सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन – Arjun in Mahabharat

संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहे जाने वाले अर्जुन महाभारत काल के वीर और पराक्रमी योद्धाओं में से एक थे। जिनके शौर्य और वीरता से जुड़े कई किस्से  महाभारत काल में सुनने और पढ़ने को मिलते हैं। ऐसे में आज हम पांडव अर्जुन की जीवन गाथा के बारे में जानेंगे।


इन्द्र देवता के पुत्र थे अर्जुन

हस्तिनापुर के जंगलों में महाराज पांडु और माता कुंती ने इंद्र देवता का आह्वान किया था। जिनके आशीर्वाद से उन्हें अर्जुन की प्राप्ति हुई थी। अर्जुन जन्म से ही एक महान् प्रतापी और तेजस्वी व्यक्तित्व के धनी थे। माना जाता है अर्जुन का नाम हिमालय के एक राजा कार्तवीर्या अर्जुन के नाम पर रखा गया था।

अर्जुन ने भी गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में रहकर ही वेदों और अस्त्र शस्त्र की विद्या हासिल की थी। जहां रात्रि में भी अर्जुन धनुष बाण का अभ्यास किया करते थे। साथ ही समस्त पांडवों और कौरवों में अर्जुन ही एकमात्र गुरु द्रोणाचार्य के परम शिष्य थे।

इसके पीछे अर्जुन की गुरु के प्रति निष्ठा और जिज्ञासा उल्लेखनीय है। साथ ही अर्जुन गुरु द्रोणाचार्य द्वारा ली गई समस्त परीक्षाओं में अन्य सबसे बेहतर प्रदर्शन किया करते थे। इसलिए गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाना चाहते थे।

जिसके चलते उन्होंने अपने अन्य कई योग्य शिष्यों की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह तक लगा दिया था। जिसमें कर्ण को अपनी शिक्षा से वंचित रखना और एकलव्य का अंगूठा मांग लेना आदि कहानियां विख्यात है। पांडव अर्जुन भीष्म पितामह के भी काफी करीब थे।

साथ ही अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने पार्थ कहकर संबोधित किया था। कहा जाता है कि इसके पीछे माता कुंती का दूसरा नाम पृथा जिम्मेदार था। इसके अलावा अर्जुन को जिष्णु, भीभत्सु, गांडीवधारी, कौन्तेय, कपिध्वज, किरीटिन, गुडाकेश, श्वेत्वाहन, धनजज्य, सव्यसाची, फाल्गुन आदि नामों से भी जाना जाता है।

यह नाम उन्हें अलग अलग परिस्थितियों में व्यवहार और वीरता के प्रदर्शन से प्राप्त हुए हैं। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के सखा होने के साथ साथ युद्ध भूमि में उनके सारथी भी बने थे। दूसरा, माता कुंती भगवान श्री कृष्ण की यदुवंशी समाज के रिश्ते से बुआ भी थी। इसलिए अर्जुन और श्री कृष्ण के मध्य अधिक घनिष्ठता थी।


अर्जुन का विवाह और उनकी अद्भुत प्रेम कहानियां

अर्जुन ने अपनी वीरता का प्रदर्शन करके ना केवल रणभूमि में ही विजय हासिल की थी। बल्कि उन्होंने कई राजकुमारियों के हृदय को भी जीता था। महाभारत की कहानी में हमें अर्जुन की अनेकों प्रेम कहानियों का जिक्र मिलता है।

सर्वप्रथम अर्जुन ने लाक्षा गृह की घटना के बाद एकचक्रा नगरी से लौटते समय ब्राह्मण का वेश धारण किया था। इसी दौरान महर्षि वेदव्यास के आग्रह पर वह  द्रुपद नरेश की पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर में गए थे। जहां उन्होंने लक्ष्य भेदन करके द्रौपदी को जीता था।

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Image Source – Mahabharat 2013

उल्लेखनीय है कि इसी सभा में दुर्योधन और कर्ण जैसे वीर योद्धा भी मौजूद थे, लेकिन राजा द्रुपद ने वह लक्ष्य भेदन अर्जुन को ध्यान में रखकर ही तैयार करवाया था। हालांकि बाद में, माता कुंती की भूलवश द्रौपदी अर्जुन के अतिरिक्त अन्य पांडव भाइयों की पत्नी भी कहलाई।

द्रौपदी से अर्जुन को श्रुतकर्मा नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी। इसके अलावा, भगवान श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा भी अर्जुन से प्रेम कर बैठी थी। जिसे अर्जुन भगवान श्री कृष्ण के कहेनुसार द्वारिका से भगा लाए थे। यह घटना तब की है जब अर्जुन को बारह साल के लिए वनवास मिला था।

यह वनवास उन्हें इसलिए मिला था। क्योंकि उन्होंने युधिष्ठिर और द्रौपदी के निजी समय में भूलवश दखल दे दिया था। इसी दौरान वह हस्तिनापुर राज्य को छोड़कर द्वारिका समेत अन्य नगरों में वनवास काटने चले गए थे। इसी दौरान सुभद्रा ने अर्जुन के साथ सात फेरे लिए थे।

हालांकि अर्जुन के इस फैसले से द्रौपदी काफी क्रोधित भी हुई थी, परन्तु भगवान श्री कृष्ण की लीला ने अर्जुन और सुभद्रा के मिलन को आगे चलकर संभव करवा दिया था। सुभद्रा ने ही आगे चलकर अभिमन्यु जैसे वीर पुत्र को जन्म दिया था। जोकि महाभारत के युद्ध में गुरु द्रोणाचार्य द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर के लिए बनाए गए चक्रव्यूह से बाहर निकलने में सफल ना हो पाया था।

और कौरवों के हाथों वीरगति को प्राप्त हो गया था। इसके साथ ही महाभारत युद्ध के पश्चात् जब पांडव युधिष्ठिर द्वारा अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया जा रहा था। तभी अर्जुन और भीम को इंद्रप्रस्थ का दूत बनाकर अन्य राज्यों से मित्रता संबंध बनाने के लिए भेजा गया था।

इसी समय अर्जुन को नागलोक से मैत्री संबंध स्थापित करने के लिए पांडवों का दूत बनकर वहां भेजा गया। जहां नागलोक की राजकुमारी उलूपी से अर्जुन को प्रेम हो गया। उलूपी से अर्जुन को इरावत नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी। आ

गे चलकर उलूपी के कारण ही अर्जुन को पुनर्जन्म की प्राप्ति हुई थी। इसके अलावा, अर्जुन का विवाह मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा से भी हुआ था। हालांकि यह विवाह राजनैतिक हित को साधने के प्रयास से हुआ था।

साथ ही इनके विवाह के समय राजकुमारी चित्रांगदा के पिता राजा चित्रवाहन ने यह शर्त रखी थी कि अर्जुन और चित्रांगदा का पुत्र आगे मणिपुर का उत्तराधिकारी बनेगा। इसलिए चित्रांगदा कभी इंद्रप्रस्थ नहीं जाएगी। जबकि विवाह के बाद अर्जुन और चित्रांगदा के रिश्ते में किसी कारणवश खटास आने के चलते अर्जुन स्वयं ही मणिपुर को छोड़कर हमेशा के लिए इंद्रप्रस्थ वापस लौट आए थे।

तो वहीं अर्जुन को चित्रांगदा की कोख से बभ्रूवाहन नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी। बभ्रूवाहन ने ही महाभारत के युद्ध के काफी समय बाद अपने पिता अर्जुन धनुर्विद्या में करारी शिकस्त दी थी। क्योंकि चित्रांगदा ने अपने बेटे को हमेशा अर्जुन से भी बेहतर धनुर्धर बनाने की शिक्षा प्रदान की थी।

हालांकि उसे यह बात नहीं ज्ञात थी कि अर्जुन ही उसके पिता है। फिर विमाता उलूपी के हस्तक्षेप के बाद पुत्र के हाथों प्राण गंवाने वाले अर्जुन को जीवन वापस मिला था। इस प्रकार अर्जुन के जीवन से हमें ना केवल शौर्य, पराक्रम और वीरता का परिचय मिलता है, बल्कि इनके व्यक्तित्व में प्रेम और अपनापन भी विद्यमान था।


शक्तिशाली बनने के लिए की थी कड़ी तपस्या

महाराज पांडु की मृत्यु के बाद जब माता कुंती पांडव पुत्रों के साथ हस्तिनापुर लौट आईं थी। तब महाराज धृतराष्ट्र ने पांडव भाइयों को उनके अधिकारों से सदैव वंचित किया। जिसके चलते पांडवों को अपना अधिकांश जीवन वनवास और तप में व्यतीत करना पड़ा।

महाभारत काल में लाक्षा गृह की घटना, पांडवों का खांडवप्रस्थ जाना, द्युत क्रीड़ा में पांडवों का राज्य हार जाना, द्रौपदी चीर हरण, 12 साल का वनवास और 1 साल का अज्ञातवास आदि घटनाएं पांडवों के संघर्ष की कहानी को दर्शाते हैं। इसके परिणामस्वरूप जब कौरवों की नीचता हद से अधिक बढ़ गई। तब पांडवों ने कौरवों से युद्ध करके अपना अधिकार और सम्मान वापस पाने की ठानी।

हालांकि महाभारत युद्ध की पैरवी सदैव से ही कौरवों की ओर से हुई थी। ऐसे में भगवान श्री कृष्ण की आज्ञा मानकर पांडव अर्जुन ने कठोर तप करके भगवान इंद्र समेत अन्य देवताओं का ध्यान करके कई शक्तिशाली अस्त्र शस्त्र का वरदान प्राप्त किया। इसके लिए पांडव अर्जुन को देवतालोक भी जाना पड़ा।

क्योंकि ना चाहते हुए भी अर्जुन को यह युद्ध सर्वाधिक प्रिय भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ना पड़ा था। ऐसे में पांडवों के सामने कई सारे महारथी थे। जिन्हें परास्त करने के लिए अर्जुन ब्रह्मास्त्र की खोज में निकल पड़े थे। तब भगवान शिव ने पांडव अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए वेश बदलकर उनके साथ युद्ध किया था।

ऐसे में अर्जुन की तपस्या से प्रभावित होकर भगवान शिव ने अर्जुन को पाशुपत अस्त्र, आग्रेयास्त्र, गांडीव और अक्षय तूणीर आदि शक्तिशाली अस्त्र दिए थे। इसके साथ ही वरुण देवता से अर्जुन को नंदिघोष नामक विशाल रथ की प्राप्ति हुई थी। इसके अतिरिक्त अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य से युद्ध चक्रव्यूह में से निकलने और प्रवेश का सम्पूर्ण ज्ञान हासिल किया था।

साथ ही अर्जुन उन धनुर्धारियों में से एक थे, जिन्हें धनुर्वेद की पांचों शाखाओं का ज्ञान था। एक बार अर्जुन का युद्ध इंद्र देवता से भी हुआ था। जिन्हें परास्त करने के बाद इंद्र देवता ने प्रसन्न होकर अर्जुन को एक गांडीव और दो अक्षय तूणीर वरदान में दिए थे। बता दें कि इन्द्र देवता द्वारा अर्जुन को दिया गया गांडीव इतना अदभुत था कि उसपर प्रत्यंचा केवल अर्जुन ही चढ़ा सकते थे।

अर्जुन बाएं हाथ से धनुष बाण चलाना जानते थे, इसलिए वह सव्यसाची कहलाए। उपरोक्त तमाम शक्तियों और बल के अलावा भी हमें अर्जुन के व्यक्तित्व से एक अन्य कला में निपुण होने की जानकारी मिलती है। यह बात उस समय की है जब अर्जुन ब्रह्मास्त्रों की खोज में  देवलोक गए हुए थे।

उसी दौरान देवलोक में नृत्य शाला का कार्यक्रम चल रहा था। कि तभी अर्जुन ने वहां चित्रसेन गंधर्व से नृत्य और गायन की तालीम हासिल की। इसी दौरान वहां मौजूद उर्वशी नाम की एक अप्सरा अर्जुन पर मोहित हो गई। जिसके बाद वह अर्जुन के पास अपने प्रेम की व्यथा को लेकर पहुंची। परन्तु अर्जुन ने उनकी तुलना अपनी माता से कर दी।

अर्जुन ने कहा कि मेरे लिए जैसे मेरी माता कुंती और माद्री हैं, ठीक वैसे ही आप भी मेरी माता समान है। अर्जुन के मुख से माता शब्द सुनकर उर्वशी क्रोधित हो गई। और उन्होंने अर्जुन को नपुंसक बनने का श्राप दे दिया। हालांकि बाद में इंद्र देवता के हस्तक्षेप से उर्वशी ने इस श्राप की आयु को एक वर्ष कर दिया। जिसके चलते अर्जुन का यह श्राप उनके एक साल के अज्ञातवास में वरदान साबित हुआ।

ऐसे में अर्जुन ने विराट नगरी में अज्ञातवास के दौरान विराट नरेश की पुत्री उत्तरा को नृत्य और गायन की शिक्षा दी। इस दौरान अर्जुन ने उर्वशी के नपुंसक श्राप से ग्रस्त होकर ब्रहन्नला (बृहद + नर) का वेश धारण किया हुआ था। जानकारी के लिए बता दें कि अर्जुन की शिष्या उत्तरा का विवाह आगे चलकर अभिमन्यु से हुआ था। जिनके पुत्र परीक्षित ने अर्जुन के वंश को आगे बढ़ने का कार्य किया था।


अर्जुन ने श्रेष्ठ शिष्य का कर्तव्य बखूबी निभाया

गुरु द्रोणाचार्य प्रारंभ से ही अर्जुन की बुद्धिमत्ता और गुरु निष्ठा से काफी प्रभावित थे। यही कारण था कि उन्होंने अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का प्रण लिया था। क्योंकि एक बार अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य को मगरमच्छ के मुख का निवाला बनने से बचाया था।

हालांकि यह गुरु द्रोणाचार्य द्वारा समस्त पांडव भाइयों और कौरवों की परीक्षा ली गई थी। जिसमें अर्जुन से सर्वप्रथम अपनी वीरता का परिचय दिया था। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अर्जुन ही गुरु द्रोणाचार्य का प्रथम दृष्टया परिचय लेकर भीष्म पितामह के पास पहुंचे थे। तभी भीष्म पितामह ने गुरु द्रोणाचार्य को कौरवों और पांडवों की शिक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा था।

इसके अलावा, एक बार गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने अर्जुन के विषय में अपने पिता से जानना चाहा। तब गुरु द्रोणाचार्य ने बताया कि अर्जुन इसलिए सबमें श्रेष्ठ है क्योंकि वह मेरे द्वारा दी गई शिक्षा का इस्तेमाल करना बखूबी जानता है।

जिसका उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए गुरु द्रोणाचार्य ने सभी कौरवों और पांडवों की पेड़ पर बैठी चिड़िया की आंख पर निशाना लगाने की परीक्षा ली थी। जिसमें केवल अर्जुन द्वारा ही चिड़िया की आंख पर निशाना लगाया गया था। दूसरी ओर, गुरु द्रोणाचार्य का अपने मित्र द्रुपद से मतभेद चल रहा था।

जिसपर गुरु द्रोणाचार्य ने यह घोषणा की थी कि जो द्रुपद को बंदी बनाकर लाएगा। वह मेरा परम शिष्य कहलायेगा। गुरु द्रोणाचार्य की इस गुरु दक्षिणा का उपहार स्वयं राजा द्रुपद भी अर्जुन द्वारा ही गुरु को बंदी बनाकर भेंट किया गया था।

इस प्रकार अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य के समक्ष सदैव ही परम शिष्य होने का प्रमाण दिया। यही कारण था कि गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन को शिष्य के रूप में बेहद पसंद करते थे।


अर्जुन ने किया भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, जयद्रथ जैसे योद्धाओं को परास्त

महाभारत युद्ध के आरंभ से पहले समस्त कौरवों का युद्ध अर्जुन यानि ब्रहन्नला से विराट नगरी में हुआ था। जिसमें अर्जुन के बल के आगे दुर्योधन, गुरु द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, कर्ण, दुशासन, कृपाचार्य आदि ने घुटने टेक दिए थे। इसके बाद अर्जुन की समस्त कौरवों से मुलाकात महाभारत की युद्ध भूमि पर हुई।

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जहां अर्जुन ने युद्ध के पहले दिन से यह साबित कर दिया था कि युद्ध भूमि पर वह विजय श्री का आशीर्वाद लेकर आया है। यही कारण था कि अर्जुन ने इस युद्ध में बड़े बड़े पराक्रमी और बलशाली योद्धाओं को धूल चटाई थी।

हालांकि यह सर्वविदित है कि हस्तिनापुर के सभी शुभ चिंतक अर्जुन समेत समस्त पांडव भाइयों की विजय ही चाहते थे। जिसके परिणास्वरूप जब युद्ध भूमि में अर्जुन का सामना भीष्म पितामह से हुआ। तब अर्जुन ने भीष्म पितामह के कहेनुसार महाराज शिखंडी को आगे करके भीष्म पितामह पर बाणों की वर्षा की थी।

इस दौरान अर्जुन के आंखों से आंसुओं की वर्षा हो रही थी। क्योंकि अर्जुन को शायद यह आभास नहीं था कि जिन हाथों ने उसके बचपन को दुलारा था। वह युद्ध भूमि में उन्हीं को असहाय कर देगा। इसके अलावा अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य को भी युद्ध भूमि पर धनुष बाण में करारी शिकस्त दी थी। लेकिन गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु मूल रूप से अर्जुन के हाथों ना होकर राजा द्रुपद के बेटे धृष्टद्युम्न ने की थी।

क्योंकि उसे अपने पिता के अपमान का बदला लेना था। हालांकि जब धृष्टद्युम्न ने गुरु द्रोणाचार्य के सिर को धड़ से अलग कर दिया था। तब अर्जुन को काफी क्रोध आया था। जानकारी के लिए बता दें कि गुरु द्रोणाचार्य ने पांडव युधिष्ठिर के मुख से जब अपने बेटे अश्वत्थामा की मृत्यु का समाचार सुना।

तब उन्होंने अपने हथियार रख दिए थे। जिसका फायदा उठाकर पांडवों की सेना ने गुरु द्रोणाचार्य का वध कर दिया। तत्पश्चात् अर्जुन ने दानवीर कर्ण को भी युद्ध भूमि में मार गिराया था। हालांकि कर्ण की मृत्यु उसे भगवान परशुराम और एक गाय मालिक द्वारा मिले श्राप से हुई थी।

जिसके कारण वह अंत समय में अपनी अस्त्र शस्त्र विद्या भूल गया था। साथ ही श्राप के चलते  उसके रथ का एक पहिया जमीन में धंस गया था। जिसपर जब वह बिना धनुष बाण के जमीन पर उतरा। तभी भगवान श्री कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने कर्ण के सिर को धड़ से अलग कर दिया।

कर्ण की मृत्यु के बाद अर्जुन और सभी पांडव भाइयों को यह मालूम हुआ था कि कर्ण ज्येष्ठ कुंती पुत्र था। इसके साथ ही अर्जुन ने अपने पुत्र अभिमन्यु की मौत का बदला लेने के लिए सूरज ढलने से पहले  जयद्रथ (दुशाला का पति) की मौत की प्रतिज्ञा ली थी।

इस दौरान भगवान श्री कृष्ण ने सूरज की दिशा को परिवर्तित कर दिया था। जिसका फायदा उठाकर अर्जुन ने जयद्रथ का वध करके अभिमन्यु की मौत का बदला लिया था। इस प्रकार, अर्जुन ने महाभारत के युद्ध में श्वेत घोड़े से सुसज्जित रथ पर सवार होकर भगवान श्री कृष्ण की छत्र छाया  में युद्ध भूमि पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और धर्म की रक्षा करते हुए यह महान् युद्ध जीत लिया।


भगवान श्री कृष्ण ने सदैव किया अर्जुन का पथ प्रदर्शन

अर्जुन के विषय में भगवान श्री कृष्ण ने कहा था कि….

तव भ्राता मम सखा संबंधी शिष्य एवं च।
मांसान्युत्कृत्य दास्यामि फाल्गुन नार्थे महिपते।।
एष चापि नरव्यार्घों मत्कृते जीवितं त्यजेत।
एष न: समस्यात तारमेय परस्परम।।

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हे राजन! अर्जुन मेरा पुत्र, संबंधी, शिष्य और सखा है। अर्जुन के लिए मैं अपने शरीर के अंगों तक का बलिदान कर सकता हूं। यद्यपि अर्जुन भी मेरे लिए अपने प्राणों को कुर्बान कर सकता है। हम दोनों ने मिलकर यह प्रतिज्ञा ली है कि हम संकट की स्थिति में एक दूसरे का साथ देंगे।

यह बात तीनों लोकों के देवताओं को ज्ञात है कि पांडव अर्जुन भगवान श्री कृष्ण के अत्यधिक प्रिय थे। जिन्होंने अर्जुन की जीवन यात्रा में पग पग पर उसकी सहायता की। जहां धार्मिक पुराणों में भगवान श्री कृष्ण को नारायण तो अर्जुन को नर की संज्ञा दी गई है।

महाभारत काल में अर्जुन के साथ प्रत्येक स्थान पर भगवान श्री कृष्ण की उपस्थिति दर्ज की गई है। साथ ही अर्जुन ने महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्री कृष्ण की नारायणी सेना और श्री कृष्ण में से नारायण का ही चुनाव किया था। हालांकि भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध में शस्त्र ना उठाने का प्रण लिया था।

इस प्रकार, महाभारत युद्ध में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के सारथी बने और अर्जुन को श्रीमद् भागवत गीता का पवित्र ज्ञान दिया। इतना ही नहीं, भगवान श्री कृष्ण की वजह से ही यह संभव हो सका था कि रण भूमि में किसी भी क्षत्रिय का बाण अर्जुन को घायल ना कर सका। इसके लिए भगवान श्री कृष्ण ने अपनी लीलाओं का सर्वत्र चमत्कार दिखाया था।

सर्वप्रथम भगवान श्री कृष्ण यह भली भांति जानते थे कि कर्ण के कुंडल और कवच जो स्वयं उसे इंद्र देवता ने दिए थे। जब तक वह उसके पास है अर्जुन क्या कोई भी उसका अंत नहीं कर सकता। जिसपर भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र देवता के माध्यम से कर्ण से उसके कुंडल और कवच लेकर अर्जुन के प्राणों की रक्षा की।

साथ ही यह भगवान श्री कृष्ण की शक्तियों का ही चमत्कार था कि कर्ण इंद्र देवता के जिस शक्तिशाली अस्त्र का प्रयोग युद्ध भूमि में अर्जुन पर करना चाहता था। उसका प्रयोग उसे भीम पुत्र घटोत्कच को मारने के लिए करना पड़ा। इसके साथ ही भगवान श्री कृष्ण ने ही अर्जुन को भीष्म पितामह को मारने की युक्ति सुझाई।

हालांकि युद्ध भूमि में एक समय ऐसा भी आया कि जब भीष्म पितामह के बाणों का अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था। तब भगवान श्री कृष्ण ने क्रोध में आकर अपना सुदर्शन चक्र उठा लिया था। फिर बाद में अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण को रोककर भीष्म पितामह के बाणों का प्रतिशोध लिया था।

अर्जुन महाभारत युद्ध से पहले स्वयं की पांचों इन्द्रियों को वश में नहीं कर पा रहे थे। उनके सामने भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य जैसे आदरणीय पुरुष थे। जिनपर धनुष बाण चलाना अर्जुन के लिए असंभव हो रहा था। तब भगवान श्री कृष्ण ने ही अर्जुन का मनोबल बढ़ाया था।

और उसे उसके क्षत्रिय धर्म के कर्तव्य का बोध कराया था। इसी दौरान अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण के विराट रूप के दर्शन भी प्राप्त हुए थे।  भगवान श्री कृष्ण के कारण ही यह संभव हो सका कि युद्ध भूमि में अर्जुन के हाथों भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, दानवीर कर्ण, गांधारी के दो पुत्रों, संसप्तक गण, जयद्रथ, कृतवर्मा, सुदक्षिण, श्रुतायुध, अच्युताऊ, नियतायु, दीर्घायु, अम्बष्ठ आदि अनेकों वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए।

इसके अलावा भगवान श्री कृष्ण सदैव अर्जुन से यही कहा करते थे कि जो पांडवों का मित्र है वह मित्र है। और जो पांडवों का शत्रु है वह मेरा शत्रु होगा। जिसके चलते उन्होंने सदा ही पांडु पुत्रों और विशेषकर अर्जुन की हर परिस्थिति में मदद की।

इसके साथ ही भगवान श्री कृष्ण ने ही अर्जुन के वंश को बचाया था। यह बात उस समय की है जब गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने पांडवों के विनाश के खातिर ब्रहमास्त्र का प्रयोग किया था। जिसके कारण अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र परीक्षित की गर्भ में ही मृत्यु हो गया था।

परन्तु भगवान श्री कृष्ण की कृपा से अर्जुन के प्रपौत्र परीक्षित को जीवन दान मिला। इसके अलावा द्वारिका में रहकर एक बार अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण की सहायता से एक ब्राह्मण के बेटे को जीवनदान भी दिलवाया था। इस प्रकार, अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण का साथ पाकर ही महाभारत के युद्ध में अधर्म पर विजय प्राप्त की थी।

वैसे तो महाभारत का असली नायक अर्जुन था। परन्तु इस बात में भी कोई संशय नहीं है कि बिना भगवान श्री कृष्ण के मार्गदर्शन और आशीर्वाद के अर्जुन कभी महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ योद्धा नहीं कहलाते। इसलिए भगवान श्री कृष्ण को अर्जुन की आत्मा की उपाधि भी दी गई है।


अर्जुन को मिला था मां गंगा का श्राप


गंगा पुत्र भीष्म की मृत्यु के बाद मां गंगा अर्जुन से काफी क्रोधित हो गई थी। ऐसे में जब अर्जुन का युद्ध अपने पुत्र बभ्रुवाहन से हुआ था। तब उसने कामाख्या माता से आशीर्वाद में मिले अस्त्र का प्रयोग अर्जुन पर करके अर्जुन को मारा था।

आपको बता दें कि वह अस्त्र मां गंगा द्वारा ही अर्जुन का वध करने के उद्देश्य से चित्रांगदा के पुत्र बभ्रुवाहन को दिया गया था। क्योंकि जहां एक ओर चित्रांगदा अर्जुन से अपने बेटे का युद्ध करवाकर यह साबित करना चाहती थी कि उनका पुत्र उनकी तरह ही बलशाली है।

चित्रांगदा ने इसलिए अपने बेटे को अर्जुन के समकक्ष शिक्षा प्रदान की थी। क्योंकि अर्जुन से विवाह के उपरांत अर्जुन ने उलूपी द्वारा उत्पन्न किए गए भ्रम के चलते चित्रांगदा के चरित्र पर उंगली उठा दी थी। जिसको झूठ साबित करने के लिए चित्रांगदा ने अपने पुत्र को अर्जुन से युद्ध करने के लिए उकसाया।

हालांकि वह अर्जुन का वध कदापि नहीं चाहती थी तो वहीं मां गंगा अपने पुत्र भीष्म की मृत्यु से आहत होकर अर्जुन से बदला लेना चाहती थी। यही कारण आगे चलकर अर्जुन की मृत्यु का कारण बने।


कैसे हुई श्रेष्ठ धर्नुधारी अर्जुन की मृत्यु

यदुवंशियों को समाप्त करने के पश्चात् जब समस्त पांडव भाई द्रौपदी के साथ मिलकर जीवन के अंतिम दिनों में हिमालय की ओर जा रहे थे। कि तभी पांडव युधिष्ठिर को छोड़कर अन्य सभी पांडवों की मृत्यु हो गई। अर्जुन की मृत्यु को लेकर कहा जाता है कि अर्जुन के साथ सदैव ही देवताओं का आशीर्वाद रहा। तत्पश्चात अर्जुन ने घमंड का त्याग नहीं किया। इसी कारण अर्जुन को मरने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हुई।


इस प्रकार, अर्जुन महाभारत काल के एक महान् योद्धा थे। जिनके बल, पराक्रम और वीरता के आगे स्वयं देवलोक के देवता भी नतमस्तक हो जाया करते थे। अब भारत के इतिहास में अर्जुन जैसा योद्धा कदाचित ही जन्म लेगा। ऐसे में अर्जुन के वीरता की गाथा आने वाली पीढ़ी को सदैव ही सन्मार्ग तक ले जाएगी। वर्तमान समय में, अर्जुन की वीरता के मद्देनजर भारतीय खिलाड़ियों को खेल में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर अर्जुन पुरस्कार दिया जाता है।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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