इस युग में श्री कृष्ण तक को मिला था श्राप, जानिए महाभारत काल के श्रापित लोगों के बारे में..

Mahabharat

हिंदी की एक बड़ी ही प्रसिद्ध कहावत है कि ‘बोया पेड़ बबूल का फिर आम कहां से होय’। उपरोक्त कहावत किसी भी व्यक्ति और उसके कर्मों के फल पर सटीक बैठती है। अर्थात् जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, उसे  भविष्य में उसी अनुरूप फल मिलता है। 

ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर अच्छा या बुरा फल प्राप्त होता है। लेकिन कई बार लोगों के बुरे या अनजाने में किए गए कोई गलत कर्म उनका कई जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ते।

यानि व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म कभी कभार श्राप के तौर पर उसे अगले जन्म में भी भुगतने पड़ते हैं। 

इसी तरह से, महाभारत काल में भी कई महापुरुषों को जन्म उनके पूर्व जन्मों के अच्छे या बुरे कर्मों के आधार पर मिला था। इतना ही नहीं, इस युग में कई लोग ऐसे भी हुए, जिनको मिले श्राप के चलते वह आज भी मोक्ष की प्राप्ति में भटक रहे हैं।

श्राप का साधारण शब्दों में अर्थ बददुआ देना होता है, जिसके मानव और देवता दोनों के संदर्भ में अलग-अलग मायने होते है।

ऐसे में आज हम आपको महाभारत काल के उन व्यक्तियों के बारे में बताएंगे, जोकि किसी ना किसी श्राप की बदौलत द्वापरयुग में जन्मे थे, या कहें उन्होंने पूर्व जन्मों का फल इस युग में जन्म लेकर भोगा था। 

तो चलिए जानते थे महाभारत युग में जन्मे महापुरुषों को क्या मिला था श्राप और क्या थे उनके पूर्व जन्म का अपराध जिसका उन्हें द्वापरयुग में मिला फल…

भीष्म पितामह

महाभारत युग के महान योद्धाओं में से एक थे भीष्म पितामह। जोकि राजा शांतनु और माता गंगा के 8वें पुत्र थे। कहा जाता है कि भीष्म पितामह का जीवन भी श्रापित था। जिसके पीछे उनके पूर्व जन्म की कहानी प्रचलित है।

कहा जाता है कि भीष्म पितामह अपने पूर्व जन्म में वसु देवता थे। जिनके अन्य 7 भाई भी वसु देव थे। जिन्होंने मिलकर ऋषि वशिष्ठ की गौ चुरा ली थी। जिस पर ऋषि वशिष्ठ ने भीष्म पितामह समेत उनके सातों भाइयों को अगले जन्म में मनुष्य बनने का श्राप दे दिया था। 

यही कारण था कि गंगा माता जन्म के उपरांत अपने आठों पुत्रों को गंगा नदी में बहाकर उन्हें ऋषि वशिष्ठ के श्राप से मुक्ति दिलाना चाहती थी, लेकिन राजा शांतनु के टोकने के पश्चात् भीष्म पितामह के अतिरिक्त सभी वसु देवताओं को श्राप से मुक्ति मिल गई, लेकिन भीष्म पितामह ने महाभारत युग में मनुष्य योनि में जन्म लिया।

इतना ही नहीं, अपनी मृत्यु के समय भीष्म पितामह बाणों की शैय्या पर करीब 18 दिनों तक लेटे थे। जिसके पीछे भी उनके पूर्ण जन्म के कर्म थे।

कहा जाता है कि भीष्म पितामह ने अपने पूर्व जन्म में करकैटा नामक पक्षी पर को अपने तीर से घायल कर दिया था, जिसके बाद वह भी करीब 18 दिनों तक कांटों पर ही रहा, जिसके कारण ही महाभारत युग में भीष्म पितामह को मृत्यु के समय बाणों की शैय्या मिली।

भीष्म पितामह जिन्हें द्वापरयुग में इच्छा मृत्यु का वरदान अपने पिता शांतनु से मिला था। उनकी मृत्यु किसी साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं थी। यही कारण था कि जब भीष्म पितामह माता सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य के लिए काशीराज की तीनों राजकुमारियों का हरण करके ले आए थे।

तब काशी नरेश की ज्येष्ठ पुत्री अम्बा जोकि शाल्वराज से प्रेम करती थी, लेकिन भीष्म पितामह के हरण के पश्चात् शाल्वराज ने अंबा को त्याग दिया। तब अंबा ने भीष्म पितामह से विवाह करने को कहा। लेकिन भीष्म पितामह ने अपने ब्रह्मचर्य व्रत के चलते विवाह से इंकार कर दिया।

जिस पर अंबा ने भीष्म पितामह को श्राप दिया कि अपने अगले जन्म में वह भीष्म पितामह से अपने अपमान का बदला जरूर लेगी।

यही कारण था कि भीष्म पितामह को उनके अंतिम समय में तीर अवश्य अर्जुन ने मारे थे, लेकिन भीष्म पितामह ने अर्जुन के बाणों का जवाब इसलिए नहीं दिया क्योंकि महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन के रथ पर शिखंडी (अर्धनारी) मौजूद था, जोकि पूर्व जन्म में और कोई नहीं, बल्कि काशी नरेश की पुत्री अम्बा थी। जोकि भीष्म पितामह की मृत्यु का कारण बनी।

महाराज पांडू

रानी सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य की पत्नी अंबालिका के पुत्र महाराज पांडू को भी महाभारत युग में श्राप मिला था, जोकि उनकी मृत्यु का कारण बना।

एक बार की बात है जब महाराज पांडू आखेट पर गए हुए थे, तब उन्होंने सिंह की दहाड़ पर तीर चलाया, जोकि ऋषि किंदम और उनकी पत्नी को लगा, जोकि उस दौरान सहसवास की अवस्था में थे, तब ऋषि ने महाराज पांडू को ये श्राप दिया कि वह जब भी अपनी किसी पत्नी के अत्यधिक निकट जाएंगे, तभी उनकी मृत्यु हो जाएगी।

यही कारण था कि कुंती ने पांचों पांडव भाइयों को अलग-अलग देवताओं का आह्वान करके जन्म दिया था। लेकिन एक बार, जब माद्री नदी से स्नान करके बाहर आ रही थी, तब महाराज पांडू स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सके और माद्री के निकट आते ही उन्होंने प्राण त्याग दिए।

राजा शांतनु और माता गंगा

कुरु वंश के राजा शांतनु और उनकी पत्नी गंगा भी अपने पूर्व जन्म में मिले एक श्राप को महाभारत युग में जी रहे थे। धार्मिक स्रोतों के अनुसार, राजा शांतनु अपने पूर्व जन्म में महाराज महाभीषक थे।

एक बार जब महाराज महाभीषक इंद्र देव की सभा में देवांगनाओं का नृत्य देखने पधारे। तब वहां माता गंगा भी अपने पिता ब्रह्म देव के साथ वहां पधारी। जिन्हें महाराज महाभीषक टकटकी लगाए देखते रहे, कि तभी हवा के झोंके से माता गंगा का आंचल उड़ गया।

जिस पर वहां मौजूद सभी देवतागणों ने आंखें नीचे कर ली, लेकिन महाराज महाभीषक और माता गंगा एक दूसरे को देखते ही रहे। जिस पर ब्रह्म देव क्रोधित हो गए और उन्होंने राजा शांतनु और माता गंगा को पृथ्वी लोक पर मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया।

द्रौपदी के पांचों पुत्र

महाभारत युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु के बाद गुरु द्रोण के पुत्र अश्वथामा ने द्रौपदी के पांचों पुत्रों को मौत के घाट उतार दिया था। जो केवल एक संयोग नहीं था, बल्कि द्रौपदी के पांचों पुत्रों को उनके पूर्व जन्म में एक श्राप मिला था, जिसके कारण ही उन्हें महाभारत युग में अल्पायु का शिकार होना पड़ा।

धार्मिक कथा के अनुसार,  त्रेतायुग में एक बार जब राजा हरिश्चन्द्र शिकार खेल रहे थे। तब वहां ऋषि विश्वामित्र भी मौजूद थे, जोकि ध्यान में थे, लेकिन राजा हरिश्चन्द्र के शिकार के चलते उनका ध्यान भंग हो गया और उन्होंने राजा हरिश्चंद्र से प्रायश्चित करने को कहा।

जिस पर राजा हरिश्चंद्र ने अपना सारा राज पाठ तक ऋषि विश्वामित्र को दे दिया, लेकिन ऋषि विश्वामित्र देवताओं के कहने पर ही राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा ले रहे थे। इस दौरान ऋषि विश्वामित्र राजा हरिश्चंद्र की काफी कठिन परीक्षा ले रहे थे।

जिसे देख विश्व देवों ने ऋषि विश्वामित्र को काफी भला बुरा कहा। जिस पर ऋषि विश्वामित्र काफी क्रोधित हो गए और उन्होंने पांचों विश्व देवों के ये श्राप दे दिया कि वह अगले जन्म में मनुष्य बनेंगे, ऐसे मनुष्य जो धरती पर जन्म लेने के बावजूद ना तो संतान का सुख भोगेंगे और ना ही विवाह कर पाएंगे।

ऐसे में ये विश्व देव महाभारत युग में द्रौपदी के गर्भ से जन्मे और श्राप के चलते अल्पायु में ही मृत्यु लोक को चले गए।

भगवान श्री कृष्ण

महाभारत युग में भगवान श्री विष्णु ने श्री कृष्ण का अवतार लिया। जोकि श्री हरि के सभी अवतारों में सबसे अधिक पूजनीय है। महाभारत युग में भगवान श्री कृष्ण ने अधर्म का सर्वनाश करके धर्म की स्थापना के लिए जन्म लिया था।

इसके लिए उन्होंने देवकी माया की कोख से जन्म लिया और अपने मामा कंस का काल बनकर सम्पूर्ण संसार को उनके आतंक से छुटकारा दिलाया। इस युग में जन्म लेकर भगवान श्री कृष्ण ने कई सारे दुष्ट व्यक्तियों के प्रकोप से सांसारिक व्यक्तियों को बचाया था।

इतना ही नहीं, भगवान श्री कृष्ण की छत्र-छाया में ही पांडवों ने कौरवों को हराकर महाभारत का युद्ध जीता था। इस दौरान समस्त कौरव भाइयों की मृत्यु के बाद राजा धृतराष्ट्र और माता गांधारी के कुल का नाश हो गया।

जिसके चलते माता गांधारी ने भगवान श्री कृष्ण को भी श्राप दे दिया कि जिस तरह से उनके कुल का नाश हो गया, ठीक उसी प्रकार से द्वारिका और यदुवंशियों का भी नाश हो जाएगा। इसी श्राप के चलते महाभारत युद्ध के 36 साल बाद द्वारिका नगरी समुद्र में समा गई और यदुवंश का पतन हो गया।

अर्जुन

महाभारत काल में जन्मे अर्जुन एक श्रेष्ठ धनुर्धारी थे। जिन्हें भी स्वर्ग लोक की अप्सरा उर्वशी ने श्राप दिया था।


ये उस समय की बात है जब अर्जुन दिव्यास्त्रों की खोज में स्वर्ग लोक गए थे। तब वहां इंद्र की सभा में अप्सराएं नृत्य कर रही थी। तभी वहां मौजूद उर्वशी नामक अप्सरा अर्जुन को देखते ही उस पर मोहित हो गया।


उसने अर्जुन के पास आकर उससे प्रेम का प्रस्ताव रखा। जिस पर अर्जुन ने उर्वशी से कहा कि वह कुंती, माद्री की तरह ही उसके लिए माता समान है।


ये सुनते ही उर्वशी को क्रोध आ गया और उसने अर्जुन को नपुंसक बनने का श्राप दे दिया। हालांकि अज्ञातवास के दौरान अर्जुन का ये श्राप उसके लिए वरदान साबित हुआ और वह इसी युग में श्राप से मुक्त भी हो गया।


इसके अलावा, कर्ण को एक ब्राह्मण ने भी श्राप दिया था। एक बार जब कर्ण ने बिना जांच पड़ताल के शब्द भेदी बाण चला दिया था। तो इससे एक ब्राह्मण का बछड़ा मर गया था। तब ब्राह्मण ने क्रोधित होकर कर्ण से कहा कि अपनी मृत्यु के दौरान तुम भी असहाय हो जाओगे।


इतना ही नहीं, अपने जीवन के निर्णायक युद्ध के दौरान तुम्हारे रथ का पहिया जमीन में धंस जायेगा। एक अन्य श्राप के चलते महाभारत युद्ध के समय कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया था या कहें धरती माता ने उसके रथ के पहिए को जकड़ लिया था।


जोकि एक श्राप था। कहा जाता है कि एक बार जब कर्ण को एक रोती हुई कन्या मिली, जोकि अपने घड़े से घी के जमीन पर गिर जाने के चलते रो रही थी। जिस पर कर्ण उसकी मदद के लिए मिट्टी से घी को अलग करने का प्रयास कर रहे थे।


जिस पर धरती माता को काफी पीड़ा हुई क्योंकि उनकी मिट्टी को नचोड़ रहा था, इसी कारण धरती माता ने उसे श्राप किया कि वह युद्ध में उसके रथ के पहिए को जकड़ लेंगी, जिस कारण वह मृत्यु को प्राप्त होगा। यही कारण था कि कर्ण अपने विभिन्न श्रापों के चलते अर्जुन के हाथों युद्ध भूमि में मारा गया।

कर्ण

महाभारत का युग योद्धाओं का युग था। इसमें कई सारे महान योद्धाओं ने जन्म लिया था। कर्ण जोकि माता कुंती का पुत्र था, लेकिन किसी कारणवश उसका पालन पोषण सूत दंपती ने किया।


जिस पर कर्ण सदैव सूत का ही पुत्र कहलाया। सूत पुत्र होने के चलते गुरु द्रोण ने भी कर्ण को अस्त्र शस्त्र की विद्या नहीं दी। ऐसे में जब भगवान परशुराम से शिक्षा लेने की बात आई, तब कर्ण ने उन्हें कहा कि वह एक ब्राह्मण का बेटा है और भगवान परशुराम ने उसे अस्त्र शस्त्र का ज्ञान दिया।


लेकिन जब उन्हें पता लगा कि कर्ण ब्राह्मण नहीं बल्कि एक क्षत्रिय है, तब उन्होंने कर्ण को श्राप दिया कि तुम मेरे द्वारा दी गई सारी शिक्षा या दिव्यास्त्र का प्रयोग तब भूल जाओगे, जब तुम्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी। यही कारण था कि महाभारत के युद्ध में जब कर्ण का सामना अर्जुन से हुआ तब कर्ण अपने सारे अस्त्रों का प्रयोग करना भूल गया था।


अश्वथामा

गुरु द्रोण के पुत्र अश्वथामा ने महाभारत युद्ध के पश्चात् द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध कर दिया था। इतना ही नहीं, अश्वथामा द्वारा चलाए गए ब्रह्मास्त्र से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का बेटा परीक्षित जोकि उस दौरान अपनी माता के गर्भ में था, उसे जाकर लगा। जिसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्तियों से पहले परीक्षित की जान बचाई। उसके बाद उन्होंने 

अश्वथामा को श्राप दिया कि वह कई जन्मों तक धरती पर भटकता रहेगा और उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी।

दुर्योधन

महाभारत काल में दुर्योधन जैसे वीर पुरुष भी हुए, लेकिन अपने अहंकार के वशीभूत उसने कभी सत्य और धर्म को जाना ही नहीं।

यही कारण था कि जब महाभारत युद्ध से पहले महर्षि मैत्रेय हस्तिनापुर पधारे, तब उन्होंने दुर्योधन से कहा कि वत्स! अभी भी समय है तुम पांडवों से संधि कर लो। लेकिन दुर्योधन ने उनकी एक ना सुनी और महर्षि के सामने अपने जंघा पर हाथ रखकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया।

जिस पर महर्षि मैत्रेय ने दुर्योधन से क्रोधित होकर उसे श्राप दिया कि वह जिस जंघा के बाहुबल का प्रदर्शन कर रहा है, ये जंघा ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगी।

यही कारण था कि महाभारत के युद्ध में अंतिम दिन दुर्योधन का जब पांडव भीम से युद्ध हुआ, तब भीम ने दुर्योधन की जंघा पर वार करके उसे मृत्यु लोक पहुंचा दिया।

घटोत्कच

पांडव भीम का बेटा घटोत्कच जब एक बार राजमहल में अपने अपने पिता भाइयों से मिलने आया। तब उसने द्रौपदी के प्रति कोई आदर सम्मान व्यक्त नहीं किया।

जिससे क्रोधित होकर द्रौपदी ने उसे श्राप दिया कि उसका जीवनकाल बहुत छोटा होगा और वह बिना किसी लड़ाई के ही युद्ध में मारा जाएगा।

परीक्षित

अर्जुन के प्रपौत्र राजा परीक्षित की मृत्यु के बाद ही कलियुग का धरती पर आगमन हुआ। कहते हैं एक बार राजा परीक्षित जब आखेट के लिए गए हुए थे, तब वहां एक ऋषि शमिक तपस्या कर रहे थे।

राजा परीक्षित को जब प्यास लगी तो उन्होंने ऋषि शमिक से पीने के लिए पानी मांगा। लेकिन ऋषि शमिक जोकि ध्यान मगन थे, उन्होंने राजा परीक्षित की बात नहीं सुनी।

जिससे क्रोधित होकर राजा परीक्षित ने ऋषि शमिक के गले में एक नाग को अपने धनुष से उठाकर डाल दिया। जिस पर ऋषि शमिक का पुत्र ऋगी काफी नाराज हुआ और उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप किया कि आज से 7 दिन बाद राजा परीक्षित की मृत्यु एक सांप के काटने से ही हो जाएगी।

युधिष्ठिर

पांडव भाइयों में ज्येष्ठ युधिष्ठिर ने अपनी माता कुंती समेत सम्पूर्ण स्त्री जाति को ये श्राप किया था कि वह अपने दिल में कभी कोई भेद नहीं रख पाएंगी। उन्होंने ऐसा श्राप इसलिए दिया क्योंकि उनकी माता ने उन सबसे ये बात छुपाई थी कि कर्ण उनका बेटा और ज्येष्ठ पांडू पुत्र है।

जिस कारण ही युधिष्ठिर ने अपनी माता कुंती समेत समस्त स्त्री जाति को यह श्राप दिया, जिसका प्रभाव वर्तमान में भी देखने को मिलता है।

विदुर

महाभारत युग में जन्मे विदुर भी अपने पूर्व जन्म के कर्मों के चलते द्वापरयुग में दासी पुत्र कहलाए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विदुर जोकि यमराज का ही प्रतिबिंब थे, उन्होंने अपने पिछले जन्म में ऋषि मांडव्य को किसी छोटे से अपराध के लिए मृत्युदंड दे दिया था।

जिस पर ऋषि मांडव्य ने भी यमराज को श्राप दिया कि वह अगला जन्म एक दासी पुत्र के रूप में लेंगे। यही कारण था कि यमलोक के देवता यमराज का महाभारत युग में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म हुआ। 

धृतराष्ट्र

महाराज धृतराष्ट्र को भी अपने पूर्व जन्म में श्राप मिला था, जिस कारण वह महाभारत युग में अंधे जन्मे। कहा जाता है कि धृतराष्ट्र अपने पूर्व जन्म में एक क्रूर राजा थे।

जिन्होंने एक बार अपने सैनिकों को एक हंस की दोनों आंखें निकालने का आदेश दिया था। कहते हैं कि इसी वजह से हंस ने राजा धृतराष्ट्र को श्राप दिया कि वह अपना अगला जन्म एक अंधे की भांति व्यतीत करेंगे। 

इतना ही नहीं, एक दासी के साथ सहसवास के चलते भी राजा धृतराष्ट्र को दवाग्नि में जलकर भस्म होने का श्राप मिला था। जिसके चलते धृतराष्ट्र अपने जीवन के अंतिम दिनों में जंगल की ओर चले गए और अग्नि में भस्म हो गए।

अपनी पत्नी गांधारी के पूरे परिवार को जेल में भूखा मार डालने के कारण ही शकुनि ने कुरु वंश को समाप्त करने की सोची, जो भी किसी श्राप से कम नहीं है।

द्रौपदी

द्रौपदी महाभारत काल की नायिका के तौर पर जानी जाती है। जिनके पिता राजा द्रुपद कभी भी नहीं चाहते थे कि उनको पुत्री हो। जिस कारण उन्होंने अग्नि देव से ऐसी पुत्री की कामना की, जो जीवन भर न्याय सहे, पीड़ा उठाएं, लेकिन सहनशील हो।

जिसके पांच पति हो फिर भी वह पतिव्रता कहलाए। राजा द्रुपद जानते थे कि ऐसी पुत्री का होना असंभव है, लेकिन अग्नि देव ने राजा द्रुपद को एक ऐसी ही पुत्री दी, जोकि आगे चलकर द्रौपदी के नाम से जानी गई। इस प्रकार कहा जा सकता है कि द्रौपदी के पिता की ये इच्छा या कामना द्रौपदी के जीवन के लिए श्राप बन गई।

शकुनि

महाभारत काल का ऐसा व्यक्तित्व, जिसको ही महाभारत युद्ध का कर्ता धर्ता माना गया। कहा जाता है कि शकुनि ने अपने परिवार की मौत का बदला लेने के लिए राजा धृतराष्ट्र के वंश का नाश कराया।


और जब ये बात उनकी बहन गांधारी को पता चली तब उन्होंने शकुनि को श्राप दिया कि उनके राज्य में प्रजा कभी सुख चैन से नहीं रह पाएगी। यही कारण है कि वर्तमान अफगानिस्तान जोकि उस युग में गांधार देश हुआ करता था, आज भी आतंकवादियों और जिहादियों की कट्टरपंथता को झेल रहा है।


इस प्रकार, उपरोक्त अनेक श्राप और पूर्व जन्म के कर्मों का फल महाभारत काल के महान व्यक्तियों को अपने जीवनकाल में झेलना पड़ा।

जिससे यह सिद्ध होता है कि हर व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है, कोई भी इस नियम को ना बदल सकता है और ना तोड़ सकता है। इसलिए हर व्यक्ति को सदैव अच्छे कर्म करने चाहिए।

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अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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