मेरा प्रिय मित्र

मेरे घर के आस-पास और विद्यालय की कक्षा में बहुत सारे मित्र हैं परन्तु मेरे सबसे प्रिय मित्र का नाम वरदान है। वो अपने अच्छे स्वभाव और बहुत से गुणों की वजह से बिलकुल नाम की तरह अपने परिवार और मित्रों के लिए वरदान ही है। वो मुझसे एक साल बड़ा है और बिलकुल मेरे बड़े भाई और दोस्त की तरह हर समय मेरी सहायता और सुरक्षा के लिए तैयार होता है। 

हमारी मित्रता का आरम्भ

वरदान हमारे मकान मालिक का सबसे बड़ा बेटा है। कुछ वर्ष पहले पिता जी की ट्रांसफर के सिलसिले में हम इनके घर किराए पर रहने लगे। तबसे हमारा मित्रता का रिश्ता गहरा होता गया। हमारा परिवार मकान मालिक के परिवार जितना अमीर नहीं था परन्तु वरदान ने कभी अपने बाकी मित्रों और मुझ में अंतर नहीं किया। वो शहर के बड़े स्कूल में पड़ता था और मैं छोटे से सरकारी स्कूल में। उसके बहुत मित्र घर आया जाया करते थे परन्तु वो सबको बहुत गर्व से मुझ से मिलाया करता था। वह एक कक्षा आगे था इसलिए अपनी किताबें भी मुझे दे दिया करता था और पढ़ाई में सहायता करता था। 

हमारी रुचियाँ

हमारी सारी रुचियाँ लगभग समान थी। विद्यालय से बाद हम अपनी गली में खेलने जाते हैं। हम गली की एक ही क्रिकेट टीम में थे और जब इकठ्ठे बल्लेबाजी करते थे तो हमें हराना मुश्किल हो जाता था। बहुत लोग हमारी मित्रता से जलते थे और हमें एक दूसरे के लिए भड़का कर लड़ाई करवाना चाहते थे परन्तु हमें एक दूसरे पर पक्का भरोसा था। वो अपने खिलोने और वीडियो गेम्स भी मुझे खेलने को देता है। हम दोनों को काल्पनिक नॉवेल पढ़ना पसंद था इसलिए हम वो भी मिल जुल कर पढ़ा करते थे, और बाद में उसकी कहानी के बारे में विस्तार में चर्चा किया करते थे। इससे हमारी जानकारी भी बढ़ती थी और मनोरंजन भी होता था। 

जब हमारी किराए वाली मंज़िल पर बिजली चली जाती तो वरदान मुझे एक साथ टीवी देखने के लिए अपने कमरे में ले जाता। हम खूब बातें करते और अपने मन पसंद कॉमेडी नाटक देख कर खूब हंसते। वरदान को मेरी मां के हाथ के राजमा चावल बहुत पसंद थे इसलिए जब भी मां खाने में को बनाती, वो दौड़ कर हमारी मंज़िल पर खाना खाने आ जाता। वो मेरी मां का भी बहुत आदर करता था और घर में सबका दिल लगा के रखता था। 

सहायता का एक किस्सा

बड़ी कक्षा कि अच्छी पढ़ाई के लिए मैं भी वरदान के स्कूल में चला गया। मेरे पढ़ाई में नंबर अच्छे आने कि वजह से शुल्क में छात्रवृत्ति मिल जाया करती थी। वरदान के इस विद्यालय के विद्यार्थियों को हर वर्ष किसी ना किसी एक दो दिन के लिए शिक्षात्मक यात्रा पर ले कर जाता था। इस बारी उन्हें बहुत बड़ी विज्ञान नगरी दिखाने ले कर जाया जा रहा था और वरदान अच्छे से जानता था कि मुझे विज्ञान में कितनी रुचि है और उस विज्ञान नगरी को देखना मेरा सपना था। वह यह भी जानता था कि हमारे घर का खर्च पिता जी की आमदनी से पूरा पूरा ही निकलता था इसलिए जब यात्रा से दो दिन पहले मेरा उदास चेहरा देखा तो वो समझ गया की मेरी क्या समस्या है। 

वो झट से अपने कमरे में दौड़ा और अलमारी से अपनी गुल्लक निकाल कर पैसे गिनने लगा। यात्रा के लिए विद्यालय में दो हज़ार रुपए जमा करवाने थे। वरदान ने अपनी गुल्लक से पैसे निकाल कर अगले दिन अध्यापिका को दे दिए और मेरा नाम भी यात्रा में जाने वाले बच्चों में लिखवा दिया। यह सब करने के बाद उसने मुझे बताया कि में भी अगले दिन यात्रा पर उसके साथ जा रहा हूं। मैंने भावुक हो कर उसे गले लगा कर उसका शुक्रिया किया। 

मेरे मित्र के गुण

वरदान एक बेहतरीन मित्र होने के साथ साथ एक बेहतरीन बेटा भी है। वो अपने मां बाप और मेरे मां बाप का समान आदर करता है। वो अपने से बड़ों से बहुत निम्रता और सम्मान से बात करता है। वो किसी के साथ लड़ाई झगड़ा नहीं करता और सबके साथ प्रेम से रहता है। वो कभी धैर्य नहीं खोता और बिलकुल निस्वार्थ है और अपने सारे खिलोने और किताबों को बाकियों साथ मिल बांट कर उपयोग करता है। वो प्रकृति से भी बहुत प्यार करता है, और हम सुबह प्रातः काल की सैर करने इकठ्ठे जाते हैं। 

उसमें किसी बात का कोई घमंड नहीं है और कोई दिखावा नहीं करता। उसको बाहर के खाने से अच्छा मेरी मां का हाथ का खाना लगता है। कहा जाता है कि सच्चा मित्र वही जो मुसीबत के समय काम आए। यदि कभी किसी की भलाई या सहायता का मौका मिले तो वो पीछे नहीं हटता। मैने उससे यह भी सीख ली है की अपने लक्ष्य ज़रूर निर्धारित करो और उन्हें पूरा करने के लिए प्रयास भी करते रहो, और हार से कभी निराश मत हो। 

सारांश

मैने अपने बड़े भाई समान दोस्त से बहुत सारे गुण सीखे हैं। इतना निस्वार्थ और प्यारा मित्र भगवान सब को दे। विद्यालय एवम् घर पर सब सदस्यों को उस पर मान है। वो बड़ा हो कर सबका नाम रोशन करेगा। मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरे प्रिय मित्र की सारी मनोकामाएं पूरी हो, वो हमेशा सुखी रहे और उसे अपने लक्ष्यों को पाने की शक्ति मिलती रहे।


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