महाभारत का युद्ध कौरवों की तरफ से नीतियों और चक्रव्यूह के आधार पर लड़ा था।


पुत्र मोह में द्रोणाचार्य ने त्यागे अपने प्राण – Dronacharya’s Death

युद्ध भूमि पर जब द्रोणाचार्य विकराल रूप धारण किए हुए थे। तब पांडव सेना के पास द्रोणाचार्य को हराने का कोई विकल्प मौजूद था। जिसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने छल पूर्वक द्रोणाचार्य को मारने की युक्ति पांडव भाइयों को बताई।

उस आधार पर, गदाधारी भीम ने द्रोणाचार्य को यह समाचार दिया कि युद्ध भूमि में उनका पुत्र अश्वत्थामा मारा गया है। द्रोणाचार्य ने जब यह समाचार सुना तब इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने युधिष्ठिर से पूछा कि क्या वास्तव में अश्वत्थामा जीवित नहीं बचा? जिस पर युधिष्ठिर ने धीरे से कहा कि हां अश्वत्थामा नामक हाथी मारा गया है।

क्योंकि वास्तव में भीम द्वारा मलाव नरेश इन्द्र वर्मा का अश्वत्थामा नामक हाथी मारा गया था लेकिन द्रोणाचार्य ने हाथी शब्द नहीं सुना और अपने शस्त्र छोड़ दिए। फिर द्रोणाचार्य यह कहकर ब्रह्मलोक की ओर बढ़ने लगे कि अब इस युद्ध का कार्यभार तुम लोगों के कंधों पर है। लेकिन जैसे ही वह अदृश्य होने लगे कि तभी द्रौपदी के भाई धृष्टदयुम्र ने उनके बाल पकड़कर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया।

इस दौरान अर्जुन ने विनती की। गुरु द्रोणाचार्य को मारो मत उन्हें जीवित ही ले जाओ। लेकिन महाराज द्रुपद द्वारा धृष्टदयुम्र को विशेषकर द्रोणाचार्य का वध करने के लिए ही अग्नि से उत्पन्न किया गया था। ऐसे में धृष्टदयुम्र द्वारा युद्ध के पंद्रहवें दिन गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु हो गई।

इस प्रकार, महाभारत युद्ध के समय द्रोणाचार्य की आयु करीब चार सौ वर्ष थी। जिनका पांडव भाइयों द्वारा बड़ी चतुराई से वध किया गया था। जबकि यह सर्वविदित था कि वचन के कारणवश उन्हें महाभारत युद्ध के समय कौरवों का साथ देना पड़ा।हालांकि द्रोणाचार्य का व्यक्तित्व काफी प्रशंसनीय था। यह एक श्रेष्ठ धनुर्धारी, वेदों में पारंगत और अस्त्र शस्त्र विद्या के ज्ञाता थे। साथ ही गुरु द्रोणाचार्य को गुरु बृहस्पति का अवतार भी माना गया है।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

2 thoughts on “गुरु द्रोणाचार्य – Dronacharya in Mahabharat”

  1. आपकी post काफी अच्छी है , पर कर्ण गुरु द्रोण के शिष्य नही थे, कृपया द्रोणाचार्य की एवं कृपाचार्य की आयु के बारे में विस्तृत जानकारी दें ।
    धन्यबाद
    विशाल

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    • अपना कीमती समय देकर हमारे इस लेख को पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद। हम जल्द ही इस लेख में विस्तार करने की कोशिश करेंगे।

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