मेरे जीवन का लक्ष्य पर निबंध – Essay on Mere Jeevan ka Lakshya

ईश्वर ने जब इस ब्रह्माण्ड की रचना की थी, तो उसके पीछे का उद्देश्य था, मानव जीवन की उत्पत्ति और उसका विकास। ऐसे में मानव का भी अपने जीवन में एक उद्देश्य होना चाहिए, जिसे प्राप्त करने के लिए वह अपना सब कुछ न्योछावर कर दे।

परन्तु दूसरी ओर जो लोग अपने जीवन में उद्देश्यरहित होते हैं, वह जिधर पैर पड़े उधर ही चल पड़ते हैं। वह अपने जीवन में कभी सफल नहीं हो पाते हैं क्यूंकि इस दुनिया में इतिहास उसी ने रचा है जिसने अपने जीवन के उद्देश्य को पहचाना है और उसी मार्ग पर खुद को चलने के लिए प्रेरित भी किया है।

मेरा जीवन लक्ष्य

मानवों में श्रेष्ठ मानव जब अपने जीवन में कोई लक्ष्य या ध्येय निर्धारित करते हैं तो वह उस पर चलने के लिए निरंतर प्रायारत रहते हैं। ऐसे ही एक विद्यार्थी होने के तौर पर मेरे मन में भी कुछ कल्पना है। मैंने भी अपने जीवन का एक लक्ष्य बनाया है, जिसे पाने के लिए पूरी कोशिश करूंगा। मैं शिक्षक बनकर संपूर्ण समाज में शिक्षा की लौ जलाऊंगा। इसके लिए में प्रत्यक्ष रूप से इतिहास के कुछ प्रेरक व्यक्तित्वों को धन्यवाद देना चाहता हूं।

जैसे भगवान श्री राम अपने पिता दशरथ से अधिक अपने गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र को मानते थे। महान् सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य अपने गुरु चाणक्य को सबसे अधिक स्नेह करता था। तो वहीं विश्व जीतने की चाह रखने वाला सिकंदर अपने गुरु अरस्तू के सम्मान में झुकता था। जिनके गुरु प्रेम से प्रभावित होकर मैं भी जीवन में शिक्षक बनना चाहता हूं। साथ ही शिक्षक राष्ट्र का वास्तविक निर्माता होता है।

समाज के प्रति मेरा कर्तव्य

आधुनिक समाज में आज हर कोई पैसा कमाने की होड़ में लगा हुआ है। पैसे के नाम पर लोगों को लूटने वाले ज्ञानियों, अधिकारियों, वकीलों आदि की समाज में कोई कमी नहीं है। साथ ही समाज भले ही समाप्त हो जाए पर उनका हित बना रहे, ऐसा चाहने वाले उद्योगपतियों और व्यापारियों की भी कमी नहीं है। ऐसे में आज इन सब कारणों की मूल वजह है चरित्र का पतन।

ऐसे में आदर्श गुरुओं के अभाव में व्यक्ति कब इन रास्तों पर निकल पड़ता है। वह पता ही नहीं लगता। दूसरी ओर आज ऐसे शिक्षकों की भी कमी नहीं है, जो केवल जीविका चलाने के उद्देश्य से ही शिक्षक के पद पर आसीन है। वह शिक्षा को अपना कर्तव्य ना मानकर कुछ एक छात्रों को उत्तीर्ण करवाकर अपना कार्य पूर्ण समझते हैं। जिसे देखकर मुझे महसूस होता है कि मैं भविष्य में एक आदर्श शिक्षक के पद पर कार्यरत रहूंगा और बच्चों के चारित्रिक और नैतिक विकास को बढ़ावा दूंगा। उनके समक्ष त्याग, प्रेम, परोपकार इत्यादि आदर्शों को स्थापित करूंगा। साथ ही गुरु बनने के बाद मेरी करनी और कथनी में कोई अंतर नहीं होगा।

उपसंहार

इस प्रकार अपने उद्देश्य को पाने के लिए मैं अभी से प्रयासरत हूं। मैं प्रतिदिन पाठ्य पुस्तकों के साथ साथ श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन भी करता हूं। साथ ही नियमित तौर पर महात्माओं के प्रवचन सुनता हूं। इसके अलावा अपने सभी गुरुजनों का आदर और सरकार करता हूं।

ईश्वर से सदैव मेरी यही प्रार्थना है वह मुझे सदैव मेरे जीवन का लक्ष्य पाने के लिए प्रेरित करें। ताकि मैं अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर राष्ट्र के नवनिर्माण में योगदान दे सकूं।


अंशिका जौहरी

मेरा नाम अंशिका जौहरी है और मैंने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है। मुझे सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखना और बोलना पसंद है।

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