जानिए कर्ण के कुंडल और कवच का क्या हुआ?

हिन्दुओं के पवित्र धार्मिक ग्रंथ महाभारत आज भी अनेकों रहस्यों को खुद में समेटे हुए है। जिनमें से कई रहस्यों की गुत्थी आज तक कोई नहीं सुलझा पाया है। हालांकि यह भी सत्य है कि इस युग में एक से बढ़कर एक योद्धाओं ने जन्म लिया था।

यहां तक कि श्री हरि के भगवान श्री कृष्ण अवतार की अद्भुत लीलाओं का जिक्र भी महाभारत की कहानी में मिलता है। ऐसे में महाभारत ना केवल एक ग्रंथ है बल्कि यह ऐसे युग की कथा है। जोकि आधुनिक मनुष्य को कर्तव्यों और धर्म पालन का बोध कराती है।

इस युग में भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, कृपाचार्य, बलराम, अभिमन्यु, अश्वत्थामा, कर्ण जैसे महारथी हुए। जिनमें से आज हम कर्ण जैसे दानवीर के जीवन से जुड़े उस किस्से की चर्चा करेंगे। जिसने कर्ण जैसे महारथी को सम्पूर्ण संसार में एक दानवीर के रूप में विख्यात कर दिया।


कर्ण के कुंडल और कवच कहां हैं?

जैसा कि आप जानते हैं कि कर्ण माता कुंती के ज्येष्ठ पुत्र थे। लेकिन माता कुंती ने लोक लाज के भय से उन्हें नदी में विसर्जित कर दिया था। क्योंकि माता कुंती को भगवान सूर्य के आशीर्वाद से कर्ण नामक पुत्र की प्राप्ति अविवाहित होने के दौरान हुई थी। जिसके बाद एक अधिरथ ने अपनी पत्नी राधा के साथ मिलकर कर्ण का पालन पोषण किया।

हालांकि कर्ण को जीवन भर सूत पुत्र कहकर लोगों ने संबोधित किया। किन्तु उसके पराक्रम और बल की प्रशंसा स्वयं भगवान श्री कृष्ण भी किया करते थे। दूसरी ओर, कर्ण को भगवान सूर्य ने शक्तिशाली कवच और कुंडल दिए थे।  जिनके होते हुए कर्ण को कभी कोई परास्त नहीं कर सकता था।

ऐसे में जब महाभारत का युद्ध हुआ। तब भगवान श्री कृष्ण यह जानते थे कि जब तक कर्ण के पास कुंडल और कवच है, तब तक अर्जुन के प्राणों पर संकट है। इसलिए उन्होंने इंद्र देवता को एक ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास भेजा।

उधर कर्ण, जब सूर्य उपासना के पश्चात् राजमहल की ओर लौट ही रहा था, कि तभी इंद्र देवता एक ब्राह्मण का वेश लेकर उत्पन्न हुए। हालांकि कर्ण को इस बात को पूर्वाभास था कि यह ब्राहमण कोई और नहीं स्वयं इंद्र देवता है।

लेकिन उसने उनके आग्रह करने पर उन्हें अपने कुंडल और कवच दान में दे दिए। और इस दान के बदले में कर्ण ने भगवान इंद्र से कुछ भी नहीं मांगा। कहते हैं तभी से कर्ण एक महान् दानवीर कहलाया। इस प्रकार, कर्ण द्वारा भगवान इंद्र को अपने कुंडल और कवच देने के पश्चात् वह महाभारत की युद्ध भूमि में अर्जुन के हाथों वीरगति को प्राप्त हो गया।

तत्पश्चात् ही समस्त पांडव भाइयों को यह ज्ञात हुआ था कि वह उनका ज्येष्ठ भ्राता है। उधर भगवान इन्द्र ने कर्ण से उसके कुंडल और कवच छल से प्राप्त किए। जिसे वह अपने साथ  स्वर्ग नहीं ले जा सके। और उन्होंने उन्हें एक समुंद्र में ले जाकर डाल दिया।

कहते है भगवान इंद्र ने कर्ण से प्राप्त कुंडल और कवच को ओडिशा राज्य के पूरी में कोणार्क के निकट छुपाया था। जिसकी रक्षा स्वयं सूर्य देव और समुन्द्र देव कर रहे हैं। क्योंकि माना जाता है कि इंद्र को समुन्द्र में कुंडल और कवच छुपाते चंद्र देवता ने देख लिया था। जिन्होंने इनको प्राप्त करने की कोशिश की थी। परन्तु वह असफल रहे।


ऐसे में आज हमने जाना कि इंद्र देवता ने कर्ण से दान में मिले कुंडल और कवच का क्या किया। और यह भी हम जानते ही है कि यदि कर्ण ने महाभारत का युद्ध कुंडल और कवच के साथ लड़ा होता। तो उसे युद्ध भूमि पर कोई परास्त नहीं कर सकता था। लेकिन किसी ने सच ही कहा है कि…..
होइए वहीं जो राम रचि राखा।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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