Kalidas ki Jivani – About Kalidas in Hindi

कालिदास की जीवनी

कालिदास के विषय में कहा गया है कि…

पुरा कवीनां गणना प्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्ठित कालिदास:।
अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावादनामिकानाम सार्थवती बभूव।।

तात्पर्य यह है कि कालिदास जी को प्राचीन कवियों की श्रेणी में कनिष्ठा उंगली पर स्थान दिया गया है। और उनकी अनुपस्थिति में अभी तक कोई इतना सर्वश्रेष्ठ कवि पैदा नहीं हुआ। इसी कारण कनिष्ठा उंगली की अगली उंगली अनामिका का नाम सार्थक सिद्ध हो गया।

कालिदास हिंदी की आदि जननी संस्कृत भाषा के प्रख्यात कवि थे। जिन्होंने अभिज्ञान शाकुन्तलम जैसे अद्भुत ग्रंथ की रचना की थी। कालिदास राजा विक्रमादित्य के दरबार में नव रत्नों में शामिल थे। और उनके राज्य में श्रेष्ठ कवि हुआ करते थे। हालांकि कालिदास के जीवन को लेकर कई प्रकार के मत विद्यमान है। ऐसे में स्पष्ट रूप से इनके विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता।


कालिदास का जीवन परिचय

अनेक मतों के अनुसार, कालिदास का जीवनकाल 150 ईसा पूर्व से लेकर 634 ईसा पूर्व तक माना जाता है। और उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग का कविल्ठा गांव इनकी जन्मस्थली कही जाती है। जहां इन्होंने अपना बचपन बिताया था। हालांकि इनके माता पिता के बारे में भी अभी तक कुछ ज्ञात नहीं हो सका है।

जिसके चलते यह माना जाता है कि कालिदास अनाथ थे। और एक ग्वाल वाले ने इनकी देखभाल की थी। तो वहीं कालिदास जी पढ़े लिखे भी नहीं थे। लेकिन जीवन के उत्तरार्ध में इन्होंने साहित्य और काव्य के क्षेत्र में महारथ हासिल कर ली थी। तो वहीं कुछ विद्वान कालिदास को उज्जैन का निवासी भी मानते हैं।

क्योंकि कालिदास ने अपने ग्रंथ मेघदूत में उज्जैन शहर का काफी बार जिक्र किया है। इसके अलावा कालिदास का विवाह राजकुमारी विघोत्मा से हुआ था। जिन्होंने अपने विवाह से पहले यह शर्त रखी थी कि जो विद्वान उन्हें शास्त्रार्थ में पराजित कर देगा। वह उसी से विवाह कर लेंगी। ऐसे में राजकुमारी विघोत्मा ने जब शास्त्रार्थ के विषय में कालिदास से प्रश्न पूछे।

तो कालिदास ने उनके जवाब काफी अच्छे से दिए। जिससे राजकुमारी विघोत्मा कालिदास से काफी प्रभावित हुई। और उन्होंने उनसे विवाह के लिए हां कर दी। विवाह के कुछ समय पश्चात राजकुमारी विघोत्मा को मालूम पड़ा कि कालिदास अनपढ़ हैं। तो वह उनको छोड़ कर चली गई। जिससे आहत होकर कालिदास ने विद्वान बनने की ठानी।

इसी दौरान कालिदास ने पूर्ण निष्ठा के साथ मां काली की वंदना की। जिनके आशीर्वाद से कालिदास ने वेद, साहित्य और काव्य का अध्ययन किया। और वह एक परम विद्वान के रूप में जाने गए। कालिदास जब पूर्ण रूप से विद्वान बन गए तब वह अपनी पत्नी विघोत्मा के पास पहुंचे।

जहां उन्होंने अपनी पत्नी को गुरुमाता कहकर संबोधित किया। क्योंकि कालिदास का मानना था कि राजकुमारी विघोत्मा के धिक्कार करने पर ही वह विद्वान व्यक्तियों की श्रेणी में प्रथम स्थान पा सके हैं। लेकिन राजकुमारी विघोत्मा अपने पति के मुख से गुरुमाता शब्द सुनकर नाराज हो गई।

और उन्होंने कालिदास को श्राप दिया कि भविष्य में उनकी मृत्यु का कारण एक स्त्री होगी। दूसरा, जब कालिदास की पत्नी ने उन्हें एक बार पूर्ण विद्वान कहा था। कहते हैं उसी दौरान कालिदास ने कुमार सम्भवम्, मेघदूत और रघुवंश जैसे महान् ग्रंथों की रचना की थी।

महाकवि कालिदास की मृत्यु के विषय में कहा जाता है कि जब वह उज्जैन नगरी में वेश्याओं के साथ रहा करते थे। तब वहां एक वेश्या ने लोभ के वशीभूत होकर कालिदास के प्राण ले लिए थे। तो वहीं अन्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक शुक्ल की एकादशी को कालिदास ने 95 वर्ष की आयु में अपने प्राण त्याग दिए थे।


कालिदास की रचनाएं

कालिदास प्रथम ईसवी से लेकर तृतीय ईसवी तक के श्रेष्ठतम कवि थे। और आज भी इनके जैसा विलक्षण कवि दूसरा नहीं जन्मा है। इन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में कुल 40 रचनाएं लिखी थी। जिनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं – अभिज्ञान शाकुन्तलम, विक्रमोवशीर्यम्, पुष्पबाण विलासम्, मालविकाग्रिमित्रम्, उत्तर कालामृतम्, श्रुतबोधम्, श्रृंगार तिलकम्, श्रृंगार रसाशतम्, सेतुकाव्यम्, कर्पूरमंजरी, पुष्पबाण विलासम्, श्यामा दंडकम्, ज्योतिर्विद्याभरणम्, तुसंहराम्, कुमार संभवम् आदि।

कालिदास का प्रथम नाटक मालविकाग्रिमित्रम् था। जिसमें इन्होंने अग्निमित्र नामक एक राजा और उनकी दासी मालविका की प्रेम कहानी का काफी रोचकता पूर्ण तरीके से वर्णन किया है। इसके अलावा अभिज्ञान शाकुन्तलम इनका सुप्रसिद्ध नाटक है। जोकि अंग्रेजी और जर्मन भाषा में भी मौजूद है।

उपरोक्त नाटक में कालिदास ने राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी का जिक्र किया है। साथ ही कालिदास द्वारा लिखित मेघदूत खंडकाव्य भी काफी प्रचलित है। जिसमें इन्होंने पति और पत्नी के बीच प्रेम को दर्शाया है। रघुवंश नामक महाकाव्य में कालिदास ने रघुवंशी राजाओं के बारे में बताया है।

जिसमें भगवान श्री राम और माता सीता का जीवन चरित्र भी दर्शाया गया है। कुमारसम्भवम् में भगवान शिव और पार्वती माता के विवाह का वर्णन किया गया है। साथ ही ऋतुसंहार में कालिदास जी ने प्रौढ़ता के अभाव का वर्णन किया है। कालिदास द्वारा रचित अंतिम नाटक विक्रमोवशीर्यम् था। जिसमें राजा पुरुरवा और उर्वशी नामक अप्सरा के बारे में बताया गया है।


कालिदास का काव्यगत सौंदर्य

कालिदास को रीतिकाल का महान् कवि माना जाता है। इन्होंने अपने काव्य में सदैव ही श्रृंगार रस का प्रयोग किया। साथ ही इनकी रचनाओं में सरल और अलंकार रूपी मधुर भाषा का प्रयोग देखने को मिलता है।
इन्होंने सदा ही अपने साहित्य को संगीत से जोड़कर लिखा।

और इनकी रचनाओं में प्रारंभ से ही नैतिक आदर्शों और मूल्यों की गरिमा पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा। कालिदास जी की रचनाओं में विशेषकर उपमाओं की अधिकता होती है। इसी कारण से इनकी रचनाओं को लोगों द्वारा काफी पसंद किया गया। और तभी से कालिदास भारत के राष्ट्रीय कवि के रूप में स्थापित हो गए।


कालिदास से जुड़े रोचक तथ्य

कालिदास की रचनाओं के आधार पर उनके जीवनकाल का अंदाज़ा लगाया जाता है। इस प्रकार, उनके प्रथम नाटक मालविकाग्रिमित्रम् में उन्होंने जिस राजा अग्निमित्र का उल्लेख किया है। वह 170 ईसा पूर्व शासन किया करते थे।

तो वहीं हर्षवर्धन के राज्यकाल में मौजूद बाणभट्ट द्वारा रचित हर्ष चरितम् में भी कालिदास का जिक्र किया गया है। और इसी समाय पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में भी कालिदास के बारे में बताया गया है। इसी कारण कालिदास को गुप्तकाल में जन्मा व्यक्ति कहा जाता है।

कालिदास के सम्मान में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा हर साल ” कालिदास सम्मान ” कला के क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों को दिया जाता है। जिसकी शुरुआत सबसे पहले साल 1980 में हुई थी।

यह एक कवि होने के साथ साथ ज्योतिष भी थे। जिनकी उत्तर कलामृतम् नामक रचना में इन्होंने ज्योतिष विद्या का रहस्य समझाया है। इनके सम्मान में उत्तराखंड स्थित कविल्ठा गांव में इनकी एक प्रतिमा लगाई गई है। और वहां मौजूद एक सभागार में हर वर्ष कालिदास के सम्मान में साहित्यिक गोष्ठी मनाई जाती है।

कालिदास के जीवन से जुड़ा एक किस्सा काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि जब कालिदास 18 साल के थे। तब एक पेड़ की डाली पर बैठकर वह उसी पेड़ की डाली को काट रहे थे। इसलिए उन्हें मंद बुद्धि तक कहा जाता था।

कालिदास के जीवन पर हिंदी के जाने माने लेखक मोहन राकेश का एक नाटक आषाढ़ का एक दिन काफी प्रसिद्ध है। दूसरा सुरेन्द्र वर्मा नामक लेखक ने भी कालिदास के संघर्षशील जीवन पर एक नाटक लिखा है। डॉ. कृष्ण कुमार नाम के लेखक ने भी कालिदास के गृहस्थ जीवन से जुड़ा एक नाटक लिखा है। जिसका नाम अस्ति कश्चित वागर्थीयम है। इतना ही नहीं कालिदास की लोकप्रियता को साबित करने के उद्देश्य से दक्षिण भारतीय भाषाओं उड़िया, कन्नड़ इत्यादि में फिल्में भी बनी है।

इस प्रकार, कालिदास जी ना केवल राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत एक महान् कवि थे। बल्कि संस्कृत भाषा के प्रखंड विद्वान भी थे। इसलिए इन्हें संस्कृत का शेक्सपियर भी कहा जाता है। साथ ही काव्य और नाटक दोनों ही विधाओं में इनकी अद्भुत प्रतिभा का लोहा सम्पूर्ण विश्व मानता है।

और यह समस्त भारतीय कवियों के कुल गुरु भी कहे जाते हैं। ऐसे में हम कह सकते हैं कि कालिदास जी ने अपनी काव्य रचनाओं से प्रत्येक व्यक्ति के ह्रदय में अपने लिए विशेष जगह बनाई और इसी कारण से वह विश्व भर में एक महाकवि के रूप में विख्यात हो गए।

माता सरस्वती ने भी कालिदास की प्रशंसा में कहा है कि हे प्रिय वत्स! तुम और मैं दोनों एक जैसे हैं।


Kalidas ki Jivani – एक दृष्टि में

नाम कालिदास
नाम का स्रोतमां काली का सेवक, शिवभक्त
जन्म दिवसगुप्त काल
पत्नीराजकुमारी विद्योत्मा
लोकप्रियता संस्कृत भाषा के कवि और नाटककार
रचनाएं अभिज्ञान शाकुन्तलम, विक्रमोवशीर्यम् मालविकाग्रिमित्रम्, उत्तर कालामृतम्, श्रुतबोधम्, श्रृंगार तिलकम्, श्रृंगार रसाशतम्, सेतुकाव्यम्, कर्पूरमंजरी, पुष्पबाण विलासम्, श्यामा दंडकम्, ज्योतिर्विद्याभरणम्
मृत्यु श्राप के कारण

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