Nari Sashaktikaran Par Nibandh – नारी सशक्तिकरण पर निबंध

Nari Sashaktikaran Par Nibandh


नारी सशक्तिकरण के विषय में कहा गया है कि…..

नहीं सहना है अब किसी का अत्याचार,
नारी सशक्तिकरण का यही है मुख्य विचार।।

प्रस्तावना 

जब भी बात नारी सशक्तिकरण की होती है, तब हमारे समाज में उन महिलाओं का उदाहरण दिया जाता है। जिन्होंने अपने क्षेत्र में महान उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन सही मायनों में यह तभी सार्थक है, जब आधी आबादी अपने हक और अधिकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद कर सकें।

यानि भारतीय महिलाएं जब अपने घरों से निकलकर अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं लेने में सक्षम होंगी। तभी नारी सशक्तिकरण के वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति हो सकेगी। ऐसे में आज हम आपके लिए “नारी सशक्तिकरण” विषय पर हिंदी भाषा में निबंध लेकर आए हैं। जो अवश्य ही आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा।


नारी सशक्तिकरण से क्या आशय  है?

सशक्तिकरण से तात्पर्य किसी व्यक्ति के अपने जीवन के प्रति जागृत और उद्देशित होने से है। और आज हम नारी सशक्तिकरण के विषय में बात कर रहे हैं। जिससे हमारा तात्पर्य महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक स्वावलंबन से है। क्योंकि प्राचीन समय से ही हमारे समाज में स्त्रियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता आया है।

उन्हें सदैव ही पुरुषों से कमजोर आंका गया है। फिर चाहे वह उनका घर हो या कार्यस्थल, नारी का हर जगह शोषण ही होता आया है। इसलिए नारी सशक्तिकरण वर्तमान समय की जरूरत है। हालांकि हमारे भारतीय समाज में कई ऐसे महान पुरुष हुए हैं। जिन्होंने इस दिशा में काफी योगदान दिया। और वर्तमान सरकारें भी इस ओर काफी प्रयासरत हैं।

लेकिन किसी ने सही ही कहा है…

सदियां बदली, युग बदला लेकिन नही बदली तो वो है मानसिकता समाज की।

ऐसे में यदि कोई देश और समाज वास्तव में तरक्की करना चाहता है तो उसको महिलाओं की समृद्धि से जुड़े विषयों पर भी अग्रसरित होना पड़ेगा। अन्यथा यह कहावत सही सिद्ध हो जाएगी कि जिस देश में नारियों का सम्मान  नही होता है। उस देश और समाज का पतन निश्चित है।


इसलिए हमें नारियों को सशक्त बनाने की दिशा में भी कार्य करना पड़ेगा। क्योंकि मानव योनि में जन्म लेने के कारण स्त्रियों को भी पुरुषों की तरह जीवन जीने का अधिकार है। ऐसे में हम महिलाओं को सिर्फ इसलिए कमजोर नही आंक सकते हैं, क्योंकि उनकी शारीरिक संरचना पुरुषों से अलग होती है।

हमें कदाचित यह नहीं भूलना चाहिए कि एक नारी की कोख से ही एक पुरुष जन्म लेता है। तो इसलिए हमें महिलाओं को सदैव ही ऐसा माहौल देना चाहिए जिससे वह अपनी योग्यता के आधार पर अपने जीवन के अहम फैसले खुद के बलबूते पर ले सकें। 

स्त्री का सशक्त होना क्यों जरूरी है?

हमारा समाज आरंभ से ही पुरुष प्रधान रहा है। इसी कारण से जहां घरों में अधिकतर फैसले लेने का अधिकार पुरुषों को होता है। तो वहीं बाहर भी पुरुषों ने ही सब जगह अपना वर्चस्व स्थापित कर रखा है। ऐसे में समाज में महिलाओं को हर जगह हिंसा और शोषण का शिकार होना पड़ता है।

आज 21वीं सदी के युग में भी यदि कोई महिला पुरुष से किसी भी क्षेत्र में आगे निकल जाती है। तो वह उनसे सहन नही हो पाता है और वह महिलाओं के प्रति अपराध को अंजाम देते है। महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा, बाल विवाह शारीरिक शोषण, बलात्कार, वेतन और प्रोन्नति आदि में असमानता, अशिक्षा, भ्रूण हत्या आदि के मामलों में बढ़ोतरी इसी के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

ऐसे में यदि महिलाओं को समाज में अपने अस्तित्व को कायम रखना है, तो उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। और यह तभी संभव है जब नारियां सशक्त होंगी। उनपर किसी प्रकार का सामाजिक और आर्थिक दबाव नहीं होगा, उन्हें उच्च शिक्षा की ओर प्रेरित किया जाएगा, उन्हें कार्यक्षेत्र में समान व्यवहार और मानदेय दिया जाएगा, उनको घर की चहारदीवारी में कैद नहीं किया जाएगा, उनके विचारों और सोच को महत्व दिया जाएगा, साथ ही उनके साथ किसी भी प्रकार की जोर जबरदस्ती नहीं की जाएगी।

तभी वह पुरुषों की भांति प्रत्येक क्षेत्र में अपना परचम लहरा सकती हैं। जिसकी शुरुआत हमें खुद से करनी होगी। क्योंकि जिस परिवार में नारी के विषय में विचार किया जाता है, वहीं से एक स्वस्थ विचारधारा का जन्म होता है। जोकि किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास की अहम जरूरत है।

इसके अलावा एक महिला के कंधों पर आने वाली पीढ़ी का भविष्य और दो परिवारों की जिम्मेदारी होती है। और यदि वही अपने अधिकारों के लिए जागरूक नहीं होगी तो हम कैसे एक उज्जवल कल के बारे में सोच सकते हैं? ऐसे में हम कह सकते हैं कि जब महिलाएं सशक्त होगी, तभी एक परिवार, क्षेत्र, गांव, शहर और देश तरक्की कर पाएंगे।


देश में पुरुष और महिलाओं का प्रत्येक क्षेत्र में भागीदारी का प्रतिशत

बात की जाए अगर, नारी साक्षरता की तो हमारे देश में पुरुषों के मुकाबले मात्र 60 प्रतिशत महिलाएं ही शिक्षित हैं। तो वहीं शहरी क्षेत्रों में केवल 30 प्रतिशत महिलाएं कंपनियों में कार्यरत है। जबकि ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएं कम पैसों में दैनिक मजदूरी किया करती हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, आज भी महिलाएं पुरुषों से 20 प्रतिशत कम भुगतान पाती हैं। और तो और आज भी शक्ति प्रदर्शन के क्षेत्र में भी महिलाओं का योगदान मात्र 8.5 प्रतिशत है। बात की जाएं राजनीति में महिलाओं की स्थिति में, तो संसद में महिलाएं केवल 11% हैं। इसके अलावा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, कृषि में महिलाओं का प्रतिशत 76%, विनिर्माण के क्षेत्र में 10%, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में 28%, आईटी क्षेत्र में 40%, प्रबंध के शहर में 35%, कानून से जुड़े रोजगार में 32% महिलाएं कार्यरत हैं।

जोकि पुरुषों के मुकाबले काफी कम है। इतना ही नहीं, स्वास्थ्य दृष्टि से देखें तब भी हर साल ना जाने कितनी ही महिलाएं सही खान पान ना मिलने की वजह से एनीमिया की शिकार हो जाती हैं। तो वही कुछ महिलाएं आज भी अपने स्वास्थ्य और महावारी के दिनों को लेकर जागरूक नहीं है, जिस वजह से उनकी मृत्यु के आंकड़े भी हैरान कर देने वाले हैं।

वह आज भी घर और बच्चों की देखरेख में अपने सपनों का बलिदान कर रही है। इतना ही नहीं कुछ जगहों पर तो, महिलाओं को अपने तरीके से उठने-बैठने, कपड़े पहनने और अपनी आजादी से जीने के अधिकार से भी वंचित रखा गया है। और अगर कोई स्त्री अपने अधिकारों के लिए आगे आती है। तो उसे सबक सिखाने के उद्देश्य से उसके साथ दुष्कर्म और शारीरिक शोषण जैसे जघन्य अपराध को अंजाम दिया जाता है।

हमारे देश में आए दिन महिलाओं और बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं सुनने को मिलती है। जिसे देखकर और सुनकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि महिला अपराध के आंकड़े दिन प्रति दिन बढ़ रहे हैं। और यदि समय रहते इस ओर कठोर कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर नही, जब मानव जीवन का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा क्योंकि आधी आबादी केवल स्त्री मात्र नहीं है, बल्कि उसे भारत देश में देवी स्वरूपा माना जाता है।

ऐसे में स्त्री समाज का पतन किसी भी देश के भविष्य की नींव को हिला सकता है। इसलिए हमें आज भी नारी सशक्तिकरण के दिशा में अधिक प्रयासरत होने की आवश्यकता है।


भारतीय स्त्रियां जिन्होंने पेश की नारी शक्ति की अनूठी मिसाल

हमारे देश का इतिहास सदैव ही नारियों के शौर्य और विजय की गाथाएं सुनाता है। प्राचीन भारत में देश में गार्गी, अनुसूया, वैदेही, आम्रपाली, रजिया सुल्तान, रानी लक्ष्मीबाई, जीजाबाई, दुर्गावती, मीराबाई, एनी बेसेंट, कस्तूरबा, विजय लक्ष्मी पंडित, सावित्रीबाई फुले, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, मदर टेरेसा, एम फातिमा बीबी, लक्ष्मी सहगल आदि कई शक्तिशाली नारियों ने जन्म लिया।

बात करें आधुनिक समय कि तो अंतरिक्ष में कल्पना चावला, राजनीति में इंदिरा गांधी, खेल में सानिया मिर्जा, प्रसाशनिक सेवा में किरण बेदी, माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली बछेंद्री पाल, महिला पायलट हरिता कौर देओल, संगीत के क्षेत्र में लता मंगेशकर, विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय, प्रसिद्ध चित्रकार आंजोली इला मेनन, महिला खिलाड़ी पी. टी. उषा, भारतीय मुक्केबाज मैरी कॉम, भारतीय लेखक अरुधंति रॉय, कमला सुरैया समेत प्रबंध के क्षेत्र से जुड़ी चंदा कोचर, अरुधंति भट्टाचार्य, रेणु सूद कर्नाड और नरगिस, अमृता प्रीतम, अन्ना चंडी आदि अनेकों ऐसी महिलाओं के उदाहरण है। जिन्होंने सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर सम्पूर्ण देश में अपनी पहचान बनाई है।


नारी स्वालंबन की दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम

हालांकि नारियों की स्थिति में सुधार लाने के लिए सरकार द्वारा समय समय पर कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई गई हैं। वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा समर्थ योजना जिसके तहत वैश्विक वस्त्र उद्योग में महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित करना तय हुआ है।

इसके साथ ही भारत सरकार द्वारा ग्रामीण और शहरी महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन के लिए फ्री सिलाई मशीन योजना, उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन देना, कामगार महिलाओं के लिए सुरक्षित मातृत्व आश्वासन सुमन योजना, लड़कियों की पढ़ाई और शादी के उद्देश्य से सुकन्या समृद्धि योजना, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए बेटी बचाओ बेटी बचाओ योजना, लड़कियों और महिलाओं को छेड़छाड़ से बचाने के लिए स्पेशल कानून और वूमेन हेल्पलाइन जारी करना समेत राजीव गांधी सबला योजना, इंदिरा गांधी मातृत्व योजना, लड़कियों की शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने के लिए कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना, किशोरी शक्ति योजना, प्रेरणा योजना, राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति, स्वयं सहायता समूह, महिला बाल विकास परियोजना आदि का संचालन किया गया है।

साथ ही सरकार महिलाओं के आर्थिक विकास के लिए प्रशिक्षण और रोजगार कार्यक्रमों का आयोजन भी करती है। ताकि महिलाएं आत्मनिर्भर बनकर देश के विकास में अपनी भूमिका निभा सकें।

महिला सशक्तिकरण से जुड़े कानूनों के बारे में

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात महिलाओं की स्थिति को ठीक करने के उद्देश्य से भारतीय संविधान में कई प्रावधान किए गए। इसी दिशा में महिला आरक्षण बिल को पारित किया गया। जिसके तहत संसद में 33% महिलाओं की भागीदारी को आवश्यक घोषित कर दिया गया।

इसके साथ ही साल 1856 में भारत के कानून में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित कर विधवा स्त्रियों के आत्मसम्मान की दिशा में कार्य किया गया। साथ ही नौकरियों में आरक्षण के माध्यम से भी महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का संकल्प भारतीय संविधान द्वारा लिया गया है।

तो वहीं महिलाओं की शोचनीय दशा को सुधारने के लिए भारतीय संविधान में अन्य कई प्रावधान किए गए हैं। जिसके तहत महिलाओं को उनके अधिकारों से परिचित करवाया जाता है। जैसे – बाल विवाह रोकथाम एक्ट 2006, दहेज रोक अधिनियम 1961, लिंग परीक्षण तकनीक एक्ट 1994, यौन शोषण एक्ट 2013, अनैतिक व्यापार अधिनियम 1956, मेडिकल ट्रेमिशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1987, हिंदू विवाह अधिनियम 2005, विदेशी विवाह अधिनियम 1969, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925, गर्भावस्था अधिनियम 2020, राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम , मातृत्व लाभ अधिनियम 1990, कारखाना अधिनियम 1948, महिलाओं का अश्लील प्रतिनिधित्व अधिनियम 1986, सती अधिनियम 1987, घरेलू हिंसा अधिनियम 2005, भारतीय तलाक अधिनियम 1896, कानूनी चिकित्सक अधिनियम 1923,  फास्ट ट्रैक कोर्ट, परिश्रमिक एक्ट 1976 आदि।

ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं की राजनीति में भागीदारी के उद्देश्य से पंचायती राज संस्थाओं ने 50% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की हैं। इसके साथ ही यदि, कोई महिला बलात्कार का शिकार हुई है तो उसे मुफ्त कानूनी मदद पाने का अधिकार है। और यदि पुलिस किसी महिलाको गिरफ्तार करना चाहती है, तो वह उसे सूरज डूबने के बाद और उगने से पहले गिरफ्तार नहीं कर सकती है।

महिलाओं को आज अपने पिता की संपत्ति में से भी हिस्सा प्राप्त होता है और पति की मौत के बाद किसी भी महिला का उसके घर और संपत्ति पर पूर्ण अधिकार होता है। और अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से तलाक लेना चाहता है तो उसे गुजरा भत्ता भी देना पड़ता है। इसके अलावा यौन उत्पीड़न का शिकार हुई महिला को अपनी पहचान गोपनीय रखने का अधिकार प्राप्त है। इस प्रकार, भारतीय संविधान महिलाओं को पूर्ण रूप से जीने का अधिकार प्रदान करता है।  


उपसंहार

इस प्रकार, महिलाओं का सशक्त होना किसी भी देश और समाज के लिए बहुत आवश्यक है। इसके अभाव में एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज की स्थापना कभी नही की जा सकती है।

इसके साथ ही हमारा निबंध हिंदी भाषा का महत्व (Nari Sashaktikaran Par Nibandh) समाप्त होता है। आशा करते हैं कि यह आपको पसंद आया होगा। ऐसे ही अन्य कई निबंध पढ़ने के लिए हमारे लेख – निबंध लेखन को पढ़ें।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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