धर्मराज युधिष्ठिर – Yudhishthir

Yudhishthir in Mahabharat

धर्मराज युधिष्ठिर के बारे में

महाभारत पात्रों की तुलना में आज हम धर्मराज युधिष्ठिर के बारे में बात करेंगे। धर्मराज युधिष्ठिर पांडव भाइयों में सबसे ज्येष्ठ थे। वह सदैव ही अपने सत्य वचन और धर्म के प्रति निष्ठा के लिए जाने जाते हैं। साथ ही इन्हें यम का अवतार भी माना गया है। महाभारत युद्ध के पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी बनाया गया। ऐसे में आज हम युधिष्ठिर के जीवनकाल से रूबरू होंगे।

धर्मराज युधिष्ठिर का संक्षिप्त परिचय

नामयुधिष्ठिर
जन्म स्थानहस्तिनापुर
पिता का नामपांडु
माता का नामकुंती और माद्री
भाईभीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव
गुरुद्रोणाचार्य
वैवाहिक स्थितिविवाहित
जीवनसाथीद्रौपदी और देविका
संतानप्रतिविन्ध्य, धौधेय
निपुणधर्म के ज्ञाता और भाला के जानकार
अज्ञातवास में पहचानकंक नाम अक्ष क्रीड़ा कुशल ब्राह्मण
राज्यहस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ
राज्यकाल2964 ईसवी पूर्व

यम देवता के आशीर्वाद से जन्मे थे युधिष्ठिर

महाराज पाण्डु और माता कुंती को यम देवता के आशीर्वाद से युधिष्ठिर की प्राप्ति हुई थी। यह चारों पांडव भाइयों में सबसे बड़े थे। इनके जन्म के समय यह भविष्यवाणी हुई थी कि यह आगे चलकर यह सत्यता, नम्रता, सहनशीलता, दयालुता, धर्म के रक्षक के तौर पर जाने जाएंगे।

वह बचपन से ही काफी शांत और शालीन स्वभाव के थे। इन्होंने गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में रहकर ही अस्त्र शस्त्र और वेदों की शिक्षा ग्रहण की थी। साथ ही वह सदैव ही कौरव और पांडव भाइयों के बीच मैत्री संबंध बनाए रखने की कोशिश किया करते थे।

हालांकि पांडव और कौरव भाइयों में ज्येष्ठ होने के बाद भी इन्हें कभी राज्य का लोभ ना आया। परन्तु जब बात हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ के उत्तराधिकारी की हुई। तब सदैव ही युधिष्ठिर ने अपनी योग्यता और कर्मों के बल पर दोनों ही राज्यों का कुशलता पूर्वक नेतृत्व किया।

युधिष्ठिर ने अपने शासनकाल में दो बार अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। इस दौरान उन्होंने सदैव ही राष्ट्रीय एकता और भाईचारे का संदेश चहु ओर फैलाया। युधिष्ठिर ने अपने जीवन काल में नैतिक गुणों को अपनी विजय का आधार बनाया। यही कारण है कि हम युधिष्ठिर को एक क्षमाशील, दयावान, नीतिपरक, गुणवान, सत्यवान और एक आदर्श राजा के रूप में जानते हैं।


द्रौपदी और देविका से हुआ था विवाह

युधिष्ठिर का विवाह समस्त पांडव भाइयों की तरह द्रौपदी से भी हुआ था। जिनसे इन्हें प्रतिविन्ध्य नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी। कहते है एक बार जब धर्मराज युधिष्ठिर द्रौपदी के समय अकेले में समय व्यतीत कर रहे थे कि तभी अर्जुन वहां आ गए थे। जिस कारण अर्जुन को वनवास काटना पड़ा था। धर्मराज युधिष्ठिर का दूसरा विवाह राजा शैव्य की पुत्री देविका से हुआ था। जिनसे इन्हें धौधेय नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी।


युधिष्ठिर के आदर्श व्यक्तित्व के उदाहरण

युधिष्ठिर ने हमेशा अपने कार्यों, विचारों और संस्कारों के आधार पर समाज में अपनी अलग पहचान बनाई। जब शत्रु ने युधिष्ठिर से शत्रुता निभाई तब भी युधिष्ठिर ने अपने कर्मों में सदैव मित्रता का ही भाव रखा। एक बार की बात है जब दुर्योधन को गंधर्वो ने बंदी बना लिया था।

तब युधिष्ठिर के कहने पर ही भीम और अर्जुन ने दुर्योधन के प्राणों की रक्षा की थी। दुर्योधन द्वारा सदैव ही पांडवों के साथ छल किए जाने पर भी युधिष्ठिर ने उसे अपने अनुज की तरह ही प्रेम किया। इसके अलावा जब बहन दुशाला के पति जयद्रथ ने द्रौपदी का अपहरण कर लिया था।

तब भी युधिष्ठिर ने विशाल हृदय करके जयद्रथ को उसकी भूल के लिए क्षमा कर दिया था। साथ ही भगवान श्री कृष्ण के कहने पर ही युधिष्ठिर ने राष्ट्र की एकता के लिए  समस्त राजाओं को जोड़ने के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। जिसमें दूर दूर से राजा महाराजाओं को मैत्री भाव से आमंत्रित किया गया था।

दूसरी ओर, यह युधिष्ठिर की सहनशीलता का ही प्रमाण था कि उन्होंने अपने भाइयों के साथ मिलकर महाराज धृतराष्ट्र द्वारा मिले खांडवप्रस्थ को भी अपना लिया था। जिसे बाद में पांडवों ने अपनी कर्मभूमि इंद्रप्रस्थ बना लिया।

इसके साथ ही चौसर के खेल में मामा शकुनि द्वारा छले जाने के पश्चात् भी  युधिष्ठिर ने 12 वर्षों के वनवास और अज्ञातवास को अपनाकर अपनी सहनशीलता का परिचय दिया था। साथ ही युधिष्ठिर ने राज्य और प्रजा के हित के लिए सदैव ही नीतिपरक योजनाओं का शुभारंभ किया।

युधिष्ठिर के इन्हीं गुणों के कारण इनकी प्रजा इन्हें बहुत स्नेह करती थी। और युधिष्ठिर को राजा पाकर हस्तिनापुर की प्रजा धन्य हो गई थी।


क्यों धर्मराज कहलाए गए युधिष्ठिर

हम सब युधिष्ठिर को धर्मराज के नाम से भी जानते है। कहते है भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को धर्मराज कहकर पुकारा था। इसके पीछे महाभारत युद्ध से जुड़ी एक कहानी है। कहते है युद्ध के बाद युधिष्ठिर घायल सैनिकों और योद्धाओं की सेवा करने के लिए वेश बदलकर उनके पास जाया करते थे।

हालांकि महाभारत की युद्ध भूमि पर युधिष्ठिर ने काफी बड़े बड़े योद्धाओं को परास्त किया था। और जब गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को बन्दी बनाने की योजना बनाई थी। तब अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने युधिष्ठिर की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी।

जिसके उपरांत युधिष्ठिर ने अभिमन्यु की मौत पर काफी शोक प्रकट किया था। कहते है युद्ध भूमि पर युधिष्ठिर के इसी भाव से प्रभावित होकर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें धर्मराज की उपाधि दी। क्योंकि युधिष्ठिर ने सदैव ही मानव समाज के भले और उत्थान के लिए ही कार्य किया।

इसलिए वह आगे चलकर धर्मराज युधिष्ठिर कहलाए गए।


युधिष्ठिर द्वारा लिए गए अविश्वसनीय निर्णय

धर्मराज युधिष्ठिर ने वैसे तो सदैव ही धर्म और सत्य की रक्षा के लिए कार्य किया। लेकिन महाभारत काल की विपरीत परिस्थितियों में धर्मराज युधिष्ठिर को भी कई ऐसे कठोर निर्णय लेने पड़े। जो आगे चलकर धर्मराज युधिष्ठिर के अविश्वसनीय निर्णयों के तौर पर जाने गए।

यह उस समय की बात है जब धर्मराज युधिष्ठिर ने दुर्योधन के साथ द्युत क्रीड़ा में द्रौपदी को दांव पर लगा दिया था। युधिष्ठिर के इस निर्णय का समस्त पांडव भाइयों ने काफी विरोध किया था।  क्योंकि युधिष्ठिर इस द्युत क्रीड़ा में अपने भाइयों समेत द्रौपदी को भी हार गए थे।

ऐसे में युधिष्ठिर के इस निर्णय का परिणाम ही महाभारत काल में द्रौपदी चीर हरण के नाम से जाना जाता है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि युधिष्ठिर न्यायप्रिय थे। ऐसे में जब द्रौपदी पांचों पांडवों की कहलाई गई। जबकि नीति अनुसार उन्हें अर्जुन की विवाहिता होना चाहिए था।

तब महर्षि वेदव्यास और माता कुंती की विवशता के चलते धर्मराज युधिष्ठिर ने माता कुंती के इस निर्णय का तनिक भी विरोध नहीं किया। साथ ही युधिष्ठिर ने ही माता कुंती द्वारा कर्ण का भेद छुपाए जाने पर समस्त स्त्री जाति को यह श्राप दिया था कि वह कभी कोई भेद नहीं रख सकेगी। 

दूसरा, युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण के कहने पर ही गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा की मृत्यु का गलत समाचार चारों ओर फैला दिया था। जिसके परिणामस्वरूप गुरु द्रोणाचार्य ने महाभारत युद्ध भूमि पर पुत्र वियोग में अपने प्राण त्याग दिए थे।

इसके अलावा, पांडव युधिष्ठिर ने ही महाभारत युद्ध के दौरान भीष्म पितामह से उनकी मृत्यु का रहस्य पूछा था। जिसके बाद पांडव अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके भीष्म पितामह को बाणों की शैय्या पर लिटा दिया था।

साथ ही महाभारत युद्ध से पहले युधिष्ठिर ने ही कौरवों के सौतेले भाई युयुत्सु को अपने पक्ष में कर लिया था। उन्होंने उसे यह विश्वास दिलाया कि कौरव अधर्म के साथ है इसलिए उसे पांडवों का साथ देना चाहिए। इस प्रकार, धर्मराज युधिष्ठिर का व्यक्तित्व सत्यवादी और न्यायप्रियता की प्रति मूर्ति था।

परन्तु उनके कुछ एक निर्णयों के कारण ऐसा प्रतीत होता है, कि उन्हें अपने चरित्र के विपरीत व्यवहार करना पड़ा। अब चाहे इसे समय की मांग कहे या फिर विवशपूर्ण होकर धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा लिए गए निर्णय। जिन्हें इतिहास द्वारा सदैव ही स्मरण किया जाता रहा है।


यक्ष द्वारा पूछे गए प्रश्नों का दिया था सटीक जवाब

एक बार की बात है जब पांडव वनवास पर थे। उसी दौरान प्यास लगने पर वह सभी एक तालाब पर गए। जहां उन लोगों ने जैसे ही पानी पीने के लिए तालाब की ओर रुख किया। कि तभी एक आसमान से एक चेतावनी भरा स्वर सुनाई दिया। जिसमें उन्हें तालाब से पानी पीने से रोका जा रहा था।

चेतावनी के पश्चात् भी युधिष्ठिर के अलावा समस्त पांडवों से उस तालाब से पानी पीने की कोशिश की। जिसके उपरांत ही वह सब मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़े। तभी युधिष्ठिर ने उस चेतावनी को गंभीरता से लेते हुए विनती की। वह उनसे और उनके भाइयों से क्या चाहते है।

जिस पर एक आवाज आई कि पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो। तभी तुम तालाब से पानी पी सकते हो। जिसपर युधिष्ठिर ने प्रश्न पूछने को कहा।

  • प्रश्न – मृत्यु के दौरान मनुष्य का साथी कौन होता है?
    उत्तर – धर्म

  • प्रश्न – धरती से भारी क्या है?
    उत्तर – गर्भ धारण की हुई माता

  • प्रश्न – आकाश से ऊंचा क्या है?
    उत्तर – पिता

  • प्रश्न – वायु से तेज कौन है?
    उत्तर – मन

  • प्रश्न – यश की प्राप्ति किससे होती है?
    उत्तर – दान से

  • प्रश्न – उत्तम धन क्या है?
    उत्तर – विद्या

  • प्रश्न – संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
    उत्तर – मृत्यु

  • प्रश्न – मनुष्य का शत्रु कौन है?
    उत्तर – क्रोध

  • प्रश्न – तुम किस भाई को जीवित करना चाहते हो?
    उत्तर – नकुल

  • प्रश्न – तुम भीम और अर्जुन को जीवित क्यों नहीं करना चाहते?
    उत्तर – मैं कुंती पुत्र जीवित हूं। न्याय की परिभाषा यह कहती है कि नकुल जोकि माद्री पुत्र है, उसे जीवित होना चाहिए।

यक्ष के तमाम प्रश्नों के उपरांत युधिष्ठिर को मालूम पड़ा कि वह चेतावनी भरा स्वर स्वयं मृत्यु के देवता यम की आवाज है। जिन्होंने युधिष्ठिर के धर्म और नीति ज्ञान की परीक्षा लेने के लिए यह सब किया।

ऐसे में अपने सभी प्रश्नों के संतुष्ट जवाब मिलने के बाद यमराज ने युधिष्ठिर के सभी भाइयों को जीवित कर दिया था। इस प्रकार, युधिष्ठिर ने अपने ज्ञान और कौशल के बल पर अपने समस्त अनुज भाइयों के प्राणों की रक्षा की।

साथ ही उन्होंने धर्म, राज्य और नीति का ज्ञान आगे चलकर भीष्म पितामह के अंतिम दिनों में उनसे प्राप्त किया था। जिसका प्रयोग उन्होंने हस्तिनापुर का राजा घोषित होने के बाद प्रजा के हित में किया था। ऐसे में हस्तिनापुर नगरी आज भी युधिष्ठिर जैसा महाराज पाकर स्वयं के इतिहास को गौरवशाली महसूस करती है।


मृत्यु के बाद हुई थी स्वर्ग की प्राप्ति

जैसा कि आप जानते हैं कि समस्त पांडव भाइयों को मरने के बाद नरक की प्राप्ति हुई थी। परन्तु केवल युधिष्ठिर एकमात्र ऐसे पांडव थे, जिन्हें मृत्यु के बाद स्वर्ग मिला था। इससे पहले युधिष्ठिर ने समस्त भारतवर्ष पर राज किया।

लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में वह सारा राजपाठ महाराज परिक्षित को सौंपकर हिमालय पर्वत की ओर चल दिए थे। कहते है इसी दौरान स्वर्ग के रास्ते में इनके साथ कुत्ते के वेश में स्वयं यमराज आए थे। जो इन्हें अपने साथ लेकर स्वर्ग की ओर बढ़ चले थे।

हालांकि युधिष्ठिर ने यमराज से अपने भाइयों के साथ रहने की इच्छा जताई थी। जिसपर यमराज थोड़े वक्त के लिए उन्हें अपने साथ नरक की ओर ले गए थे। कहते है इसके पीछे एक कारण यह भी है कि युधिष्ठिर ने महाभारत के युद्ध में गुरु द्रोणाचार्य के बेटे अश्वस्थामा की मृत्यु का गलत समाचार बताया था।

जिसके चलते उन्हें अपना थोड़ा समय नरक में व्यतीत करना पड़ा। जिसके बाद स्वर्ग के दरवाजे उनके लिए हमेशा के लिए खुल गए।

इस प्रकार, धर्मराज युधिष्ठिर के जीवन चरित्र से हमें यह सीखने को मिलता है, कि व्यक्ति के कर्म ही मृत्यु के बाद स्वर्ग और नरक में उसकी जगह का निर्धारण करते है। इसलिए जीवनपर्यंत व्यक्ति को सदैव धर्म और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए। कभी भी पथ से विचलित नहीं होना चाहिए और जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में धैर्य का परिचय देना चाहिए।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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