महाभारत काल में अवतरित हुए देवतागण

भगवान विष्णु के अलावा अन्य किस देवता ने लिया था महाभारत युग में अवतार?

हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ महाभारत के बारे में तो आपने अवश्य ही सुना होगा। जिसका प्रत्येक पात्र अपने पीछे एक महत्वपूर्ण इतिहास रखता है। माना जाता है कि जब महाभारत काल में धरती अपने भार से पीड़ित होकर भगवान विष्णु के पास पहुंचीं।

तब धरती पर धर्म की पुनः स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण का अवतार लिया था। परन्तु क्या आप जानते हैं कि महाभारत काल में भगवान विष्णु के अलावा भी अन्य कई देवताओं, दैत्यों और गंधर्वों ने अवतार लिए थे। यदि नहीं, तो आज हम आपको बताएंगे कि महाभारत के समस्त पात्र आखिर कौन कौन से देवताओं का अवतार थे?

श्री कृष्ण

महाभारत काल के नायकों में से एक भगवान श्री कृष्ण भगवान विष्णु का अवतार थे। जिन्होंने महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाई थी। भगवान विष्णु ने इस युग में 64 कलाओं से युक्त भगवान श्री कृष्ण का अवतार लेकर कई सारे दानवों का अंत किया था। साथ ही अधर्म पर धर्म की विजय के लिए महाभारत युद्ध में सदैव पांडवों का ही साथ दिया।

भीष्म पितामह

महाभारत के सबसे ज्येष्ठ और शक्तिशाली व्यक्तित्वों में से एक भीष्म द्यो नामक वसु देव का अवतार थे। जिन्हें पूर्व जन्म में गुरु वशिष्ठ के श्राप के कारण मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा था। इन्होंने महाभारत का युद्ध कौरवों की ओर से लड़ा था। यह वेदों के ज्ञाता और श्रेष्ठ धनुर्धर भी थे। इनका वास्तविक नाम गंगा पुत्र देवव्रत था। लेकिन अपनी भीषण प्रतिज्ञाओं के चलते यह आगे चलकर भीष्म कहलाए गए।

गुरु द्रोणाचार्य

गुरु द्रोणाचार्य महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के शिक्षक के रूप में विख्यात थे। माना जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य बृहस्पति देवता के अवतार थे। जिन्होंने भारद्वाज मुनि के यहां द्रोण के रूप में जन्म लिया था। गुरु द्रोणाचार्य पांडव अर्जुन को अपना परम शिष्य मानते थे। जिसे वह दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धरी बनाना चाहते थे।

बलराम

भगवान श्री कृष्ण के बड़े भ्राता बलराम भी महाभारत काल का महत्वपूर्ण पात्र थे। जिन्होंने देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया था। लेकिन इनकी परवरिश नंद बाबा ने की थी। कहा जाता है कि बलराम भगवान विष्णु के आसन शेषनाग का अंश थे।

जिन्होंने महाभारत काल में भगवान श्री कृष्ण के दाऊ के रूप में जन्म लिया था।। यह सर्वश्रेष्ठ गदाधारी थे। हालांकि इन्होंने महाभारत का युद्ध नहीं लड़ा था। लेकिन यदुवंश की समाप्ति के पश्चात् इन्होंने अपनी लीलाओं का अंत कर दिया था।

पांडव अर्जुन

महाभारत के नायक कहे जाने वाले अर्जुन को इंद्र देवता का अंश माना जाता है। क्योंकि इनका जन्म भगवान इंद्र देवता के आशीर्वाद से हुआ था। यह महाभारत काल के उन योद्धाओं में से थे, जिन्होंने युद्ध भूमि पर अकेले ही कई सारे योद्धाओं को परास्त कर दिया था। यह विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहे जाते हैं।

कर्ण

महाभारत युग में कर्ण वैसे तो माता कुंती की संतान थे। लेकिन लोक लाज के भय से माता कुंती ने उन्हें नदी में बहा दिया था। जिसके बाद अधिरथ और राधा नामक दंपति ने कर्ण का पालन पोषण किया। कर्ण सूर्य देवता के आशीर्वाद से जन्मे थे।

इस प्रकार, कर्ण सूर्य देव के अंश थे। जोकि महाभारत काल में दानवीर कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हैं। साथ ही यह कौरव दुर्योधन के प्रिय मित्र थे। महाभारत के युद्ध में कर्ण की मृत्यु पांडव अर्जुन के हाथों हुई थी। कर्ण की मृत्यु के पश्चात् समस्त पांडव भाइयों को यह ज्ञात हुआ था कि कर्ण ज्येष्ठ कुंती पुत्र थे।

युधिष्ठिर

माता कुंती के ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर यमराज के आशीर्वाद से उत्पन्न हुए थे। इसलिए इन्हें यम देवता का अंश माना जाता है। इन्हें धर्मराज भी कहा जाता है। युधिष्ठिर अपनी न्यायप्रियता और सत्यता के लिए जाने जाते हैं। महाभारत युद्ध के पश्चात् युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी घोषित किया गया था। साथ ही समस्त पांडवों में एकमात्र युधिष्ठिर ही ऐसे थे, जिन्हें मृत्यु के बाद स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई थी।

विदुर

महाभारत काल में हस्तिनापुर के महामंत्री के रूप में विख्यात विदुर  महाराज पांडु और धृतराष्ट्र के भाई थे। विदुर वैसे तो एक दासी पुत्र थे, लेकिन आगे चलकर यह एक महान नीतिज्ञ के रूप में जाने गए। यह भगवान सूर्य और यम देवता के ही अंश माने जाते हैं। जिन्हें पूर्व जन्म में अणिमांडव्य ऋषि का श्राप मिला था।

इसी कारण वह महाभारत काल में मनुष्य योनि में जन्मे थे। इनके पिता का नाम महर्षि वेदव्यास था। और जीवन के अंत में इन्होंने भगवान श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र में स्थान पा लिया था।

अश्वत्थामा

गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा महादेव, यम, क्रोध और काल के अंश थे। जिन्होंने महाभारत युद्ध के दौरान द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध कर दिया था। इसी कारण इन्हें श्राप मिला था कि इन्हें मृत्यु के बाद भी मुक्ति नहीं मिलेगी। कहा जाता है कि अश्वत्थामा आज भी जीवित है।

भीम

पांडव पुत्रों में दूसरे स्थान पर आने वाले बलशाली भीम पवन देवता के आशीर्वाद से उत्पन्न हुए थे। इनमें सौ हाथियों के बराबर बल था। महाभारत युद्ध में भीम के हाथों ही 100 कौरवों समेत दुर्योधन, दुशासन की मृत्यु हुई थी। इन्होंने अपने जीवनकाल में कई सारे राक्षसों का वध किया था।

नकुल और सहदेव

महाराज पांडु और माद्री के पुत्र के रूप में दो जुड़वा संतानों ने जन्म लिया था। जिनको हम नकुल और सहदेव के रूप में जानते हैं। यह दोनों अश्विन देवता (नासत्य और दस्त्र) के आशीर्वाद से जन्मे थे, इसलिए यह अश्विन देवता के अंश माने जाते हैं।

महाभारत काल में जहां नकुल अपनी सुन्दरता के लिए जाने जाते थे। तो वहीं सहदेव अपनी त्रिकालदर्शी बुद्धि के लिए प्रसिद्ध थे। सहदेव के हाथों ही महाभारत के युद्ध में शकुनि का वध हुआ था।

दुर्योधन

दुर्योधन माता गांधारी और महाराज धृतराष्ट्र के सबसे बड़े पुत्र थे। जिनका जन्म महर्षि वेदव्यास के आशीर्वाद से हुआ था। कहा जाता है कि दुर्योधन कलियुग के एक राक्षस का अंश थे। यह गदा युद्ध में निपुण थे।

महाबलशाली भीम के हाथों दुर्योधन महाभारत युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके अलावा दुर्योधन के 100 भाई पुलस्त्य वंश के राक्षस के अंशावतार थे। जिन्हें भी भीम के हाथों युद्ध भूमि में मारा गया था।

कृपाचार्य

कृपाचार्य महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के कुलगुरु के रूप में विख्यात है। इनका जन्म ऋषि शरद्वान और जनपदी नामक देवकन्या के गर्भ से हुआ था। लेकिन इनका पालन पोषण महाराज शांतनु ने किया था।

कहा जाता है कि महाभारत काल में रुद्र के एक गण ने कृपाचार्य का अवतार लिया था। इनकी बहन कृपी का विवाह गुरु द्रोणाचार्य से हुआ था। साथ ही इन्हें चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त है। इसके अलावा कृपाचार्य कौरवों की ओर से युद्ध के अंत में बचने वाले तीन व्यक्तियों में से एक हैं।

महाराज धृतराष्ट्र और पांडु

महर्षि वेदव्यास के आशीर्वाद से उत्पन्न महाराज धृतराष्ट्र और पांडु हस्तिनापुर के उत्तराधिकारी बने थे। जिनकी माताओं का नाम रानी अंबिका और अंबालिका था। धार्मिक स्रोतों के अनुसार, महाराज धृतराष्ट्र अरिष्टा के पुत्र हंस नामक गंधर्व के अंश थे। तो वहीं हंस नामक गंधर्व के छोटे भाई के रूप में महाराज पांडु ने महाभारत काल में जन्म लिया था।

रानी कुंती और माद्री

महाराज पांडु की धर्मपत्नी कुंती और माद्री ने पांचों पांडवों को जन्म दिया था। महाराज पांडु की मृत्यु के दौरान रानी माद्री ने भी अपने प्राण गंवा दिए थे। इसी कारण पांचों पांडव भाइयों को लेकर कुंती हस्तिनापुर लौट आईं थीं। माना जाता है कि माद्री धृतिका देवी और कुंती सिद्धि माता का अवतार थी।

गांधारी

हस्तिनापुर नरेश महाराज धृतराष्ट्र की पत्नी माता गांधारी भगवान शिव की परम भक्त थी। जिन्होंने पतिव्रता होकर अपनी आंखों पर जीवन भर के लिए पट्टी बांध ली थी। कहा जाता है कि माता गांधारी मति का अवतार थी।

जिन्होंने गांधार नरेश राजा सुबल की पुत्री के रूप में जन्म लिया था। माता गांधारी सदैव ही महाराज धृतराष्ट्र और अपने पुत्र दुर्योधन को पांडवों से मिलकर चलने की सलाह दिया करती थी।
इन्होंने महर्षि वेदव्यास के आशीर्वाद से 100 पुत्रों और 1 कन्या को जन्म दिया था। जिनको पांडु पुत्रों द्वारा युद्ध में मारा गया था।

द्रौपदी

द्रौपदी पांचों पांडव भाइयों की पत्नी थी। हालांकि इन्हें स्वयंवर में धनुष भेदन करके अर्जुन ने जीता था। परन्तु बाद में यह पांचों पांडवों की पत्नी कहलाई। द्रौपदी द्रुपद नरेश की पुत्री थी। जोकि अग्नि से उत्पन्न हुई थी।

कहा जाता है कि देवी इंद्राणी ने महाभारत काल में द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था। जिनके पांचों पुत्र (प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ति, शतानीक, श्रुतसेन) विश्वदेव गण के अवतार थे।

शकुनि

कौरवों के मामा और माता गांधारी के भाई शकुनि महाभारत युद्ध का प्रमुख कारण थे। जिनके कारण ही दुर्योधन ने सदैव ही पांडवों के साथ छल और कपट किया। शकुनि का वध पांडव सहदेव के हाथों हुआ था। कहा जाता है कि शकुनि द्वापर युग का अंशावतार थे। जिन्होंने अपनी बहन गांधारी के अंधे जीवन का बदला कुरु वंश से लेने के लिए कौरवों और पांडवों के मध्य महाभारत कराई।

अभिमन्यु

अभिमन्यु पांडव अर्जुन और भगवान श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा का बेटा था। जोकि महाभारत के युद्ध में चक्रव्यूह से निकलते समय कौरवों की ओर से वीरगति को प्राप्त हो गया था। धार्मिक स्रोतों के अनुसार, अभिमन्यु चंद्रमा पुत्र वर्चा का अंशावतार था।

कहा जाता है कि चंद्र देवता अपने प्रिय पुत्र को धरती पर नहीं भेजना चाहते थे। लेकिन असुरों का नाश करने के उद्देश्य से उन्हें ऐसा करना पड़ा। जिसके पीछे उन्होंने यह शर्त रखी कि वर्चा मनुष्य योनि में जन्म लेगा। परन्तु अधिक समय तक धरती पर नहीं रहेगा।

जिसके कारण ही अभिमन्यु युवावस्था में ही वीरगति को प्राप्त हो गया था। आगे चलकर चंद्र देवता के आशीर्वाद से ही अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित ही कुरु वंश का उत्तराधिकारी बनाया गया।

रुक्मणि

भगवान श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मणि द्वारिका की पटरानी और राजा भीष्मक की पुत्री थी। माना जाता है कि बैकुंठधाम से स्वयं माता लक्ष्मी रुक्मणि का अवतार लेकर महाभारत युग में जन्मी थी।

इसके अलावा, महाभारत काल में कालनेमि दैत्य ने कंस, अग्नि के अंश से धृष्टद्युम्न, दानव विप्रचित्ति के अंश से जरासंध, हिर्णयकशिपु के अंश से शिशुपाल, त्रिजटा ने सुभद्रा, दंतवक्र ने विजय, कश्यप ने वसुदेव, अदिति ने देवकी, रुद्र के एक अंश से हनुमान, वरुण ने महाराज शांतनु, काम ने भरत, स्वयं भगवान ब्रह्मा ने महर्षि वेदव्यास, भगवान शिव ने ऋषि दुर्वासा, सनतकुमार ने प्रद्युम्न, मरूतगण के अंश से सात्यकि, कृतवर्मा, द्रुपद, विराट और इंद्र की शक्तियों से 16 हजार स्त्रियों ने धरती पर अवतार लिया था।

Credit – All images taken from B. R. Chopra’s Mahabharat


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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