विवाह का महत्व – समाज में शादियां क्यों होती है?

जीवन की शुरुआत से ही हम मानव के दो रूप नर और नारी से परिचित हैं। जहां प्राचीन समय में पुरुषों को घर से बाहर शिकार और भोजन इत्यादि के प्रबंध के लिए जाना पड़ता था तो वहीं नारियां घर पर रहकर ही पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करती थीं। साथ ही हमारे समाज में शुरू से नारी को प्रेम, त्याग और ममता की मूरत कहा गया है।

ऐसे में नर और नारी प्रारंभ से ही एक दूसरे के पूरक माने गए हैं और जैसे-जैसे मानव सभ्यता विकसित होती चली गई। वैसे वैसे स्त्री और पुरुष ने मिलकर परिवार नाम की संस्था प्रारंभ की। जिसके अंतर्गत पहले तो स्त्री और पुरुष समूह बनाकर जीवन बसर करते थे।

फिर जब मनुष्य ने प्रकृति प्रदत्त चीज़ों पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। तब उसके मन में एकल अधिकार की वृत्ति ने जन्म लिया। धीरे धीरे यही वृत्ति स्त्रियों के संबंध में भी लागू होने लगी और हम कह सकते है यहीं से समाज में विवाह की प्रथा प्रचलित हुई। हालांकि प्राचीन स्रोतों के आधार पर मिली जानकारी के अनुसार विवाह प्रथा को लेकर कई सारी मान्यताएं और कहानियां है, जिनके बाद ही विवाह को समाज के सभी लोगों के लिए लागू कर दिया गया। इसके पीछे कई सारे सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और कानूनी तर्क भी प्रस्तुत किए गए हैं।

विवाह का अस्तित्व

प्राचीन समय में जब नर और नारी खानाबदोशों की भांति जीवन व्यतीत किया करते थे। तब माना जाता है कि मानव का मस्तिष्क इतना विकसित नहीं हुआ था कि वह भविष्य के बारे में अधिक सोच सकें। साथ ही वह सोच सके कि यदि वह अपनी जाति को बनाए नहीं रखेगा तो उसका उन्मूलन हो जाएगा।

ऐसे में उस समय स्त्री और पुरुष पूरक बनकर बस एक दूसरे की जरूरतें पूरी किया करते थे परन्तु समय बदलने के साथ मनुष्य को यह एहसास होने लगा कि धीरे धीरे उसकी मानवीय ताकत क्षीण होने लगी है। ऐसे में उसे अपनी पीढ़ी को बढ़ाने की आवश्यकता है।

कहते है इसी उद्देश्य के लिए विवाह प्रथा समाज में प्रचलित हुई होगी। तो हम कह सकते है कि मानव अपने जीवन में आत्म संरक्षण पाने के लिए विवाह के बंधन में बंधने लगा था। साथ ही उसे अंदाज़ा हो गया था कि यदि वह स्त्री से मात्र क्षणिक संबंध बनाए रखेगा तो उसके अस्तित्व का नाश हो जाएगा तो वहीं प्राचीन समय में समाज में बलशाली पुरुषों का वर्चस्व था। जोकि कमजोर स्त्रियों पर अपना अधिकार जमाया करते थे। ऐसे में स्त्रियों के पालन पोषण और उनके आत्मसम्मान की सुरक्षा की दृष्टि से भी समाज में विवाह प्रथा का प्रचलन हुआ होगा। 

विवाह के प्रकार

प्राचीन समय में विवाह के कई प्रकार हुआ करते थे। जिनकी पुष्टि धार्मिक किताबों और स्रोतों के माध्यम से हुई है।

1. ब्रह्म विवाह – समाज में प्रचलित इस विवाह प्रथा के अंतर्गत वर को विवाह के लिए अपनी योग्यता साबित करनी होती थी। इसके लिए उस समय राजा जनक द्वारा माता सीता के लिए शिव धनुष को तोड़ने वाले भगवान राम को सुयोग्य वर घोषित किया गया था। तो वहीं महाभारत काल में अर्जुन द्वारा मछली की आंख पर तीर मारकर उनका विवाह द्रोपदी के साथ हुआ था।


2. देव विवाह – समाज में प्रचलित इस विवाह के अंतर्गत कन्या को यह अधिकार होता था कि वह अपना वर चुन सकती है। इसके लिए उदाहरण के तौर पर, सावित्री और सत्यवान का विवाह, शिव – पार्वती का विवाह, लक्ष्मी और विष्णु का विवाह इत्यादि हैं।


3. आर्श विवाह – इस विवाह के अंतर्गत दोनों पक्षों की मंजूरी के बाद कन्या पक्ष को कन्या के बदले में धन दौलत इत्यादि दी जाती थी। उदाहरण के तौर पर, तिरुपति बालाजी और पद्मनी का विवाह इसी प्रकार का विवाह था।


4. प्रजा पत्य विवाह – उपयुक्त विवाह प्रथा के अंतर्गत कन्या के पिता कन्या की मर्जी के बिना उसका विवाह करा देते हैं। जैसे, कृष्ण और जामवंती का विवाह और कृष्ण और सत्यभामा का विवाह आदि।


5. गंधर्व विवाह – जब वर और कन्या बिना परिवार वालों की सहमति के धार्मिक रीति रिवाजों के आधार पर विवाह कर लेते हैं तो उसे गंधर्व विवाह कहते हैं।  उदाहरण के लिए, श्री कृष्ण और रुक्मणि, सुभद्रा और अर्जुन का विवाह, भीम और हिडिंबा का विवाह इत्यादि।


इसके अलावा प्राचीन समय में समाज में बुरी शक्तियां भी प्रभावी थी। जोकि समाज में बुराई का प्रसार करती थीं। जिसमें असुर विवाह, राक्षस विवाह और पैशाच विवाह विशेष हैं। वर्तमान परिदृश्य में, अंतर्जातीय विवाह, अंतरधार्मिक विवाह, कानून की देख रेख में विवाह, प्रेम विवाह, विधवा विवाह, बाल विवाह, बहु विवाह इत्यादि होते हैं।

विवाह के संबंध में प्राचीन धारणाएं

शास्त्रों में वर्णित जीवन के चार आश्रमों में गृहस्थ आश्रम का सीधा सम्बन्ध विवाह से होता है। जिसके अंतर्गत स्त्री और आने वाली पीढ़ी के भरण पोषण के लिए विवाह को अनिवार्य बताया गया है। इतना ही नहीं संपत्ति का उत्तराधिकारी भी समाज में वैध विवाह से उत्पन्न संतान को बनाया जाता है।

मनुस्मृति के अनुसार, विवाह कन्या को पत्नी बनने का अधिकार देता है। साथ ही यह धार्मिक रीति रिवाजों के आधार पर संपन्न किया जाने वाला एक संस्कार है। 

फ़िनलैंड के दार्शनिक वैस्टरमार्क के अनुसार, विवाह पुरुषों को एक या एक से अधिक स्त्री के साथ संबध बनाने और संतान उत्पत्ति का अधिकार देता है।

हालांकि कई बुद्धिजीवियों के अनुसार विवाह स्त्री और पुरुषों के बीच कामाचार की स्थिति को दर्शाता है लेकिन चार्ल्स डार्विन ने विवाह को संरक्षण की दृष्टि से देखा और परिभाषित किया।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि विवाह सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक रूप से मान्यता प्राप्त संबंध है। जिसे मनुष्य को जीवन की अंतिम सांस तक निभाना होता है। 

सनातन धर्म में विवाह संबंधी नियम

कहा जाता है कि भारत में सर्वप्रथम उद्धालक नामक ऋषि के पुत्र श्वेतकेतु ने विवाह की मान्यता को शुरू किया था। उन्होंने मर्यादा की रक्षा के लिए विवाह प्रणाली प्रारंभ की थी। हालांकि भारत प्रारंभ से ही अनेकों धर्मों और रीति रिवाजों को मानने वाले लोगों का देश माना जाता रहा है।

ऐसे में विवाह के संबंध में यहां अलग अलग तौर तरीके और नियम देखने को मिलते है लेकिन सनातन धर्म में विवाह संबंधी कार्य को अनेकों धार्मिक रीति रिवाजों के माध्यम से सम्पन्न किया जाता है। साथ ही इसे हिंदुओं के सोलह संस्कारों में से एक माना गया है।

यह हिन्दू धर्म का त्रयोदश संस्कार है। वहीं दूसरी ओर सनातन धर्म में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति जन्म के समय से ही तीन ऋणों में बंधा है। देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण।जिनमें से पितृ ऋण की पूर्ति विवाहित स्त्री से उत्पन्न संतान से होती है। इतना ही नहीं शास्त्रों के अनुसार, विवाह के बाद उत्पन्न पुत्र बारह पूर्वजों और अवरणों को पवित्र करता है।

हिन्दू धर्म में विवाह शब्द से तात्पर्य विशेष रूप से उतरदायित्व को वहन करने से लगाया जाता है। इतना ही नहीं हिन्दू धर्म में विवाह को दो आत्माओं का मिलन कहा जाता है। साथ ही हिन्दू रीत में समान गोत्र में विवाह निषेध माना जाता है और कुंडली मिलाकर ही विवाह तय किया जाता है।

विवाह के समय वर का यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता था। इसके बाद विवाह से पहले तिलक, हल्दी लेपन और द्वार पूजन किया जाता है। तो वहीं विवाह के समय कन्या पक्ष की तरफ से कन्यादान की विधि संपन्न की जाती है। जिसका तात्पर्य होता है कि कन्या के माता पिता अपनी बेटी का उत्तरदायित्व ससुराल पक्ष को सौंपते हैं। तत्पश्चात् पाणिग्रहण, ग्रांथिबंधन, सात प्रतिज्ञाएं, शिलारोहण, सप्तपदी, मंगल तिलक इत्यादि रस्म अदा की जाती हैं।

विवाह के समय सात फेरों का महत्व

सनातन धर्म में विवाह के समय वर और वधू अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेते हैं। ऐसे में हिरण्य, कनका, रक्ता, अरक्ता, सुप्रभा, बहुरूपा, सती इत्यादि अग्नि के सातों रूप हैं। इसके साथ ही शादी के सात वचन वर और वधू के बीच सात वचन के लिए पढ़े जाते हैं। जिसके पहले वचन में कन्या अपने पति के साथ तीर्थ यात्रा में हमेशा साथ देने का वचन लेती है।

दूसरे वचन में कन्या वर से यह वचन मांगती है कि जैसे तुम अपने माता पिता का सम्मान करते हो वैसे ही मेरे माता पिता का सम्मान करना।

तीसरे वचन में वह जीवन की तीनों अवस्थाओं में एक दूसरे का साथ देने का वचन देते हैं।

चौथे वचन में कन्या वर से पारिवारिक जिम्मेदारी वहन करने का वचन लेती है।

पांचवें वचन में घर को सुचारू रूप से चलाने में कन्या की बात सुनने का वचन दिया जाता है।

छठे वचन में कन्या वर से सदैव उसके आत्म सम्मान को बनाए रखने का वचन लेती है।

अन्तिम और आखिरी वचन में कन्या वर से सदा उसके जीवन में साथ देने का वचन लेती है।

इसके साथ ही सात वचन सात अभिवादन के लिए भी जानी जाती है। जिसमें वर और वधू से यह आशा की जाती है कि वह माता, पिता, गुरु, ईश्वर, सूर्य, अग्नि, अतिथि आदि का सम्मान करेंगे और वैवाहिक जीवन को सफल बनाएंगे।

विवाह के बाद लड़की को ससुराल क्यों जाना पड़ता है?

हमारा समाज शुरुआत से ही पुरुष प्रधान रहा है। जहां परिवार को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने की जिम्मेदारी सदैव पुरुषों के कंधे पर रही है। तो वहीं हमारे वैदिक ग्रंथों में मान्यता है कि स्त्री अपना जीवन वहीं बसर करती है जहां उसका पति निवास करता है।

ऐसे में पुरुष जहां काम करता है स्त्री सदैव से ही वहीं रहती आई है। उधर लड़की के मां बाप भी कन्यादान को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए पूर्ण कर देते हैं। साथ ही प्रत्येक माता पिता अपने बेटों को अपने बुढ़ापे का सहारा मानते हुए उसके साथ ही रहते है तो अब प्रारंभ से ही लड़की को अपने पिता का घर छोड़कर अपने पति के घर रहना पड़ता है। तब से ही शादी के बाद लड़की लड़के के घर आती है और प्रायः लड़की को लड़के के उपनाम को अपनाना होता है।

वर्तमान समाज में विवाह का स्वरूप

पहले जहां समाज में बाल विवाह, बहु विवाह आदि प्रचलित था लेकिन समय के साथ साथ इस प्रकार के विवाह को अवैध घोषित कर दिया गया। साथ ही विवाह के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और कानूनी महत्व को रेखांकित करते हुए उसे सभी के लिए आवश्यक बना दिया गया।

हालांकि समाज में कई लोग विवाह को जरूरी नहीं मानते हैं लेकिन अधिकतर लोग आयु रहते विवाह को तब्ज़्ज़ों देते हैं। ऐसे में वर्तमान समय में विवाह का मुख्य आधार आर्थिक हो गया है। जहां वर को उसकी जेब के अनुसार ही वधू मिलती है तो वहीं अब समाज की लड़कियां स्वयं अपनी पसंद का वर चुनने के लिए स्वतंत्र है।

कहीं कहीं विवाह में कन्या को भेंट स्वरूप जो वस्त्र, गहने और रुपए दिए जाते हैं उसे दहेज के लोभी अपना अधिकार मानने लगे हैं जबकि एक वर्ग दहेज के सख्त खिलाफ है। आजकल की पीढ़ी अंतर जातीय और अंतर धार्मिक विवाह से भी परहेज़ नहीं करती है। साथ ही आजकल प्रेम विवाह अत्यधिक चलन में है। ऐसे में कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में विवाह संबंधी रीति रिवाजों को मानने का दौर पुराना हो चला है। आधुनिक समय में विवाह फैशन का एक पर्याय मात्र रह गया है।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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